समाज

वैचारिक अंधकार के दौर से गुजरता भारत

‘मिलेनियम सोशलिस्ट’…आजकल यूरोप में यह शब्द बहुत चर्चा में है। अमेरिका में इसी से मिलता-जुलता अर्थ रखने वाला शब्द अधिक प्रचलन में है…’मिलेनियम लेफ्ट’। सामान्य तौर पर इसका अर्थ है ऐसे युवा, जिन्होंने नई सहस्राब्दी में होश संभाला और अपनी सरकारों की आर्थिक नीतियों के नतीजों में जिस तरह के समाज का विकास देखा उससे वे असंतुष्ट हैं और चाहते हैं कि हालात बदलें। लेकिन…अफसोस…हमारा देश वैचारिक अंधकार के दौर से गुजर रहा है। कमजोर वर्गों का राजनीतिक विभाजन और ‘मिलेनियम यूथ’ की मति का नव औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा हरण हमारी त्रासदी का रूप ले चुका है।

यह जश्न मनाने का नहीं, सोचने का वक्त है!

जब 90 प्रतिशत या उसके आसपास अंक लाने पर छात्र उदास हो जाए और अभिभावक चिंतित हो जाएं तो समझना चाहिये कि चीजें गलत दिशा में जा रही हैं। यह दूसरी, तीसरी क्लास की नहीं, 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं का मामला है। 500 में 499, 498, 497…नहीं, यह सही नहीं। कुछ न कुछ तो ऐसा है जिसे लेकर अकादमिक नियंताओं को सोचना होगा।

युद्धोन्माद की यह लहर उत्तर भारत में ही क्यों बहती है?

इन दिनों समूचा उत्तर भारत युद्धोन्मादी अंधराष्ट्रवाद की चपेट में है। हर तरफ से मार दो-काट दो, घर में घुसकर मार दो, पाकिस्तान को नेस्तनाबूद कर दो जैसी पागलपन भरी चीखें सुनाई दे रही है। इसके उलट दक्षिण, पश्चिम और पूर्वोत्तर भारत के तमाम राज्य इस उन्मादी लहर से आज ही नहीं बल्कि हमेशा ही लगभग अछूते रहते हैं। उत्तर और शेष भारत में इस मोटे फर्क की वजह आखिर क्या है?

लोगों की जानें कब तक पीती रहेगी जहरीली शराब?

जहां शराबबंदी हो, वहां तो अवैध शराब का कारोबार चलना समझ में आता है, लेकिन शराब पर प्रतिबंध न होने के बावजूद ऐसे राज्यों में अवैध शराब के समानांतर तंत्र का अस्तित्व में होना हैरान करता है। आख़िर, देसी शराब बनाने से लेकर ठेकों तक पहुंचाने और वहां 20-25 रुपए से लेकर 40-50 रुपए तक अलग-अलग दामों पर बेचने का काम बडे पैमाने पर होता रहे और पुलिस को और प्रशासनिक अधिकारियों को इसकी भनक भी न हो, ऐसा तो हो नहीं सकता। शराब के नाम पर जो कुछ बनाया और बेचा जा रहा है, उसे जहर के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि इसे बनाने के लिए इथेनॉल, मिथाइल एल्कोहल समेत ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन और यूरिया, आयोडेक्स जैसी तमाम खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है।

जाति और योनि के कठघरे में जकडा भारतीय समाज

भारतीय समाजवादी के आंदोलन विशिष्ट नेता और प्रखर चिंतक-विचारक डॉ. राममनोहर लोहिया ने भारत के पिछडेपन के दो प्रमुख कारणों की शिखाख्त की है- एक, जाति व्यवस्था और दूसरी स्त्री को गुलाम बनाए रखने की प्रवृत्ति। उनका मानना था कि जाति और यौनि के कटघरों में जकडे रहने की वजह से ही भारत का सदियों पुराना इतिहास एक पराजित समाज का इतिहास रहा है। इन दिनों मीटू अभियान के तहत जारी बहस में डॉ. लोहिया का यह व्याख्यान भी गंभीर हस्तेक्षप करता प्रतीत होता है। उन्होंने यह व्याख्यान 65 वर्ष पूर्व 1953 में दिया था। पेश है उस व्याख्यान का पहला भाग।

