चिदंबरम के फंसने से कांग्रेस के कई नेता खुश

जाहिरा तौर पर भले ही कांग्रेस के तमाम बडे नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम की गिरफ्तारी पर रोष जता रहे हो, मगर भीतर ही भीतर ज्यादातर नेता खुश है। उनका मानना है कि चिदंबरम ने सरकार में रहते हुए अपने कॉरपोरेट यारों को फायदा पहुंचाने के लिए खूब मनमानी की। उन्होंने खूब पैसे कमाए और अपनी पार्टी के समर्थकों को जेल भेजा। आर्थिक मामलों के जानकार कांग्रेस नेताओं का कहना है कि बैंकों के मौजूदा संकट के लिए भी चिदंबरम ही बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। कांग्रेस के नेता मानते है कि गृह मंत्री के रूप में नक्सल प्रभावित इलाकों में ऑपेशन ग्रीन हंट चलाना भी उनकी कारोबारी रणनीति का हिस्सा था। उन्होंने बड़ी कंपनियों को जमीन, खदान आदि दिलाने के लिए यह अभियान चलाया था। कई कांग्रेस नेता इसलिए भी चिदंबरम से नाराज हैं कि वे खुद तो राज्यसभा में हैं ही, बेटे कार्ति चिदंबरम को भी उन्होंने टिकट दिला दिया और वे भी सांसद बन गए। बेटे को टिकट दिलाने के लिए चिदंबरम ने क्या तमाशा किया था, इसका जिक्र खुद राहुल गांधी ने कांग्रेस कार्यसमिति में किया था। इन्हीं सब कारणों से कांग्रेस नेता खुश है और कह रहे हैं कि चिदंबरम के साथ प्राकृतिक न्याय हो रहा है।

खुद को ‘ठाकुर साहब’ साबित करने के मूड में

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को आमतौर पर नपा-तुला बोलने और विवादों से दूर रहने वाला नेता माना जाता है। उनकी इसी अदा से वे लोग भी उनके मुरीद हैं जो भाजपा को नापसंद करते हैं। लेकिन इन दिनों वे खुद को ‘ठाकुर साहब’ साबित करने में जुटे हैं। उनके तेवर खासे आक्रामक हैं। हाल ही में उन्होंने बयान दिया कि ‘परमाणु हथियार पहले इस्तेमाल न करने की नीति भारत बदल भी सकता है।’ इसके बाद उनका अगला बयान आया कि ‘अब पाकिस्तान से सिर्फ पीओके को लेकर ही बात होगी।’ इन दोनों बयानों को उनकी छवि के विपरीत माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि राजनाथ का तेवर बदलना उनकी राजनीतिक मजबूरी बना है। कश्मीर मुद्दे ने जहां अमित शाह का कद पहले से कहीं ज्यादा बढा दिया है, वहीं राजनाथ एकदम हाशिए पर चले गए। कश्मीर का मुद्दा पाकिस्तान से जुड़ा होने की वजह से उस पर कमजोरी दिखाने का राजनीतिक संदेश नुकसान पंहुचाने वाला हो सकता है, इस वजह से राजनाथ को अपने तेवर आक्रामक करने पड़े। वे यह संदेश देने की कोशिश में हैं कि न ही उनका महत्व कम हुआ है और न ही वह कठोर फैसला लेने से बचने वालों में हैं।

सोनिया की नई टीम कैसी होगी?

