गायों के सुरम्य चरागाहों, चीज़–चॉकलेट और प्रत्यक्ष लोकतंत्र के देश स्विट्जरलैंड में २5 नवम्बर 2018 को एक अनोखा जनमत संग्रह (referendum) होने जा रहा है. लाखों स्विस नागरिक मतदान के ज़रिए गायों के ‘सींग उच्छेदन‘ के मुद्दे पर अपनी राय ज़ाहिर करेंगे. जनमत संग्रह के नतीजे इस बात का निर्णय करेंगें कि जो स्विस गौ-पालक अपनी गायों के सींग नहीं काटते हैं और इसके कारण गौपालन की लागत में जो इजाफा होता है उसकी भरपाई के लिए सरकार पालकों सब्सिडी दे या नहीं. एक अनुमान के मुताबिक़ स्विट्ज़रलैंड में कुल गायों की मौजूदा तादाद में मात्र 10% सींगवाली गाएं बची हैं .

स्विट्ज़रलैंड सहित लगभग सभी पाश्चात्य देशों में जन्म के तीन–चार हफ़्तों के भीतर बछड़े–बछड़ी के अविकसित सींगों को 700 डिग्री सेल्सियम तापमान पर गरम की गई लोहे की लाल छड़ से जला दिया जाता है जिससे भविष्य में सींग उगने की संभावना हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है. कई बार धारदार चाक़ू से सींग को समूल काट दिया जाता है. जानवर के बड़े हो जाने की स्थिति में सींगों को एक विशेष प्रकार के आरे से काटा जाता है. दोनों ही स्थितियों में यह प्रकिया पशु के लिए काफी कष्टदायक होती है और पशु महीनों तक पीड़ा से कराहता है.

इस प्रक्रिया द्वारा गायों व भेड़ों को सींगविहीन करने के पीछे मुख्य कारण आर्थिक तथा पशु एवं पालक की सुरक्षा बताया जाता है. सबसे प्रमुख आर्थिक कारण है कि सींगों की वजह से एक गाय तबेले में जरुरत से ज्यादा जगह घेरती है जो व्यावसायिक दृष्टि से एक महँगा सौदा है. सींगवाली गाय के चारे की नाद का आकार भी बड़ा रखना पड़ता है अत: ज्यादा जगह घेरने के कारण पशुपालन की लागत बढ जाती है. इन्हें घास चरने के लिए भी ज्यादा जगह चाहिए. सींग विहीन गायों के मुकाबले में इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने में ज्यादा खर्च आता है. सुरक्षा सम्बन्धी कारणों में पालक के घायल होने का खतरा प्रमुख है. सींगवाली गाएं बाड़ और झाड़ियों में फंसकर घायल हो जाती हैं जिससे घाव में संक्रमण का खतरा बना रहता है. सींगवाले पशु आपस में लड़कर एक दूसरे को घायल कर देते हैं.

आर्मिन कपौल (चित्र इंटरनेट से साभार)

सींग–उच्छेदन के विरोध और ‘पशुओं की पीड़ा और गरिमा’ के प्रति संवेदनशीलता से उपजे उपरोक्त जनमत संग्रह के लिए अपने अकेले के दम पर सरकार को मजबूर कर देने वाले शख्स का नाम है आर्मिन कपौल! 67 साल के आर्मिन एक पशुपालक हैं और आल्प्स की पहाड़ियों में रहते हैं. अपनी गायों से ‘’उनकी वेदना की कहानी सुनकर‘’ आर्मिन के ज़ेहन में यह विचार आया कि निरीह पशु की भी अपनी एक गरिमा होती है. इस बेजुबान प्राणी की पीड़ा को नापने का कोई यंत्र आज तक बना नहीं है तो मनुष्य होने के नाते उनका फ़र्ज़ बनता है कि वह उनकी आवाज़ बनें.

पशु अपने सींगों के माध्यम से संवाद करते हैं. सींग उनके  शरीर का तापमान  संतुलित रखने में मदद करते हैं. सींगों की मदद से गाएं अपनी व अपने बछड़ों की जंगली जानवरों से रक्षा करने में सक्षम होती हैं. आर्मिन की मांग है कि सींगवाली गाएं पालने में जो अतिरिक्त लागत पशुपालक को वहन करनी पड़ती  है उसकी नगद भरपाई अगर सरकार करे तो आइन्दा किसी बेजुबान को सींग उच्छेदन की दर्दनाक प्रक्रिया से नहीं गुजरना पडेगा. वह प्रति पशु 190 स्विस फ्रैंक ($191.65) वार्षिक सब्सिडी की मांग कर रहे हैं जो स्विस सरकार के सालाना तीन अरब स्विस फ्रैंक के कृषि बजट से देय होगी. इस सब्सिडी पर सालाना तीन करोड़ स्विस फ्रैंक खर्च आने का अनुमान है.
ध्यान रहे कि वह सींग-उच्छेदन पर प्रतिबन्ध की मांग नहीं कर रहे हैं बल्कि उनका कहना है सरकार द्वारा नुकसान की भरपाई होने पर पशुपालक सींग उच्छेदन को नहीं अपनाएंगें.

