मध्यप्रदेश में 15 साल बाद जब कांग्रेस की सरकार बनी थी तब शुरू में यह आभास हुआ था कि कांग्रेस एक नई राजनीतिक संस्कृति की आधारशिला रखेगी और 1993 से 2003 के दिग्विजयसिंह शासन के दौरान की गई गलतियों को नहीं दोहराएगी।

विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और वह बहुमत से सिर्फ 3 सीट दूर रह गयी तब सरकार बनाने के लिये उसे चार निर्दलीय विधायकों (जो मूलतः कांग्रेसी ही थे और कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी के कारण टिकिट से वंचित रह गए थे) के अलावा बसपा और सपा के एक विधायक की भी आवश्यकता पड़ना स्वाभाविक था। उस समय मैंने एक लेख लिखा था कि ‘कमलनाथ का मुख्यमंत्री बनना क्यों जरूरी है?’ मेरा मत था कि इस विषम स्थिति में कमलनाथ जैसे अनुभवी राजनीतिज्ञ ही अल्पमत की सरकार का कुशलतापूर्वक संचालन कर सकते हैं। लेकिन कमलनाथ ने जिस प्रकार मंत्रिमंडल का गठन किया उससे बहुत निराशा हुई। उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में वरिष्ठ और कनिष्ठ का भेद ही मिटा दिया और प्रशासकीय दृष्टि से नितांत अनुभवहीन मंत्रियों को कैबिनेट मंत्री बना कर नौकरशाही की दया पर निर्भर बना दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि शिवराजसिंह चौहान और भाजपा के प्रति निष्ठावान नौकरशाही को मनमानी करने का अवसर मिल गया।

कमलनाथ ने दूसरी गलती यह कि की निर्दलीय विधायकों और अपनी ही पार्टी के कुछ वरिष्ठ विधायकों को मंत्री पद से वंचित कर उनमें असंतोष के बीज बो दिये। इस परिस्थिति में यदि कांग्रेस की जगह भाजपा को सरकार बनाना होती तो वे पहले निर्दलीय विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करा कर उन्हें मंत्री पद देते, ताकि असंतोष की चिंगारी पैदा ही न हो। इसके बाद वे बसपा और सपा के तीन विधायकों को भी तोड़ लेते जैसा  उन्होंने गुजरात और गोआ आदि राज्यों में किया है।

लोकसभा चुनाव के दौरान कमलनाथ मंत्रिमंडल के 28 में से 22 मंत्रियों के क्षेत्र में कांग्रेस के उम्मीदवार बुरी तरह पराजित हुए हैं। जिनमें तरुण भनोत के विधानसभा क्षेत्र जबलपुर प. में कांग्रेस के दिग्गज उम्मीदवार और राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा 84,252 वोटों से पिछड़ गये। इसी प्रकार जीतू पटवारी के क्षेत्र राऊ में 79,931, डॉ. प्रभुराम चौधरी के क्षेत्र सांची में 69,751, तुलसी सिलावट के क्षेत्र सांवेर में 67,646, प्रियव्रत सिंह के क्षेत्र खिलचीपुर में 54,962, सुखदेव पांसे के क्षेत्र मुलताई में 52,039, प्रद्युमन सिंह तोमर के क्षेत्र ग्वालियर में 53,857, सज्जनसिंह वर्मा के क्षेत्र सोनकच्छ में 46,524, पीसी शर्मा के क्षेत्र भोपाल द-प में 45,963, हर्ष यादव के क्षेत्र देवरी में 44,233 तथा दिग्विजयसिंह के पैतृक निवास और उनके पुत्र जयवर्धन सिंह के क्षेत्र राघोगढ़ में 43,342 वोटों से कांग्रेस के उम्मीदवार अपने प्रतिद्वंद्वियों से पिछड़ गए।

इन मंत्रियों के अलावा डॉ. विजयलक्ष्मी साधो (महेश्वर),  हुक़ूमसिंह कराडा (शाजापुर), बृजेन्द्रसिंह राठौर (पृथ्वीपुर), प्रदीप जायसवाल (वारासिवनी), गोविंद सिंह राजपूत (सुरखी) तथा सचिन यादव (कसरावद) वे मंत्री हैं जिनके क्षेत्रों में कांग्रेस के उम्मीदवार 25 हजार से अधिक वोटों से पिछड़े हैं। कमलेश्वर पटेल (सिंहावल), डॉ. गोविंदसिंह (लहार), महेंद्र सिंह सिसोदिया (बमौरी), लखन घनघोरिया (जबलपुर पूर्व) तथा बाला बच्चन (राजपुर) वे मंत्री हैं जिनके क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों की लीड 10 हजार से कम रही है।

