समाज

डिजिटल जासूसी से बेखबर भारत का अफीमची राष्ट्रवाद

एडवर्ड स्नोडन ने आज से 6 साल पहले सरकारों द्वारा डिजिटल निगरानी या कहें डिजिटल जासूसी के खतरों के प्रति दुनिया को आगाह कर दिया था. मगर अफ़सोस कि भारत में 6 साल बाद इसकी आहट तब सुनी गई जब स्वयं व्हाट्सएप्प ने खतरे की घंटी बजाकर हमें नींद से जगाया. जिस वक़्त सरकार देश की अंतरात्मा के पहरुए पत्रकारों, सोशल एक्टिविस्टों और राजनीतिज्ञों के मोबाइल फोनों को जासूसी सॉफ्टवेयरों के ज़रिए चौबीसों घंटे खंगाल रही थी उस वक़्त हम इस डिजिटल जासूसी से बेखबर राष्ट्रवाद की अफीम के नशे में बेसुध पड़े हुए थे. सवाल है कि टेक्नॉलोजी के क्षेत्र में कुलांचे भर रहे हमारे इस देश में कोई स्नोडन पैदा क्यों नहीं हुआ जो निजता के अधिकार और लोकत्रंत्र की जड़ों में मठ्ठा डाल रही सरकार की जासूसियों का समय रहते पर्दाफ़ाश कर देता? व्हाट्सएप्प कम्पनी से अनएनक्रिप्टेड मैसेजिंग की मांग करने वाली सरकार को बेनकाब करने का साहस कोई भारतीय स्नोडन क्यों नहीं जुटा पाया?

गाय की पूजा को मूर्खता और पाखंड मानते थे सावरकर

यह सच है कि ब्रिटिश हुकूमत ने अंतत: विनायक दामोदर सावरकर के माफीनामे को स्वीकार कर उन्हें न सिर्फ जेल से रिहा किया बल्कि स्वाधीनता संग्राम से अलग रहने के पुरस्कार स्वरुप 60 रुपए मासिक पेंशन भी दी। लेकिन सावरकर के जीवन का एक दूसरा पहलू भी है, जो बताता है कि वे अपनी जवानी के दिनों में एक प्रखर बुद्धिवादी, लेखक, साहित्यकार थे। अपनी नजरबंदी के दौरान उन्होंने हिन्दू समाज में व्याप्त धार्मिक अंधविश्वासों पर निर्मम प्रहार करने वाले लेखों के जरिए धूम मच दी थी। उन्होंने जातिप्रथा, यज्ञ, हवन, व्रत-अनुष्ठानों, गाय-पूजा आदि की जमकर खिल्ली उडाई। उन लेखों को यदि नरेंद्र मोदी, आदित्यनाथ, देवेंद्र फडनवीस जैसे आज के आज के हिंदू ह्रदय सम्राट पढ ले तो वे सावरकर को भारत रत्न देने की बात भूलकर मरणोपरांत हिंदूद्रोही करार दे देंगे और गिरिराज सिंह, प्रज्ञा ठाकुर और साक्षी महाराज जैसे लोग मरणोपरांत पाकिस्तान भेजने की मांग करने लगेंगे।

हिंदी की इस रात की सुबह कब होगी?

हिंदी को उसका उचित स्थान दिलाने के लिए राजनीतिक स्तर पर कोई आवाज उठाने वाला ही नहीं है। लगभग सभी राजनीतिक दलों का आम कामकाज भी अंग्रेजी में ही होता है। यहां तक कि भारतीय संस्कृति को लेकर रात-दिन ‘चिंतित’ रहने वाली भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के उसके अन्य सहोदर संगठनों की चिंता के दायरे में भी हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को बचाने का सवाल कभी नहीं आता। कुल मिलाकर सभी राजनीतिक दलों के एजेंडा से हिंदी का सवाल अब पूरी तरह गायब हो गया है। सारे राजनेताओं के लिए अब हिंदी महज नारेबाजी और भाषणबाजी यानी चुनाव प्रचार और वोट मांगने की भाषा बन कर रह गई है। कुल मिलाकर हिंदी को उसकी खोई हुई हैसियत लौटाने की राजनीति अब पूरी तरह खत्म हो चुकी है। उसका स्थान अब हिंदी की भावुकता ने ले लिया है। यह भावुकता हिंदी भाषियों और हिंदी प्रेमियों को ‘वह सुबह कभी तो आएगी’ की तर्ज पर तसल्ली देती रहती है कि कभी न कभी हिंदी के दिन बहुरेंगे।

विवेक-विरोधी और लोगों को लूटने का हथियार है नया यातायात कानून

यातायात नियमों को लेकर केंद्र सरकार का नया कानून आया है। इसमें नियमों के उल्लंघन पर जुर्माने के कहरबरपा प्रावधान हैं। ये डरावने प्रावधान आमजन को आतंकित करते हैं। अभी इस कानून को लागू करना वैसे भी उचित नहीं है कि देश का बड़ा भूभाग अभी तोड़फोड़ से लेकर बाढ़ आदि विपदा से दो-चार है। फिर मंदी अलग मातम कर रही है। ऐसे में साफ दिख रहा है इस कानून को लागू करने से पहले या इस पर ठीक से विचार नहीं हुआ या फिर कानून के जरिए निजाम का संदेश है कि वो आपको इस तरह भी ठीक करने के लिए कृत संकल्पित और तत्पर है और पीछे नहीं हटेगा। यदि ऐसा है तो ये व्यवस्था निर्माण का नहीं, अपितु सनक का लक्षण है।

