दुनिया

स्विट्जरलैंड में गायों के ‘सींग उच्छेदन’ के मुद्दे पर अनोखा जनमत संग्रह

लाखों स्विस नागरिक २5 नवम्बर को मतदान के ज़रिए गायों के ‘सींग उच्छेदन‘ के मुद्दे पर अपनी राय ज़ाहिर करेंगे. जनमत संग्रह के नतीजे इस बात का निर्णय करेंगें कि जो स्विस गौ-पालक अपनी गायों के सींग नहीं काटते हैं और इसके कारण गौपालन की लागत में जो इजाफा होता है उसकी भरपाई के लिए सरकार गौ-पालकों सब्सिडी दे या नहीं. स्विट्ज़रलैंड में गायों की पीड़ा के प्रति इस उच्चकोटि की संवेदनशीलता भारत के उन तथाकथित गौ रक्षकों के मुंह पर भी तमाचा है जो गाय का इस्तेमाल केवल धार्मिक उन्माद फैलाने और अपनी साम्प्रदायिक राजनीति चमकाने के लिए करते हैं, बाकी समय सडकों पर आवारा घूमती उनकी गौमाता कूड़े के अम्बार में प्लास्टिक खाकर अपना पेट भरती है या फिर गौरक्षा के नाम पर सरकारी अनुदान को डकार जाने वाले गौ- भक्तों की गौशालाओं में चारे–पानी के अभाव में दम तोड़ देती हैं.

रॉफेल सौदे में बेपर्दा हुआ सरकार का झूठ

फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि अरबों डॉलर के रॉफेल विमान सौदे में दसॉल्ट एविएशन का साझेदार बनाने के लिए भारत सरकार ने अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेन्स के अलावा दूसरा कोई विकल्प हमें नहीं दिया था। इस खुलासे के बाद साफ हो गया है कि रॉफेल सौदे में अनिल अंबानी की कंपनी को जो 21 हजार करोड रुपये दिलाए गए हैं वह सीधे-सीधे कमीशन की राशि है।

अधिकारी ने ट्रंप पर देशहित के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया

डोनाल्ड ट्रंप के अधिकारी ने न्यूयार्क टाइम्स में एक लेख लिख कर उन पर देश की संस्थाओं को नष्ट करने और इसके हितों के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया है। इस गुमनाम लेख में दावा किया गया है कि ट्रंप के एजेंडे को नाकाम करने में वे अधिकारी लगे हैं जो देश के प्रति अपने को जिम्मेदार मानते हैं। अधिकारी ने खुद को ऐसे लोगों में से एक बताया है।

इमरान को मौका गंवाना नहीं चाहिए

इमरान खान को नई दोस्ती की पहल खुद आगे बढ़कर भारत के लिए करनी चाहिए। उनको नरेंद्र मोदी को सबसे पहले पाकिस्तान आने का न्यौता देना चाहिए। हो सकता है दोनों देशों की दुश्मनी दूर करने के लिए खुदा ने आपका ही चुनाव किया हो।

पाकिस्तान को चाहिए चरमपंथियों से निजात

इमरान खान पाकिस्तान में बहुत पसंद किए जाते हैं। लोग उन्हें तालिबान खान भी कहते रहे हैं, लेकिन इमरान का अगर अतीत देखा जाए तो शायद यह कहना गलत होगा कि उनका मजहब से कभी कोई गहरा तालुक रहा है। पाकिस्तानी अवाम इस बात की उम्मीद करती है कि वह ऐसा कोई कदम नहीं उठाएंगे, जिससे मुल्क में धार्मिक चरमपंथ बढ़े।