‘मोदी सुनामी’ में सिर्फ छह मंत्री ही ऐसे रहे जिनके क्षेत्रों में कांग्रेस के उम्मीदवारों को लीड मिली। ये हैं – सुरेंद्रसिंह बघेल कुक्षी 35,351, आरिफ अकील भोपाल उ. 24,760, इमरती देवी डबरा 18,780, ओमकार मरकाम डिंडौरी 18,245, उमंग सिंघार गंधवानी 11,216 तथा लाखन सिंह यादव भितरवार 4214 वोट की लीड दिलाकर अपनी नाक बचाने में सफल हुए हैं।

क्या मुख्यमंत्री कमलनाथ इन सभी मंत्रियों को अभी भी अपने मंत्रिमंडल में ढ़ोते रहेंगे या उनमें से अनुभवहीन मंत्रियों को पद से मुक्त कर अपने विधानसभा क्षेत्रों में काम करने के लिये प्रेरित और प्रोत्साहित करेंगे? मेरे मतानुसार वे ऐसा कुछ नहीं कर पाएंगे क्योंकि कांग्रेस के ये विधायक मंत्रीपद छीने जाने को कभी स्वीकार नहीं करेंगे और मुख्यमंत्री के लिये नित नई परेशानियां खड़ी करते रहेंगे। कांग्रेस पार्टी में भाजपा जैसे अनुशासन का नितांत अभाव है। छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में शर्मनाक पराजय के पश्चात अमित शाह ने अपने सभी 10 सांसदों के टिकिट काट दिये, जिनमें रमन सिंह के पुत्र भी शामिल थे। इसके बावजूद विरोध का कोई स्वर नहीं उठा और इसके परिणामस्वरूप छत्तीसगढ़ में कुल 11 में से 09 सीट पर पुनः भाजपा ने जीत हांसिल कर ली। इसलिये जब तक पार्टी के भीतर अनुशासन, समर्पण और निष्ठा नहीं होगी तब तक वह पार्टी सफलता प्राप्त करने से हमेशा वंचित ही रहेगी।

कांग्रेस पार्टी के नेताओं को यह सोचने की भूल नहीं करना चाहिये कि वे अब पांच साल के लिये सत्ता में आ गए हैं तो उसका भरपूर लुत्फ उठायें। उन्हें हमेशा इस बात के लिये सतर्क रहना होगा कि भाजपा कभी भी उनकी सरकार को गिरा कर खुद सत्ता में वापसी कर सकती है। भाजपा के रणनीतिकारों ने अंदरखाने इसकी कोशिश करना आरम्भ भी कर दिया होगा। कांग्रेस पार्टी की विधानसभा चुनाव की सफलता कहीं चार दिन की चांदनी बन कर ही न रह जाये, इसके बाद तो काली और अंधियारी रात पता नहीं कितने बरस लम्बी होगी!

