लोकसभा चुनाव के नतीजे आए और नई सरकार बने को एक माह से अधिक हो गया है। देश का प्रतिपक्ष अरविंद केजरीवाल जैसे अपवाद को छोड दें तो पूरी तरह लकवाग्रस्त होकर पडा हुआ है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा, राजद आदि दल अभी भी सुधरने को तैयार नहीं हैं और अपने-अपने कारणो से पतन के गर्त मे जा रहे हैं। वह जिस नरेंद्र मोदी को तानाशाह करार दे रहा था, वह चुनाव में लोकतंत्र की पताका फहरा रहे हैं। प्रतिपक्ष की दिशाहीनता ही लोकतंत्र की सबसे हमारे लोकतंत्र की सबसे बडी कमजोरी बन गई है। यह स्थिति देश हित में ठीक नही है। इसे सिर्फ एक घटना से समझा जा सकता है कि 2018 दिसंबर में पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हारते ही मोदी सरकार ने 20 से अधिक वस्तुओं पर पर जीएसटी की दरें घटा दी थी। अपने सहयोगी दलों को जिन्हें 2014 की जीत के गुरुर के चलते छिटका दिया था, उनके आगे झुकते हुए उनसे दोस्ती कर ली थी। आज स्थिति यह है कि पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों ही भाजपा है। जनता की स्थिति ‘जाएं तो जाएं कहां, समझेगा कौन यहां दर्द भरे दिल की जुबां’ की तरह बनी हुई है।

यूरोप-अमेरिका आदि देशों में सत्ता परिवर्तन पर जीत की खुशी और हार का गम हमारे यहां जैसा नही होता है। कारण कि सरकार और नेता बदलने पर वहां पर नेता की जिन्दगी पहले की तरह ही ज्यों की त्यों रहती है। हमारे देश में सत्ता से हटते ही नेता की पार्टी, घर, परिवार, दोस्त, भागीदार और समर्थकों की जिन्दगी से अवैध पैसा और पावर दोनों चले जाते है। हर नई सरकार बेहतरी की उम्मीद से आती है लेकिन वह जनता की हालत को और बदतर करके चली जाती है। उत्तर प्रदेश हो या बिहार, इलाज के अभाव में मरते बडे और बच्चे हमारे लोकतंत्र पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं और उसे अधूरा या अपरिपक्व करार देते हैं।

2019 का लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने ऐतिहासिक आपराधिक भूमिका निभाई है। नरेंद्र मोदी का जीत और कांग्रेस सहित समूचे प्रतिपक्ष के धराशायी होने की सबसे बडी वजह कांग्रेस का अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोडना रहा, जो देश की सबसे बडी प्रतिपक्षी पार्टी है। यदि राहुल गांधी ने पुलवामा हमले में बीएसएफ के 42 जवानों के मरने के बाद सरकार की नाकामी के खिलाफ देशभर में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को सडकों पर उतारकर देश के गृहमंत्री से इस्तीफा मांगा होता, यदि रॉफेल घोटाले की संसदीय जांच की मांग को लेकर दिल्ली के रामलीला मैदान पर सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तारी दी होती, यदि नोटबंदी को त्रासदी करार देते हुए देशभर में आंदोलन छेड दिया होता, यदि किसानो की मौत, नौजवानों की बेरोजगारी और दलित तथा अल्पसंख्यकों के उत्पीडन के दर्द को महसूस करते हुए जुबानी जमा-खर्च के बजाय सडक पर उतर कर पुलिस की दो लाठियां भी खाई होती, तो जनता महसूस करती कि कांग्रेस को हमारी तकलीफों को अहसास है और वह भी हमारे दर्द में भागीदार है।

शरद यादव ने तीन वर्ष पूर्व साझा विरासत बचाओ कार्यक्रम के माध्यम से दिल्ली, इंदौर, जयपुर और मुम्बई में सम्मेलन करके प्रतिपक्षी दलों को एकजूट करने की मुहिम चलाई थी और एक सक्षम विकल्प का रास्ता तैयार किया था। कांग्रेस को चाहिए था कि वह उनकी उस पहल के आधार पर न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाकर एक व्यापक गठबंधन तैयार करती और फिर जनता के बीच जाती। लेकिन कांग्रेस ने भाजपा की घटिया फोटोकॉपी बनना पसंद किया। नतीजा यह रहा कि जनता ने उसे बेरहमी से नकार दिया। कांग्रेस की सबसे करारी हार वहीं पर हुई है जहां-जहां उसका भाजपा से सीधा मुकाबला था। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ में महज तीन महीने पहले विधानसभा चुनाव में मिली जीत को भी वह लोकसभा चुनाव में बरकरार नहीं रख पाई। दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उड़ीसा, कर्नाटक आदि सभी राज्यों में उसका सफाया हो गया। सिर्फ पंजाब और केरल ही उसकी लाज बचाने की कोशिश की।

