भारत

अंग्रेजी ने चौपट कर डाला है उनका भविष्य

आपको जाना अंग्रेजी स्कूल में ही है, पढ़ना अंग्रेजी में ही है, लिखना अंग्रेजी में ही है। लेकिन, न आपको अंग्रेजी आती है, न आपके बाप-दादा-चाचा को…और तो और…आपको पढ़ाने वाले शिक्षक को भी अंग्रेजी नहीं आती।
निजी अंग्रेजी स्कूलों से निकल कर ऊंची कक्षाओं में जाने वाले बच्चे कालेजों में फिर हिन्दी माध्यम में लौटते हैं। खास कर बिहार-यूपी में। लेकिन, अब स्थिति यह रहती है कि अंग्रेजी पर उनकी पकड़ तो नहीं ही बन पाई, हिन्दी में भी वे चौपट हैं। बचपन से जिस हिन्दी को हिकारत के भाव से देखा, अब उसी हिन्दी माध्यम में पढ़ना-लिखना…बीए लेवल की परीक्षा देना। न हिन्दी में ठीक से लिख सकते हैं न अंग्रेजी में।

लोग गरमी से नहीं, व्यवस्था की काहिली से मरते हैं!

व्यवस्था तंत्र के शीर्ष पर बैठे राजनेता एक किक्रेट खिलाडी के अंगूठे की चोट पर तो अफसोस जाहिर करते हैं लेकिन मौसम के सितम से मरने वालों पर संवेदना के दो बोल भी उनके मुंह से नहीं फूटते। देश की संसद में ‘जय श्रीराम’, ‘हर-हर महादेव’, ‘राधे-राधे’, ‘अल्लाह हु अकबर’ के नारों से सांसद एक दूसरे पर फब्तियां कसते हैं, राष्ट्रपति के अभिभाषण में देश की गुलाबी तस्वीर पेश की जाती है, लेकिन इन मौतों का जिक्र कोई नहीं करता। संसद की यह स्थिति उसके आवारा और बदचलन होने की तसदीक करती है। देश का मीडिया खासकर टेलीविजन के चौबीसों घंटे चलने वाले खबरिया चैनलों की बदतमीजी, बदचलनी और बदनीयती की कहानी तो पुरानी है ही।

योग दिवस मनाएं या दिमागी बुखार से लड़ें ?

देश का प्रधानमंत्री एक क्रिकेट खिलाड़ी के अंगूठे के फ़्रैक्चर पर ट्वीट कर अपनी चिंता जता रहा है , लेकिन अभी तक उन्होंने एक शब्द भी इन बच्चों की अकाल मृत्यु पर नही कहा! यह किस किस्म की संवेदनशीलता है ? चुनावी रैलियों में देश के कोने कोने में जाना वाला प्रधानमंत्री को मुजफ्फरपुर जाने का बिल्कुल भी समय नहीं है।

क्या मोदी सुमित्रा महाजन को राज्यपाल का पद देंगे?

लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष और इंदौर की पूर्व सांसद सुमित्रा महाजन राज्यपाल बनने की कोशिश में लगी हैं! एक दिन उनके महाराष्ट्र का राज्यपाल बनने की अफवाह उड़ती रही! केंद्रीय मंत्री से लगाकर भाजपा के कई बड़े नेताओं ने भी उन्हें ट्वीट करके बधाई दे डाली! इस अफवाह ने ये सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या वास्तव में सुमित्रा महाजन राज्यपाल बनेंगी? इस अफवाह को सच करने के लिए वे दिल्ली में लॉबिंग कर रही हैं! असंतुष्टों से मेलजोल का मकसद कहीं पार्टी पर दबाव बनाना तो नहीं?

बिहार के बच्चों को कौन मार रहा है?

मुजफ्फरपुर में सौ से अधिक बच्चों ने अपनी जान गँवा दी है। मीडिया में अभी भी यह डॉक्टरों की हड़ताल और वर्ल्ड कप की खबरों से पीछे है। मीडिया जितना बता रहा है, उससे ज्यादा छिपा रहा है। जापानी इन्सेफेलाइटिस की बीमारी से जुड़े हर पहलू पर शोध हो चुका है जिसमे लीची खाने से इसका सम्बन्ध भी शामिल है। लेकिन मीडिया और सरकार दोनों लोगों से सच्चाई छिपा रहे हैं। सच्चाई देश की स्वास्थ्य -व्यवस्था ही नहीं, सरकारी क्रूरता की पोल खोल देगी।

गरमी के कहर को किसने बनाया जानलेवा?