इसलिये मुख्यमंत्री कमलनाथ के लिये कुछ सुझाव हैं –

  1. सर्वप्रथम निर्दलीय विधायकों को मंत्रिपद का ठोस आश्वासन देकर कांग्रेस विधायक दल का सदस्य बनाया जाये ताकि वे भविष्य में दलबदल कर सरकार को अस्थिर न कर सकें। इसके साथ ही बसपा और सपा के विधायकों की समस्याओं और शिकायतों को भी दूर किया जाये।
  1. वे अपने मंत्रीमंडल का पुनर्गठन करें जिसमें मंत्रियों के दो स्तर रखें जैसी कि परम्परा रही है। अनुभवहीन मंत्रियों को वरिष्ठ मंत्रियों के मातहत करें ताकि वे प्रशासन का राजनीतिक अनुभव प्राप्त करें न कि नौकरशाही की बैसाखियों पर ही निर्भर रह कर अपना राजनीतिक कैरियर चौपट कर लें। कुछ मंत्रियों को छोटे विभागों में स्वतंत्र प्रभार का राज्यमंत्री भी बनाया जा सकता है।
  1. सभी मंत्रियों से छह माह का रोडमेप लिया जाये कि वे अगले छह महीने में अपने विभाग में कौनसे लोककल्याणकारी कार्यों को अंजाम दे देंगे। इसके लिये उनके समक्ष कांग्रेस पार्टी का संकल्प पत्र तो रहेगा ही। हर छह माह में मंत्रियों के कार्यों की समीक्षा की जाये। कार्य संतोषजनक नहीं होने पर एक चेतावनी के बाद उन्हें मंत्रीपद से मुक्त कर दिया जाये।
  1. मंत्री और विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र तथा मंत्रीगण अपने प्रभार के जिलों में पूरा समय दें और प्रशासकीय अधिकारियीं की मासिक मीटिंग लेकर जनसमस्याओं का वहीं निराकरण करें। रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार की शिकायतों पर जीरो टॉलरेंस की नीति को वास्तविक धरातल पर उतारा जाये।
  1. ट्रांसफर-पोस्टिंग की एक पारदर्शी नीति बनाई जाए और इनसे सम्बंधित सभी निर्णयों को इंटरनेट पर सर्वसुलभ बनाया जाये। इस सम्बंध में हरियाणा की खट्टर सरकार के अनुभवों का लाभ भी लिया जा सकता है। कांग्रेस के शासन में आने के बाद ट्रांसफर-पोस्टिंग ने पुनः एक उद्योग का स्वरूप ग्रहण कर लिया है। इसपर सख्ती से रोक लगाना बहुत जरूरी है।
  1. मंत्री और विधायक खुद को सामंतवादी मानसिकता से बाहर लाकर एक सच्चे जनप्रतिनिधि के रूप में आम जनता से व्यवहार करें तथा सर्व सुलभ हों। अपने क्षेत्र के उन सभी सार्वजनिक एवं निजी कार्यक्रमों में भागीदारी सुनिश्चित करें जिनमें उन्हें निमंत्रण मिला हो। प्रशासकीय या किसी अन्य व्यस्तता के कारण यदि वे स्वयं उपस्थित नहीं हो सकें तो अपने स्थानीय प्रतिनिधि को या अपने परिवार के किसी सदस्य को अधिकृत करें कि वह उस कार्यक्रम में भाग लेकर उनका प्रतिनिधित्व करे।

इस आलेख में संगठन से सम्बंधित कोई सुझाव नहीं दिया गया है। इसका यह अर्थ नहीं है कि संगठन की दिशा में कोई कार्य करने की आवश्यकता नहीं है। कांग्रेस के संगठन की स्थिति तो सबसे बुरी है। पूरी पार्टी स्थानीय स्तर से लेकर राज्य स्तर तक विभिन्न गुटों में बंटी हुई है। इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के सभी क्षत्रप बुरी तरह पराजित हुए हैं, चाहे वे दिग्विजयसिंह हों, या ज्योतिरादित्य सिंधिया, अजय सिंह, अरुण यादव या विवेक तन्खा हों। इसलिये अब इन सभी के पास आत्ममंथन करने का पूरा समय और अवसर है।

कांग्रेस के पूरे संगठन को पुनर्जीवित ही नहीं करना है बल्कि उसका पुनरुद्धार करना भी जरूरी है। इसके लिये सबसे पहले व्यक्तिवादी चाटुकारिता और दलाल प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना होगा। कांग्रेस सेवादल को पुनर्जीवित करना होगा। कांग्रेस सेवादल में ऐसे लोगों की भर्ती करना होगी जो चुनाव और सत्ता की राजनीति से अलग हट कर कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करें और उन्हें कांग्रेस की गांधीवादी विचारधारा से अवगत कराएं। कांग्रेस सेवादल के कार्यकर्ताओं को पार्टी के भीतर उचित सम्मान दिया जाये तथा उनकी बातों को ध्यानपूर्वक सुना जाये और उसपर अमल भी हो। कांग्रेस पार्टी के नेताओं में जिस सेवाभाव का पूर्ण अभाव हो गया है उसमें बुनियादी बदलाव लाना होगा। उनका जनता से सीधा जुड़ाव जब तक नहीं होगा तब तक पार्टी का संगठन भी गतिशील नहीं हो पायेगा। इसलिये संगठन और विचारधारा को मजबूत करना पहली प्राथमिकता होना चाहिये। मैं योगेंद्र यादव के इस मत से सहमत नहीं हूं कि कांग्रेस को मर जाना चाहिये (Congress shall die)। इतनी विशाल पराजय के बाद भी कांग्रेस में पुनर्जीवित होने के पूरे अवसर हैं। पार्टी का संगठन देश के लगभग सभी राज्यों में आज भी विद्यमान है। जरूरत उसमें रक्त संचार करने की है और उसे आवश्यक विटामिन देने की है। यह कार्य कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को करना होगा। लेकिन मध्यप्रदेश राज्य के स्तर पर ऊपर दिये गये सुझावों को यदि अमल में लाया जाता है तो इसका प्रभावकारी परिणाम अवश्य दिखाई देगा।

 

 

 

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