उत्तरप्रदेश और बिहार में मुलायम-अखिलेश, लालू, तेजस्वी, मायावती की हकीकत को जनता ने पहचाना। इनके परिवारवाद से त्रस्त होकर दलित, पिछडे तो तो इनसे पहले ही दूर हो गए थे। इस बार दलितों में बचे-खुचे जाटव और पिछड़ो में यादव भी उनसे दूर हो गए। इनके परिवारवाद और 10-20 सांसदों के भरोसे प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने की मूर्खता के चलते नरेंद्र मोदी की तमाम वादा खिलाफी और नाकामियों को जनता ने नजरअंदाज कर दिया।

जनता सब जानती है। उसने आज के विजेता मोदी-शाह को आम चुनाव से पहले लोकसभा के 11 उपचुनाव और पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव हराए थे। लेकिन जब बात दिल्ली सरकार की आई तब जनता ने बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय दिया। जनता ने देखा कि जो विपक्षी नेता और दल चुनाव पूर्व ही एक-दूसरे पर हमले कर रहे है, वे सरकार बनाकर आपस में लडेंगे या देश के दुश्मनों से लडेंगे। वे आतंकवाद की चुनौती का मुकाबला कैसे करेंगे?

जनता यह जानती थी कि मोदी अपनी दुकान पर कोई शुद्ध दूध नहीं बेच रहे हैं। वह यह भी जानती थी कि कांग्रेस और बाकी प्रतिपक्षी दल भी कोई दूध के धुले नही है। मिलावट दोनों में ही है। जो दल सबल प्रतिपक्ष नही बन सकता है, जो गांधी की बात करता है लेकिन गांधी के सत्याग्रह की अवधारणा से दूर रहता है, वह देश को एक जिम्मेदार सरकार कैसे दे सकता है। जिसकी उम्र 125 वर्ष है, जो देश की सबसे बड़ी पार्टी है, वह अहंकार और अति आत्मविश्वास का शिकार होकर अन्य दलों को एकजूट करने की अपनी जिम्मेदारी से भागती रही। अपने पुराने वैभव की याद में खोकर वह यह भूल गई कि उसकी भव्य इमारत खंडहर बन चुकी है। उसके पास अनुभवी नेताओं पूर्व मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों का एक बड़ा समूह है, लेकिन उसकी हठधर्मिता और भोग विलास ने उसे जनता से दूर कर दिया है। जनता ने देश-काल-परिस्थिति के मद्देनजर अपना फैसला सुना दिया।

एक समय था जब संसद में प्रतिपक्ष के हमलों से सरकार हिल जाया करती थी लेकिन पिछले पांच वर्षों वह प्रतिपक्ष संसद में कहीं दिखाई नहीं दिया और सडक से भी उसने अपना नाता तोड लिया। अभी-अभी लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने जो भाषण दिया, वह बेहद लचर और अपरिपक्व था। उनका यह कहना बचकानापन था कि मोदीजी आप सोनिया जी और राहुल जी को जेल नहीं भेज सके। उन्हें तो यह कहना चाहिए था कि आपने गलत तरीके से जेल भेजने की पहले भी कोशिश की और अभी भी करेंगे, लेकिन हम आपको ऐसा करने नहीं देंगे। मोदी ने उन्हें आपातकाल का काला अध्याय याद दिला दिया। साथ ही यह कहते हुए लोकतंत्र का झंडाबरदार बना दिया कि जेल भेजने का काम सरकार नहीं, बल्कि न्याय पालिका करती है।

मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस की जो हैं, वे कोई जन संघर्षों के बूते नहीं बनी हैं। वे सिर्फ नोटबंदी और जीएसटी से उपजी दुश्वारियां झेलते आम लोगों, बदहाल किसानों और परेशान बेरोजगार नौजवानों द्वारा परिवर्तन के लिए दिए गए वोट से बनी सरकारें हैं। छत्तीसगढ में जरूर मुख्यमंत्री बने भूपेश बघेल ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ सड़को पर जनता के लिए आंदोलन किए थे, जेल यात्राएं की थी। उसके पुरस्कार स्वरूप जनता ने उनमें भरोसा जताया और वहां कांग्रेस के पक्ष में जनादेश दिया। इसलिए कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि वह अपनी जड़ो की और लौट आए। उसे गांधी से जुड़ना होगा। गांधी की सत्याग्रह की अवधारणा के साथ आंदोलन करना होगा। पार्टी अपने आप बन जाएगी और जनता भी उससे फिर जुड जाएगी।

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