भारत

रवीश कुमार पर एक बहस

गौर से देखें तो प्रतिरोध का एक आंदोलन विकसित हो चुका है जो संगठित भले न हो, असरदार जरूर है। यह अखबारों, टीवी चैनलों, हर जगह सक्रिय है। सिद्धार्थ वरदाराजन, ओम थानवी, विनोद दुआ, निखिल वागले, उर्मिलेश, आरफा खानम, हरतोष सिंह बाल, राजेश प्रियदर्शी तथा जयशंकर गुप्त जैसे लोग लगातार लगे हैं। मुख्यधारा मीडिया से अलग रह कर कुमार प्रशांत जैसे लोग डटकर खड़े हैं। सोशल मीडिया पर तो देश भर में इतने लोग सत्ता-प्रतिष्ठान के भाड़े के सिपाहियों से लड़ रहे हैं कि उनकी गिनती संभव नहीं है। इनमें जाबिर हुसैन, अरूण माहेश्वरी-सरला माहेश्वरी, कैलाश मनहर, नूर मुहम्मद नूर, अनवर शमीम जैसे लोगों ने तो हर उपलब्ध विधा को अपना हथियार बना रखा है। इस आंदोलन में ललित सुरजन, सुनील तांबे जैसे अनुभवी पत्रकार हैं तो गिरीश मालवीय, हेमंत मालवीय, प्रणव प्रियदर्शी, धनंजय कुमार, साध्वी मीनू जैन, हेमंत कुमार झा, संतोष कुमार झा और अनिल जैन जैसे अपेक्षाकृत युवा भी। इनमें बिलक्षण रविदास, अनिल प्रकाश, विश्वंभर चौधरी, सौरभ वाजपेयी, रामशरण, डा योगेंद्र, चारूल जोशी जैसे सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। सामूहिक संघर्ष ही व्यक्तिवाद का विकल्प है।

मध्य प्रदेश में फिर तबाही मचाएगा सरदार सरोवर बांध

सन 2019 के पहले तक नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध को उसकी उंचाई के अनुसार भरा नही गया था, अभी तक जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार सरदार सरोवर बांध को 138 मीटर तक भरा जायेगा, याने डूब का मंजर ज्यादा भयावह होगा और प्रभावितो की संख्या भी अधिक होगी और आम लोगो का संघर्ष व सरकारी दमन का नया दौर प्रारंभ होगा |

अरुण जेटली और चिदंबरम की बेमिसाल दोस्ती की दास्तान

अरुण जेटली और चिदंबरम की दोस्ती इतनी गहरी थी कि कई मौकों पर उन्होंने एक दूसरे की मदद करने के लिए दलीय हितों को अनदेखा और दलीय सीमाओं को पार करने में भी संकोच नहीं किया। इस सिलसिले मौजूदा केंद्रीय मंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी से जुडा मामला उल्लेखनीय और बेहद दिलचस्प है। बात करीब सात साल पुरानी यानी 2012 के आखिरी की है। गडकरी उस भाजपा के अध्यक्ष थे। पार्टी अध्यक्ष के रूप में यह उनका पहला कार्यकाल था, जो समाप्त होने वाला था। संघ का नेतृत्व चाहता था कि गडकरी को अध्यक्ष के रूप में दूसरा कार्यकाल भी मिले यानी 2014 का चुनाव भाजपा उन्हीं के नेतृत्व में लडे। लेकिन एक नाटकीय घटनाक्रम के चलते गडकरी दूसरी बार अध्यक्ष नहीं बन सके थे। उस घटनाक्रम से चिदंबरम भी परोक्ष रूप से जुडे हुए थे।

यादों में कुलदीप नैय्यर!

अपने निधन के 15 दिन पहले उनके हाथों से हमने द्रोहकाल.काम शुरू कराया। यह उनका आखिरी सार्वजनिक कार्यक्रम था। मीडिया के पतन के इस दौर में वह हमारे हाथों में एक छोटा सा हथियार थमा कर गए। उन्हें हमारा नमन!

अब गांधीवादी भी शहरी नक्सल?

सावरकर और आरएसएस का इतिहास बताने तथा कश्मीर में धारा 370 के दो प्रावधानों को खत्म करने का विरोध करने के बाद गांधीवादी कायकर्ता और पत्रकार कुमार प्रशांत दो एफआईआर का सामना कर रहे हैं। उन पर देश के खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाया गया है। इससे यही जाहिर हो रहा है कि शासन तथा विचारधारा की आलोचना करने वाला हर आदमी सत्ताधीशों की नजर में अब शहरी नक्सली है।