देश के विभिन्न हिस्सों में बडी संख्या में लोग गरमी की वजह से मौत का शिकार बनते हैं लेकिन उनकी खबर तक नहीं बन पाती। गरीब तबके के पास गरमी से मुकाबला करने के पर्याप्त बुनियादी इंतजाम नहीं होते। करोडों परिवार ऐसे हैं जिनके पास पंखे-कूलर जैसी सुविधा भी नहीं है। पीने का साफ पानी नहीं है। लू लगने पर उन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधा भी नहीं मिल पाती। ऐसे में गरमी गरीब को निगल जाती है। इस स्थिति की इसकी बड़ी वजह हमारी भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक नेतृत्व की काहिली तो है ही, इसके साथ ही एक अन्य वजह यह भी है कि मौसम से लड़ने वाला हमारा सामाजिक तंत्र भी अब कमजोर हो गया है।

गिरीश कर्नाड: अभिव्यक्ति की सार्थक यात्रा

गिरीश ने कन्नड़ भाषा में अपनी रचनाएं लिखीं। जिस समय उन्होंने कन्नड़ में लिखना शुरू किया, उस समय कन्नड़ लेखकों पर पश्चिमी साहित्यिक पुनर्जागरण का गहरा प्रभाव था। लेखकों के बीच किसी ऐसी चीज़ के बारे में लिखने की होड़ थी जो स्थानीय लोगों के लिए बिल्कुल नयी थी। इसी समय कर्नाड ने ऐतिहासिक तथा पौराणिक पात्रों से तत्कालीन व्यवस्था को दर्शाने का तरीका अपनाया तथा काफ़ी लोकप्रिय हुए।

क्या नई पीढ़ी मनुष्य होने का अधिकार ही खो देगी?

फ्री डाटा की उपलब्धता ने स्मार्टफोन को व्यवस्था का प्रभावी औजार बना दिया और नई पीढ़ी को राजनीतिक रूप से दिग्भ्रमित करना इतना आसान हो गया जितना इतिहास में कभी नहीं था। हमारी शिक्षा प्रणाली, मीडिया की प्रकृति और उसके चरित्र में आये बदलावों ने यह सुनिश्चित किया है कि नई पीढ़ी अपने हित.अहित को लेकर इतनी संवेदनशील न बन पाए कि वह व्यवस्था को चुनौती दे सके। निम्न वर्गीय युवाओं के लिए बने रोजगार में आकर टिकने की जद्दोजहद कर रहे मध्यवर्गीय युवा भी मनुष्य होने का अधिकार खोते जा रहे हैं।

बाज़ार में नकदी नहीं, अर्थव्यवस्था में मंदी !

मोदी सरकार ने लोन डुबो चुके उद्योगपतियों को ओर लोन दिलवाना जारी रखा जिससे आज बाजार में कैश क्रंच जैसे हालात नजर आ रहे हैं और देश आर्थिक मंदी के हालात झेल रहा है। 2015 में रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने संसदीय समिति को सौंपी एक रिपोर्ट में कहा था कि उन्होंने देश में हाई प्रोफाइल घोटालेबाजों की एक लिस्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी थी। लेकिन मोदी सरकार ने कोई कार्रवाई नही की, यह साफ दिख रहा है। इसलिए संकट की असली दोषी मोदीं सरकार ही है।

आखिर चुनाव आयोग फेल क्यों हुआ ?

चुनाव आयोग अब लोकतंत्र का रक्षक नहीं रहा। वह एक ऐसी प्रबंधन-संस्था में तब्दील हो चुका है जिसका काम सिर्फ ईवीएम मशीन पहुंचाना, बूथों पर सुरक्षा या पुलिस बल तैनात करना और लोगों को लाइन में लगा कर मतदान कराना है। कारपोरेट की दलाली में नीरा राडिया के सहयोगियों पर नजर डालें तो साफ हो जाएगा कि मोदी सरकार ने उन्हें किनारे करने के बदले ऊंचे-ऊंचे पदों से नवाजा है। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा भी उन्हीं में से एक हैं। कारपोरेट के नुमाइंदों और आरएसएस के काडर की तरह काम करने वाली नौकरशाही से आप संविधान की रक्षा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? दोनों की दुश्मनी संविधान से है।