पुरी दुनिया में मध्यमवर्ग की  बड़ी अहम् भूमिका रही है। सामाजिक बदलाव की पहल मध्य वर्ग के चेतना संपन्न लोगों ने की। यूरोप का पुनर्जागरण हो या भारतीय समाज का पुनर्जागरण हो , मध्य वर्ग की भूमिका बेहद प्रभावी रही। फ्रांस की पहली राज्यक्रांति  हो या अमेरिका का स्वतंत्रता आंदोलन हो या भारत की आज़ादी की लड़ाई हो सभी जगह मध्यमवर्ग ने बड़ी प्रगतिशील भूमिका निभाई। इतिहास के इस स्वर्णिम पक्ष को हम देखें तो मन आश्वस्त होता है।
बीसवीं सदी के अंतिम दो दशक से मध्यमवर्ग की समाजिक परिवर्तन में प्रगतिशील भूमिका सहसा शिफ्ट हो गई। अचानक मध्य वर्ग जड़, पुनुरुत्थानवादी , लोभी, जातिवादी,धर्मान्ध और प्रतिगामी हो गया।  अचानक हुए इस शिफ्ट के लिए समाज का इतर वर्ग कतई तैयार नहीं था, संभवतः इसी के कारण अन्यवर्ग इस शिफ्ट का एंटीडोज़ या प्रतिरोध अभी तक इवाल्व नहीं कर पा रहा है। जैसा कि विदित है निम्न वर्ग मध्य वर्ग के आदर्शों का ही अनुसरण करता है। उसकी प्रगतिशीलता को वह तेज़ करता है। बीसवीं सदी के अंतिम दो दशक से जो विश्व में आर्थिक बदलाव हुए उसका (ट्रिकल डाउन थियरी के तहत )  अधिक लाभ मध्य वर्ग को मिला। अनपेक्षित धन, वह भी बिना श्रम के इस वर्ग की राजनीतिक चेतना को न केवल प्रभावित किया , अपितु बहुत हद तक उसे प्रतिगामी बनाया।  न्यू इकानॉमिक पॉलिसी के अमलीकरण के बाद  उसकी चारित्रिक विशेषताएं भारत में ही नहीं विश्व में भी बदली हुई दिखाई दे रही हैं। उन्नीसवीं सदी के अंतिम तीन दशकों में भारत के मध्य वर्ग में सामाजिक  व राजनीति चेतना का जिस तेजी से उभार हुआ वह बेहद महत्वपूर्ण था।  इन्हीं दशकों में शिक्षा का प्रसार हो ना शुरू हुआ और वह भी वैज्ञानिक चेतना का से लैस बुद्धिजीवी पैदा हुए।  फुले,ईश्वर चंद विद्यासागर,  विवेकानंद जे सी बोस , प्रफुल्ल चंद्र राय , टैगोर , मेधनाथ साहा, डी  एन नौरोजी, , देउस्कर , तिलक, गोखले आदि उसी दौर के आइकन हैं। आगे चलकर  पटेल , नेहरू, सुभाष, डांगे, आम्बेडकर , भगत सिंह, आज़ाद, और ऐसे ख्याति अख्याति लाखों लोगों ने न केवल आज़ादी के लिए संघर्ष किया, अपितु सामाजिक उत्थान में भी महती भूमिका अदा की।
 दुर्भाग्य से बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में जिस तरह से मध्यमवर्ग में लोलुपता, प्रदर्शन, जड़ता अशिक्षा , (साक्षरता बढी है, शिक्षा, वैज्ञानिक चेतना, सांस्कृतिक चेतना)बढ़ी है , वह  समाजविज्ञानियों को अचरज में डालती है। आज़ का मध्यमवर्ग बेहद आत्मकेंद्रित, क्रूर , ठस और धर्मांध हुआ है।  उसे न तो पी.वी.काणे के धर्म शास्त्र के इतिहास का पता है न सातवेलकर के वेदों के संपादन व टीका का ही पता है। वह न तो उपनिषद जानता है और न ही महाभारत व रामायण के आध्यात्मिक, भाषिक , लौकिक अर्थ गांभीर्य और न ही उसमें प्लावित विश्व स्तर की कविता व उसके काव्य वैभव से परिचित है। वह दर्शन की विभिन्न सरणियों को तो छोड़ ही दें।  वह अपनी पाठयपुस्तकों के भाषिक व लौकिक बोध से भी आश्चर्यजनक रूप से अनभिज्ञ है। कहा जाता है कि यदि आप समाज को पिछड़ा बनाए रखना चाहते हैं तो उसे ज्ञान-विज्ञान व उसकी उज्ज्वल परंपरा से काट दें। आज़ जिस तरह से धार्मिक जड़ता, कट्टरता व अश्लील प्रदर्शन बढ़ा है , वह बीसवीं सदी के प्रारंभ में भी नहीं था।  आज़ जिस तरह से अइतिहास को इतिहास बनाकर पेश किया जा रहा है , उसे टेक्निकल लिट्ट्रेट जिस तरह से आत्मसात कर रहे हैं, उसे जिस तरह से विश्वसनीय मान कर आचरण में प्रर्दशित कर रहे हैं , वह वाकई बेहद चिंतित करने वाला मंजर है।  आप एक रूपक देखिए।
आज़ अस्सी प्रतिशत ऐसे लोग हैं , जो हाथ में रक्षा धागा बांधते हैं, जो बेहद गंदा , बे रंग , व खंडित रहता है। लाल या सिंदूरी टीका इतना भड़कीला व असुंदर , जिसका सौन्दर्य से  दूर -दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। शूट पहनने के बाद पगड़ी और ललाट पर विद्रूप टीका, हर सप्ताह  कानफोडू  संगीत के साथ जगराता, विवाह समारोह हो या, धार्मिक समारोह, आक्रामक सौन्दर्य विहीन , पर्यावरण  विनाश के अयवय का भद्दा व मारक प्रदर्शन । राजनीति, अर्थशास्त्र, साहित्य, आध्यात्म, संगीत -कला के प्रति परले दर्जे की उदिसीनता व मुतमईनी।  जातिगत घृणा की हिंसक अभिव्यक्ति, स्वाभिभान की तो छोड़िए,  श्रेष्ठताबोध के गर्व-घमंड से चूर आप को मध्यवर्ग की छवियां दिखाई देंगी। सहिष्णुता, दया , क्षमाशीलता , अध्ययन, अहिंसा, विनम्रता, समन्वय सामंजस्य आदि का इन व्यक्तित्वों में सर्वथा अभाव ही नहीं दिखेगा, अपितु ये जीवन मूल्य इनके लिए अभारतीय व कायरता की निशानी हैं। स्त्रियों , दलितों के प्रति हिकारत और यूज़ एंड थ्रो वाला रवैया आप को दिखाई देगा। इस शिफ्ट कीसबसे भयानक अभिव्यक्ति , क्रूरता, हिंसा व असंवेदनशीलता का स्थाई रूप से समाज में एक मूल्य के रूप में प्रतिस्थापित होना भारतीय समाज के लिए बेहद ख़तरनाक है, जो भविष्य में गृह युद्ध का आह्वान करेगा।

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