गांधीवादी कार्यकर्ता कुमार प्रशांत के खिलाफ एफआईआर

गांधीवादी कार्यकर्ता और जाने-माने पत्रकार कुमार प्रशांत के खिलाफ आरएसएस के कार्यकर्ताओं देश के खिलाफ षड़यंत्र करने का एफआईआर दर्ज़ कराया है क्योंकि उन्होंने सावरकर के अंग्रेज़ों से सहयोग करने और स्वतंत्रता आंदोलन से आरएसएस के दूर रहने की बात अपने भाषण में कही। जयप्रकाश नारायण के सहयोगी रहे कुमार प्रशांत गाँधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष हैं।

गांधी-दर्शन को प्लास्टिक की थैली में कैद करने का अभियान

स्वच्छता को जिस तरह गांधी जी के अभियान को जोड़ा जा रहा है वह एक राजनीतिक साजिश है। गांधी जी सादगी और परस्पर सहयोग वाले जीवन जीने की शैली अपनाने पर जोर देते थे। गांधी जी के विचारों पर अमल करने का मतलब है कि प्लास्टिक संस्कृति और उपभोक्ता संस्कृति पर हमला। क्या मोदी सरकार इसके लिए तैयार है? विकास के नाम पर बेछूट उपभोग और ऐय्याशी को बढावा देने वाली सरकार से ऐसी उम्मीद करना भी निरर्थक है। भाजपा या संघ परिवार वाले सिर्फ कारपोरेट के फायदे के लिए गांधी जी के विचारों पर वार नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं । गांधी जी के विचारों के खिलाफ चल रही लड़ाई का उदाहरण है बढती भीड़- हिंसा के खिलाफ सरकार की खामोशी। यह खामोशी लालकिले से मोदी के संबोधन में भी दिखी।

क्यों गतिहीन हो गया मंडल-आंदोलन ?

कभी राजनीति को गतिशीलता देने वाला मंडल आंदोलन आखिर स्वयं ही गतिहीन क्यों लग रहा? ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिनके जवाब ढूंढने की कोशिश में हमें उत्तर भारत की राजनीति की पतन गाथा के अनेक सूत्र मिलते हैं। जिनके हाथों की तख्तियों पर शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार के नारे लिखे होने थे, उन वंचित समुदाय के युवाओं के हाथों में त्रिशूल और तलवार हैं जिसका प्रदर्शन रामनवमी और शिवरात्रि के जुलूसों में करके वे मुदित हैं। जिनके कंधों पर प्रतिगामी सांस्कृतिक मूल्यों की लाशें होनी थी, जिन्हें किसी बियाबान में फेंक कर उन्हें उनसे मुक्त होना था, उनके कंधों पर कांवड़ हैं और भांग, गांजा आदि के नशे में धुत हो वे कल्पित परलोक सुधारने को व्यग्र हैं…इहलोक की आपराधिक उपेक्षा करते हुए।

‘भारत छोड़ो’: समाजवादी आंदोलन का एक चमकता पन्ना

जापान भारत के दरवाजे पर आ चुका था। लोगों को यह विश्वास हो गया था कि अंग्रेज उनकी रक्षा में असमर्थ हैं। बीच में, अमेरिकी दबाव में चर्चिल ने स्टै्रफर्ड क्रिप्स का मिशन को भारत भेजा। उसका कोई नतीजा नहीं निकला। गाँधी जी ने तय किया कि अंग्रेजों को भारत से जाने को कहा जाये। भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा ने लोगों के बीच एक नया उत्साह पैदा कर दिया। लेकिन ‘करो या मरो’ की घोषणा के आते ही दो महत्वपूर्ण बयान आ गए। एक सावरकर और दूसरा मोहम्मद अली जिन्ना का। सावरकर ने हिंदू महासभा के कार्यकर्ताओं को आंदोलन से दूर रहने के लिए कहा और जिन्ना ने आंदोलन को मुसलमानों की सुरक्षा के लिए खतरा बताया। उन्होंने आंदोलनकारियों को मुसलमानो से दूर रहने को कहा।

कश्मीर के समाधान का यह कदम डराता भी है!

कश्मीर मसले के समाधान की दिशा में बढ़ा सरकार का यह निर्णायक कदम अधिक आश्वस्त नहीं कर रहा। एक भय का संचार भी मन में हो रहा है। ताकत के दम पर अस्मितावादी विवादों का हल निकल जाए, यह कैसे संभव होगा? आप पाकिस्तान को रगड़ सकते हैं, आतंकियों को रौंद सकते हैं लेकिन अपने ही भाई-बंधुओं को न आप रगड़ सकते हैं, न रौंद सकते हैं। अगर कश्मीर देश का है तो कश्मीरी भी देश के हैं और देश उनका है। भावनाओं में दूरी बाकी रह गई तो ताकत का प्रयोग कर स्थापित की गई एकता अपने भीतर इतने अंतर्विरोधों को जन्म देगी कि कभी भी ऐसी ऊपरी एकता का शीराज़ा बिखर सकता है। यह बहुत भयानक मंजर हो सकता है।