सोनिया गांधी को कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष चुने जाने के बाद इस बात को लेकर अटकलें शुरू हो गई हैं कि उनकी टीम कैसी होगी। क्या राहुल गांधी के नियुक्त किए संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल को हटा दिया जाएगा और उनकी जगह कोई नया संगठन महासचिव नियुक्त होगा? सबसे अहम सवाल यह है कि क्या अहमद पटेल फिर से कांग्रेस अध्यक्ष के राजनीतिक सचिव बनेगे? फिलहाल वे पार्टी के कोषाध्यक्ष हैं। अगर उनको राजनीतिक सचिव बनाया जाता है तो कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी किसे दी जाएगी? किसी को अंदाजा नहीं है कि पार्टी मे पुराने और नए नेताओं का कैसा संतुलन बनेगा। राहुल गांधी के करीबी नेता मान रहे हैं कि राहुल की बनाई टीम ही काम करती रहेगी। सोनिया गांधी इसमें ज्यादा फ़ेरबदल नहीं करेगी। जिस तरह राहुल ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभालने के बाद एक झटके में संगठन में बदलाव नहीं किया था उसी तरह सोनिया गांधी भी नहीं करेंगी। धीरे-धीरे कुछ पदाधिकारी बदले जाएंगे, कुछ हटाए जाएंगे और कुछ नई नियुक्तियां होंगी। सबसे पहले राज्यों में प्रदेश अध्यक्ष बदले जाएंगे। उसके बाद प्रभारी और सह प्रभारियों की नियुक्ति में फेरबदल होगा। इस दौरान पार्टी के पुराने नेताओं का दांव प्रियंका गांधी पर रहेगा और वे उनके जरिए अपने लोगों को समायोजित कराने की कोशिश करेंगे।

माया का ‘एमवाय’ समीकरण

आने वाले कुछ समय में उत्तर प्रदेश की दर्जन भर विधानसभा सीटों के उपचुनाव होने हैं। इन चुनावों के जरिए साबित होगा कि भाजपा के खिलाफ राज्य में मुख्य पार्टी कौन है। ऐसे में बसपा ने समाजवादी पार्टी के कोर वोट बैंक मुस्लिम-यादव (एमवाय) के लिए एक बड़ा दांव खेला है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने लोकसभा मे पार्टी के नेता पद पर से दानिश अली को हटाकर श्यामसिंह यादव को नियुक्त कर दिया है, जो जौनपुर से सांसद हैं। वैसे यह भी कहा जा रहा है कि संसद के पहले ही सत्र में दानिश अली ने सदन में जो तेजी दिखाई, उससे मायावती खुश नहीं थी। इसलिए देर-सबेर उनका हटना तय था। लेकिन बहनजी ने उनको हटाने के बाद श्यामसिंह यादव को लोकसभा मे पार्टी का नेता बनाया और मुनकाद अली को उत्तर प्रदेश अध्यक्ष बनाने का दांव खेल दिया। उनका यह दांव कितना कारगर होगा, यह तो वक्त बताएगा लेकिन फिलहाल तो उन्होंने समाजवादी पार्टी को परेशान कर दिया है। पार्टी के कुछ नेताओ की राय है कि अखिलेश यादव को भी बहनजी को बेचैन करने के लिए राज्य में पार्टी की कमान किसी दलित नेता को सौंप देनी चाहिए।

मंत्रियों को ओएसडी चुनने की आजादी भी नहीं

केंद्र में दूसरी बार मोदी सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय पीएमओ का दबदबा इस कदर बढ गया है कि मंत्रियों के लिए अपनी पसंद का ओएसडी तैनात करना भी आसान रहा। कई वरिष्ठ मंत्रियों की सिफारिश को पीएमओ खारिज कर चुका है और कई ऐसे मंत्री हैं जिनकी सिफारिशें लंबित पडी हैं। पीएमओ की तरफ से कुछ मंत्रियों को सलाह दी गई है कि अगर उन्हें यह लगता है कि उनके ओएसडी नियुक्त करने के प्रस्ताव के रद्द हो जाने से उनकी भद पिटती है तो फिर उन्हें प्रस्ताव भेजने से पहले अनौपचारिक रूप से चर्चा कर लेनी चाहिए। अगर नाम पर सहमति बन जाती है तभी औपचारिक प्रस्ताव भेजा जाना चाहिए। दूसरी सलाह यह दी गई है कि अगर ओएसडी रखने के पीछे अपने किसी अधिकारी को साथ रखने की छुपी मंशा न हो तो फिर पीएमओ से ‘ओके’ अधिकारियों की सूची में से किसी को भी ओएसडी रखा जा सकता है। बताया जाता है कि मंत्रियों को दोनों ही सलाह पसंद नही आईं। मंत्रियों को लगता है कि प्रस्ताव से पहले नाम पर चर्चा करने से शुरुआती दौर में ही मामला अटक सकता है। पीएमओ की सूची में शामिल अधिकारियों के नाम मंत्रियों को रास नहीं आ रहे हैं। यानी फिलहाल मामला फंसा हुआ ही है।