दो मंदिरों पर सुप्रीम कोर्ट के दो अलग अलग-अलग फैसले

एक ही सुप्रीम कोर्ट लेकिन दो मंदिरों को लेकर दो अलग-अलग फैसले। वजह? एक मंदिर को राजनीतिक सत्ता का उच्चस्तरीय संरक्षण हासिल है लेकिन दूसरे मंदिर के साथ ऐसा नहीं है। एक मंदिर में प्रवेश पाने के लिए लोगों को बाकायदा पैसे चुकाना पडते हैं, जबकि दूसरे मंदिर में प्रवेश के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। यानी एक मंदिर से खाए-अघाए लोगों का धंधा जुडा हुआ है और दूसरे मंदिर से गरीब और वंचित लोगों की आस्था। अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि देश की न्यायपालिका किसके साथ है और वह न्याय करती है या फैसले सुनाती है!

सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और सरकार की बेरुखी

शिक्षा के भारी भरकम बजट के बावजूद महानगरों, नगरों और ग्रामों के बाद दूरस्थ क्षेत्रों में निजी स्कूल खुलते जाने का राज क्या है? क्या सरकारी स्कूलो में शिक्षा का स्तर नही है? क्या सरकारी स्कूलो में पढाया नही जाता? क्या सरकारी स्कूलों में शिक्षक नही है? या सरकारी स्कूल कागजो पर ही संचालित हो रहे है? ये ऐसे सवाल हैं जिन पर सरकारी नीतिकारो ने या तो कम ध्यान दिया है या फिर ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा गया है।

डॉ. पायल तडवी की आत्महत्या में छुपा है खतरनाक संकेत

आम चुनाव के नतीजे आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के केंद्रीय कक्ष में अपने गठबंधन के सांसदों को और प्रकारांतर से देश-दुनिया को संबोधित करते हुए दावा किया कि इस चुनाव के जरिए भारत में जाति और धर्म की दीवारें टूट चुकी है, लेकिन मुंबई में मेडिकल की पढाई कर रहीं डॉ. पायल तडवी का आत्महत्या करना बताता है कि हाल के वर्षों में जाति-धर्म की दीवारें गिरने के बजाय न सिर्फ मजबूत हुई हैं बल्कि ऊंची भी उठी हैं। मुस्लिम भील समुदाय की डॉ.पायल को भी लगभग उन्हीं हालात में आत्महत्या करने जैसा कदम उठाना पडा है, जिन हालात में चार साल पहले हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी। पायल तडवी की आत्महत्या प्रधानमंत्री मोदी के ‘सबका साथ सबका विश्वास’ के उदघोष को ही चुनौती नहीं है, बल्कि हमारे सभ्य समाज के तेजी से असभ्य होते जाने का भी संकेत है।

पिंडारी मानसिकता के थर्रा देने वाले सच

सूरत या कोटा या किसी भी शहर में शासन या प्रशासन की क्रूर और निर्मम मानसिकता के चलते और इन संस्थानों की इंसान को पशुओं की श्रेणी में रखने की बाज़ार की व्यवस्था के चलते कितनी ही जानों का निपट जाना इस देश को सीरिया, फलस्तीन, लेबनान, कोलंबिया, लीबिया या अफगानिस्तान जैसे हालात में डालने पर आमादा दिख रहा है। बस फर्क यह है कि उन देशों में युद्ध है और हमारे यहाँ निडर, निर्ल्लज और मनचाही अव्यवस्था।

वैचारिक अंधकार के दौर से गुजरता भारत

‘मिलेनियम सोशलिस्ट’…आजकल यूरोप में यह शब्द बहुत चर्चा में है। अमेरिका में इसी से मिलता-जुलता अर्थ रखने वाला शब्द अधिक प्रचलन में है…’मिलेनियम लेफ्ट’। सामान्य तौर पर इसका अर्थ है ऐसे युवा, जिन्होंने नई सहस्राब्दी में होश संभाला और अपनी सरकारों की आर्थिक नीतियों के नतीजों में जिस तरह के समाज का विकास देखा उससे वे असंतुष्ट हैं और चाहते हैं कि हालात बदलें। लेकिन…अफसोस…हमारा देश वैचारिक अंधकार के दौर से गुजर रहा है। कमजोर वर्गों का राजनीतिक विभाजन और ‘मिलेनियम यूथ’ की मति का नव औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा हरण हमारी त्रासदी का रूप ले चुका है।

यह जश्न मनाने का नहीं, सोचने का वक्त है!

जब 90 प्रतिशत या उसके आसपास अंक लाने पर छात्र उदास हो जाए और अभिभावक चिंतित हो जाएं तो समझना चाहिये कि चीजें गलत दिशा में जा रही हैं। यह दूसरी, तीसरी क्लास की नहीं, 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं का मामला है। 500 में 499, 498, 497…नहीं, यह सही नहीं। कुछ न कुछ तो ऐसा है जिसे लेकर अकादमिक नियंताओं को सोचना होगा।