मी-टू की बारिश में भींगता भारत

समाजवादी विचारक डा राममनोहर लोहिया ने कहा था कि जोर-जबर्दस्ती और वादा-खिलाफी यानि रिश्ते में फरेब को छोड़ कर औरत-मर्द रिश्ते में सब कुछ जायज है। मी-टू आंदोलन के तहत आ रही शिकायतों को जांचने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता है। डा लोहिया जाति भेद और लिंग-भेद को भारत में गैर-बराबरी का सबसे बड़ा आाधार मानते थे। इस आंदोलन से औरतों को कितनी बराबरी मिलेगी, यह कहना मुश्किल है। लेकिन उनकी मुक्ति का ऐसा दरवाजा इसने जरूर खोला है जो उन्हें देखने का हमारा नजरिया बदल देगा।

‘मी टू’ में सहमति और जबरदस्ती का यह कैसा घालमेल!

#MeToo का नारा बुलंद करने का नैतिक अधिकार केवल उन महिलाओं को है जिन्होंने यौन शोषण या यौन शोषण की मांग के सामने घुटने टेकने से इनकार करते हुए अपने करियर की बलि दे दी हो. जरूरी यह भी है कि आपसी सहमति से बनाए गए यौन सम्बन्ध और यौन शोषण/उत्पीड़न को तराजू के एक पलड़े में रखने की गलती से बचा जाए.

यह किस तरह का राष्ट्रवाद या ‘गुजरात मॉडल’ है?

जो लोग अपनी धरती, अपना गांव, अपने माता-पिता और पत्नी-बच्चों को छोड़कर उनके भरण-पोषण की जुगाड में देश के महानगरों या दूसरे राज्यों में जाते हैं, वहां वे अपने रोजगारदाताओं की गालियां तथा तरह-तरह की झिडकियां और उलाहने सुनते-सहते हुए हाडतोड मेहनत कर रोजी-रोटी कमाते हैं। ऐसे जब उन्हें पिटाई और निर्वासन की पीडा से दो-चार होना पड जाए तो किसे दोष दिया जाए? वे किस विकसित होते भारत पर गर्व करे और किस भारतमाता की जय बोले?

गुजरात में पीट कर भगाए जा रहे पूरबिया लोगों की त्रासद हकीकत

होंगे भारत के कोने-कोने में बिहारी अफसर, प्रोफेसर। बिहार की पहचान तो किसी महानगर, किसी विकसित राज्य में जाकर दिहाड़ी मजदूरी करने वाला वंचित समुदाय है। जमाने भर से छला गया वर्ग। इसके साथ इसके राज्य के, इसकी जाति के नेताओं ने छल किया है, वह मालिक भी छल कर रहा है जिसके काम में वह लगा है, वह रेलवे भी इससे छल करता है जो एक टिकट का पूरा दाम लेकर इसे बैठने को एक सीट तक नहीं देता, पूरी व्यवस्था ही उससे छल करती है।

बिहारियों का कभी न खत्म होने वाला सफर

बिहार और उत्तर प्रदेश के मजदूरों के श्रम से दूसरे राज्यों की सड़कें बनीं, अट्टालिकाएं बनीं और कारखाने चले। आज भी वे दूध पहुंचाने और बाकी छोटे-छोटे काम के जरिए वहां के संपन्न और मध्य वर्ग की सेवा कर रहे हैं। लेकिन उन्हें बदले में तिरस्कार मिलता है। नीतीश कुमार ने अब उन दावों को दोहराना छोड़ दिया है कि उनकी सरकार बाहर जाकर काम करने वालों के अधिकार की रक्षा करेगी। लेकिन इसके लिए बना विभाग कहीं नजर नहीं आता। रोजगार देकर लोगों को बाहर जाने से रोकने को लेकर उनसे कोई उम्मीद करना तो बेकार ही है।