तमिल राजनीति अब फिल्मी सितारों से मुक्त

लगता है तमिलनाडु में फिल्मी छवि के बूते राजनीति करने के दिन अब लद गए हैं। तमिल फिल्मों के दो सुपर सितारों की ‘राजनीतिक फिल्म’ सुपर फ्लॉप हो चुकी है। असल में फिल्म जगत से जुडे रहे एम. करुणानिधि और जयललिता के निधन के बाद रजनीकांत और कमल हसन को राज्य की राजनीति में अपने लिए मौका दिख रहा था, मगर चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि कम से कम अगले चुनाव तक तो इन दोनो के लिए कोई मौका नही हैा। इनसे पहले फिल्म स्टार विजयकांत भी पार्टी बना कर चुनाव लडे थे, पर एक चुनाव में मिली आंशिक सफलता के बाद उनकी पार्टी भी खत्म हो गई। रजनीकांत और कमल हसन दोनों ही पार्टी बना कर फंस गए है। हाल ही में विधानसभा की 20 सीटों के लिए हुए उपचुनाव के नतीजों से साफ हो गया है कि राज्य में मुकाबला द्रमुक और अन्ना द्रमुक का ही है और उसमें किसी नई पार्टी के लिए कोई जगह नहीं है। विधानसभा के उपचुनाव लडकर टीटीवी दिनाकरण ने जरूर अपनी ताकत दिखाई पर कमल हसन की पार्टी के लिए कोई मौका नहीं बना। अब माना जा रहा है कि रजनीकांत भाजपा के साथ जाएंगे। दूसरी ओर कमल हसन अपनी पार्टी के साथ द्रमुक-कांग्रेस गठबंधन में शामिल हो सकते हैं। यह भी संभव है कि दोनों राजनीति से दूरी बना ले।

बागी तेवर दिखाना रूडी को महंगा पडा

बिहार के भाजपा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूड़ी का दांव उलटा पड गया। लोकसभा चुनाव जीतने के बाद जब उनको मोदी सरकार में मंत्री नहीं बनाया गया तो उन्होंने बागी तेवर अख्तियार कर लिए थे। वे लोकसभा में अपनी ही सरकार के मंत्रियों से भिडने लगे थे। बिहार में पर्यटन को लेकर वे प्रहलाद पटेल से भिड गए तो एक मौके पर कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के साथ उलझ गए। लोकसभा में जब भी उन्होंने सरकार को घेरने वाले भाषण दिए तो विपक्ष के सांसदों ने मेजें थपथपा कर उनका स्वागत किया। गौरतलब है कि रूडी को पिछली सरकार में भी शुरुआत मे मंत्री नहीं बनाया गया था और जब बनाया भी तो थोडे समय बाद ही हटा भी दिया गया था। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले उनकी नाराजगी दूर करने के लिए उनको पार्टी का प्रवक्ता नियुक्त किया गया। पर दोबारा सरकार बनी तो मंत्री नहीं बनाया गया। इसीलिए उन्होंने दबाव बनाने के लिए सरकार की आलोचना का रास्ता अपनाया। मगर यह दांव उलटा पड गया। वे मंत्री तो नहीं ही बने, किसी महत्वपूर्ण संसदीय कमेटी की अध्यक्षता भी उन्हें नहीं मिली। पिछली सरकार में पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी संसद की इस्टीमेट कमेटी के चेयरमैन थे। इस बार उस कमेटी के लिए रूड़ी का नाम था। मगर उन्होंने सरकार विरोधी तेवर दिखाए तो यह पद भी उनसे दूर रह गया।

चलते-चलते

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी, पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश और शशि थरुर ने कहा कि हमें नरेंद्र मोदी को खलनायक न मानकर उनके अच्छे कामों की तारीफ भी करनी चाहिए। पी. चिदंबरम की गिरफ्तारी के बाद आए इन तीनों नेताओं के इस बयान को राजनीतिक गलियारों में उनकी ‘अग्रिम जमानत का आवेदन’ माना जा रहा है।

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