भारत

आखिर चुनाव आयोग फेल क्यों हुआ ?

चुनाव आयोग अब लोकतंत्र का रक्षक नहीं रहा। वह एक ऐसी प्रबंधन-संस्था में तब्दील हो चुका है जिसका काम सिर्फ ईवीएम मशीन पहुंचाना, बूथों पर सुरक्षा या पुलिस बल तैनात करना और लोगों को लाइन में लगा कर मतदान कराना है। कारपोरेट की दलाली में नीरा राडिया के सहयोगियों पर नजर डालें तो साफ हो जाएगा कि मोदी सरकार ने उन्हें किनारे करने के बदले ऊंचे-ऊंचे पदों से नवाजा है। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा भी उन्हीं में से एक हैं। कारपोरेट के नुमाइंदों और आरएसएस के काडर की तरह काम करने वाली नौकरशाही से आप संविधान की रक्षा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? दोनों की दुश्मनी संविधान से है।

मध्यप्रदेश की आदिवासी सीटों पर भाजपा दाल पतली!

लोकसभा चुनाव में भाजपा आदिवासी क्षेत्रों में अपनी ताकतवर मौजूदगी दर्ज नहीं करा सकी! मध्यप्रदेश की 29 में से 6 आदिवासी सीटों में से कहीं भी भाजपा का पलड़ा भारी नहीं लग रहा! पिछले चुनाव में भाजपा ने सभी 6 सीटें जीत ली थी, पर उपचुनाव में झाबुआ सीट उसके हाथ से निकल गई! लेकिन, इस बार पिछली कहानी दोहराएगी, ऐसे कोई आसार नहीं हैं! किसी भी सीट पर भाजपा का उम्मीदवार दमदार नजर नहीं आ रहा! आज भी कांग्रेस से दूसरे दर्जे के या आयातित नेता ही भाजपा की पहली पसंद बनते हैं। प्रदेश की 47 विधानसभा सीटें भी आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं, लेकिन कोई सर्वमान्य नेता की कमी भाजपा में हमेशा खली है। जबकि, संघ आदिवासी क्षेत्रों में बरसों से काम कर रहा है।आदिवासी विकास और वनवासी कल्याण परिषद, वनबंधु मित्र मंडल जैसे कई आनुषंगिक संगठन भी बने, उन्होंने काम भी किया, पर नेतृत्व नहीं गढ़ सका। प्रदेश के 21 जिलों में आदिवासी इतने बहुमत में है। विधानसभा की तो 35 सीटें ऐसी हैं, जहां आदिवासियों के समर्थन के बिना कोई उम्मीदवार जीत ही नहीं सकता!

अब सुप्रीेेम कोर्ट का राजनीतिकरण !

वित्त मंत्री जेटली ही नहीं, पूरी सरकार सुप्रीम कोर्ट के राजनीतिकरण में लगी है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई के खिलाफ हुई यौन उत्पीड़न की शिकायत पर विशेष बेंच की सुनवाई को लेकर उठे विवाद ने उसे इसका मौका दे दिया है। नौकरशाही, आरबीआई चुनाव आयोग और सेना के बाद वह सुप्रीम कोर्ट के राजनीतिक इस्तेमाल में लग गई है।

साध्वी प्रज्ञाः मोदी का अंतिम अस्त्र

साध्वी का बीच चुनाव में उतरना एक ओर हिंदुत्व  ब्रिगेड के चुनाव हार जाने का भय दिखाता है और दूसरी ओर यह भी दिखाता है कि वह ध्रुवीकरण  की राजनीति को ही अंतिम उपाय मान रहा है। पिछले पांच सालों में, संघ के संगठनों ने गोरक्षा के नाम पर माब लिंचिंग,  राम मंदिर आंदोलन को फिर से ख़ड़ा करने और कुंभ जैसे मेले के राजनीतिक इस्तेमाल के कई प्रयोग किए, लेकिन उन्हें इसमें खास सफलता नहीं मिली। साध्वी उनके जखीरे का पुराना हथियार है। गुजरात में मोदी ने दंगाइयों को राजनीति में जगह दी थी, अब आतंकवादी हमले के आरोपी को उन्होंने मैदान में उतार दिया है।

अब सिर्फ अमीर के बच्चे लेंगे ऊँची शिक्षा !

मोदी सरकार की नीतियों के चलते उच्च मध्यम और उच्च वर्ग के लोग ही गुणवत्ता पूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त करने के हकदार होंगे क्योंकि उन्हीं की ऐसी आर्थिक हैसियत होगी। जिन युवाओं को शिक्षा के सवालों पर सड़कों पर उतरना था उनमें से बहुत सारे युवा ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद, भारत माता की जय, वन्दे मातरम’ आदि का गगनभेदी निनाद करते सड़कों पर उधम मचाते देखे जाने लगे। . ऐसे समय में, जब रोजगार का संकट खतरे के निशान को पार कर चुका है, हमने सड़कों पर ऐसी तख्तियां थामे युवाओं के हुजूम को भी देखा, जिन पर लिखा था…”हमें नौकरी नहीं, बदला चाहिये।”

प्रज्ञा की उम्मीदवारी: ध्रुवीकरण की खुली घोषणा

प्रज्ञा ठाकुर अजमेर बम धमाकों के आरोप से तो बरी हो गई , लेकिन मालेगांव केस उस पर आज भी चल रहा है । कैंसर की बीमारी के इलाज का आधार पर उन्हें कोर्ट ने ज़मानत दी थी । लेकिन वह बाहर आकर बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रही है ।

आज भी युद्धरत हैं डॉ आंबेडकर !