‘मेरा एकमात्र मकसद इन बेजुबानों को जुबान देना है‘ आर्मिन की यह मार्मिक टिप्पणी उनके ‘Hornkuh Initiative’ का निचोड़ है. आठ साल पहले 2010 में आर्मिन ने पहली बार इस बारे में सरकार के कृषि विभाग को एक चिट्ठी लिखी. मगर संसद ने सींगवाले जानवरों का संवर्धन करने वाली इस अपील को खारिज़ कर दिया. मगर पोस्टरों और अखबारों के ज़रिए आर्मिन ने अपनी मुहिम जारी रक्खी. मुहिम का समर्थन करने वाले पशुप्रेमियों के सहयोग से 2014 में ‘गायों के लिए सींग जरूरी है’ अभियान (Horn–Cow Initiative) प्रारम्भ हो गया. www.hornkuh.ch लांच होने के बाद तो व्यापक जनसमर्थन मिलना शुरू हुआ और एक सफल हस्ताक्षर अभियान ने एक बार फिर निरीह पशुओं की पीड़ा को जुबां दी. अब तक यह अभियान अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्ख़ियों में स्थान पा चुका था. 2018 आते–आते तक आर्मिन जनमत संग्रह के लिए आवश्यक एक लाख स्विस नागरिकों के हस्ताक्षर प्राप्त करने में सफल हो गए. अंतत: आठ सालों का संघर्ष रंग लाया और स्विस संसद ने 25 नवम्बर 2018 की तारीख जनमत–संग्रह के लिए मुकर्रर कर दी.

स्विट्ज़रलैंड में पशु–पक्षियों के प्रति क्रूरता के विरोध का लम्बा इतिहास रहा है. 1893 में एक जनमत संग्रह द्वारा पशु को बेहोश किए बिना क़त्ल करने पर कानूनी प्रतिबन्ध लगाया गया इसमें ‘हलाल‘ और ‘कोशर’ भी शामिल है. विश्व के इतिहास में स्विट्ज़रलैंड सबसे पहला ऐसा देश है जिसने ‘पशुओं के प्रति आदरभाव‘ (Dignity) को अपने संविधान में शामिल किया है. यहाँ पशुओं को बेवजह पीड़ा पहुंचाने, भयाक्रांत करने, मारने–पीटने, घायल करने, जरुरत से ज्यादा काम में जोतने पर प्रतिंबंध है. पालतू पशु–पक्षियों की ढुलाई केवल रेल या हवाई मार्ग से की जा सकती है चाहे उन्हें क़त्ल के लिए ही क्यों न ले जाया जा रहा हो. बैटरी पिंजरे, सुअर के बच्चों के बधियाकरण और पक्षियों की चोंच काटना अपराध है.

न्यूनतम लागत में अधिकतम मुनाफ़ा कमाना औद्योगिक पशु फार्मिंग (Industrial  animal farming)  का मूलभूत सिद्धांत है. इसकी सबसे बुरी मार निरीह दुधारू पशुओं, मुर्गियों और मछलियों को झेलनी पड़ी है जिन्हें छोटे-छोटे बाड़ों और दडबों में रखा जाता है जहां हिलने–डुलने की भी जगह नहीं होती. इस दमघोंटू वातावरण से परेशान होकर वे एक दूसरे पर आक्रमण करने लगते हैं. सींग-उच्छेदन इसी इंडस्ट्रियल पशु फार्मिंग का नतीजा है. पाश्चात्य जगत में इस फैक्ट्री पशु फार्मिंग का विरोध जोर पकड़ता जा रहा है. उम्मीद है कि जनमत संग्रह का नतीजा गायों के लिए खुली हवा में सांस लेने का पैगाम लेकर आएगा.

स्विट्ज़रलैंड में गायों की पीड़ा के प्रति इस उच्चकोटि की संवेदनशीलता भारत के उन तथाकथित गौ रक्षकों के मुंह पर भी तमाचा है जो गाय का इस्तेमाल केवल धार्मिक उन्माद फैलाने और अपनी साम्प्रदायिक राजनीति चमकाने के लिए करते हैं, बाकी समय सडकों पर आवारा घूमती उनकी गौमाता कूड़े के अम्बार में प्लास्टिक खाकर अपना पेट भरती है या फिर गौरक्षा के नाम पर सरकारी अनुदान को डकार जाने वाले गौ- भक्तों की गौशालाओं में चारे–पानी के अभाव में दम तोड़ देती हैं.

स्विट्ज़रलैंड में प्रत्यक्ष लोकतंत्र प्रणाली है. जनमत-संग्रह के माध्यम से कानून निर्माण प्रत्यक्ष लोकतंत्र का पहला सिद्धान्त है. हालांकि अधिकारिक रूप से स्विस सरकार इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं है परन्तु इसके बावजूद पशुओं की भलाई के लिए आर्मिन के संघर्ष की यह सफलता इस बात का जीता–जागता उदाहरण है कि सभ्य समाजों एवं स्वस्थ प्रजातंत्र में न केवल नागरिक अपितु पशु–पक्षियों की आवाज़ का भी एक समान सम्मान किया जाता है.

 

 

 

 

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