डा बाबा साहेब आंबेडकर भारत की आजादी के आंदोलन के वैसे योद्धा हैं जो अपनी मृत्यु के बाद भी युद्धरत हैं। अपनी प्रासंगिकता के कारण वह दुनिया की उन महान विभूतियोेें के बीच खड़े हैं जिनके लिए इतिहास और वर्तमान का फर्क मिट चुका है। वह आज भी उस आबादी की आवाज बने हुए हैं जिसकी आवाज सैंकड़ों साल तक छिनी रही। जब तक वर्ण और जाति की क्रूर व्यवस्था बनी रहेगी, डा आंबेडकर इससे लड़ने के लिए मौजूद रहेेंगे। आज यह जरूरी है कि आरएसएस और भाजपा जैसी सांप्रदायिक और समानता-विरोधी शक्तियों को पारजित किया जाए और संविधान को बचाया जाए। ऐसे में, बाबा साहेब सबसे बड़े प्रेरणा-स्रोत हैं।

मोदी-शाह के हिंदुत्व की असलियत सामने आ चुकी है !

कारपोरेट लूट और बेरोजगारी से त्रस्त आम लोगों की नजरों में मोदी-शाह ब्रांड राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की असलियत आ चुकी है। अब कौतूहल नहीं रहा, जिज्ञासा नहीं रही। लगातार 32 वर्षों से घोषणापत्रों में राम मंदिर का जिक्र भी यह अहसास कराने के लिये काफी है कि इन्हें कोई मंदिर-वन्दिर बनाना नहीं है, बस उन मुद्दों को ज़िंदा रखना है जो इनकी राजनीति के लिये उपयोगी हैं। दरअसल, इनके हिंदुत्व को, इनके राष्ट्रवाद को सदैव जन उन्मादों का संबल चाहिये। लेकिन, लोग तो अब बेरोजगारी पर सवाल पूछने लगे हैं, सत्ता और कारपोरेट के गठजोड़ के खेल पर सवाल पूछने लगे हैं।

बीएसएनएल को बर्बाद और जिओ को आबाद किया मोदी ने

जियो के पास इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव था और  मोदी सरकार ने बीएसएनएल के इंफ्रास्ट्रक्चर को धीरे धीरे जिओ को देना शुरू किया।  2014 में आते ही मोदी सरकार ने  एक  टॉवर पॉलिसी की घोषणा की और दबाव डालकर रिलायंस जिओ इंफोकॉम लिमिटेड से भारत संचार निगम लिमिटेड के साथ मास्‍टर शेयरिंग समझौता करवा दिया। इस समझौते के तहत रिलायंस जिओ बीएसएनएल के देशभर में मौजूद 62,000 टॉवर्स का उपयोग कर सकती थी, इनमें से 50,000 में ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी उपलब्ध थी। यह जिओ के लिए संजीवनी मिलने जैसा था क्योंकि वह चाहे कितना भी पैसा खर्च कर लेती इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर नही खड़ा कर सकती थी।  लेकिन उसके लिए एक मुश्किल और  थी  कि बीएसएनएल उसके कड़े प्रतिद्वंद्वी में से एक था जिन्हें इन टॉवर से सिग्नल्स मिलते थे। इसलिए मोदी सरकार ने ग़जब का खेल खेला।  इन टावर्स को एक अलग कम्पनी बना कर उसमे डाल दिया गया ताकि जिओ को इन टावर का निरंतर फायदा मिलते रहे।

क्या मोदी विचार के राहुल-अखाड़े में उतरेंगे?

क्या चुनाव की बहस उस ओर लौट पाएगी जिस ओर कांग्रेस लौटी है। घोषणा-पत्र जाहिर होने के बाद वित्त मंत्री अरूण जेटली के बयान से साफ हो जाता है कि भाजपा हिंदुत्व और नकली राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़ेगी जिसमे पाकिस्तान, मुसलमान और सेना प्रमुख हैं। ये तीनों राम मंदिर के मुद्दे के लोक मानस में खारिज होने के बाद प्रमुखता में आए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह चुनाव मजाक और छिछोरेपन से भरे संवादों के सहारे लड़ना चाहते हैं, लेकिन राहुल गांधी उन्हें खींच कर विचार के अखाड़े में लाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। ‘हम निभाएंगे’ घोषणा-पत्र उनकी इसी कोशिश को दिखाता है।