कला संस्कृति

स्मरण कामरेड पेंटर हरिपाल त्यागी का !

हरिपाल त्यागी एक प्रतिबद्ध रचनाकार थे। आज जहां लाखों में पेंटिंग्स बिक रही हैं और बेची जा रही हैं , वहीं भाऊ समर्थ और हरिपाल त्यागी ने देश की सभी लघु पत्रिकाओं के कलापक्ष को मजबूत किया और पाठकों में आधुनिक कला संस्कार भी विकसित किए । उन लघु-पत्रिकाओं को आकर्षक बनाया। भयानक बीमारी से पीड़ित होने के बाद भी उन्होंने तूलिका , और रंग का साथ नहीं छोड़ा। त्यागी जी नागार्जुन, त्रिलोचन के अनन्य मित्र थे। उन्होंने इन दोनों महाकवियों के अनगिनत चित्र बनाए हैं। कविता , और साहित्य की अन्य विधाओं में उन्होंने विपुल व मूल्यवान लेखन किया है। देश – विदेश के श्रेष्ठ चित्रकारों पर उन्होंने बेहतरीन विश्लेषणात्मक लेख लिखें हैं।

याद अमर शहीद पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थ की

वे साम्प्रदायिकता के खिलाफ सतत संघर्षरत रहे। भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव की शहादत के बाद जनभवनाओं को मोड़ने के लिए अंग्रेजो ने साम्प्रदायिक ताक़तो से मिलकर कानपुर को हिन्दू-मुस्लिम दंगे की आग में झोंक दिया। इसी दंगे में निसहायों को बचाते हुए 25 मार्च 1931 को वे शहीद हो गये। दंगों की भेंट चढ़ने वाले वह संभवतः पहले पत्रकार थे।

शिव: असीम तात्‍कालिकता की महान किंवदंती

शिव ने कोई भी ऐसा काम नहीं किया जिसका औचित्य उस काम से ही न ठहराया जा सके। आदमी की जानकारी में वह इस तरह के अकेले प्राणी हैं जिनके काम का औचित्य अपने-आप में था। किसी की भी उस काम के पहले कारण और न बाद में किसी काम का नतीजा ढूँढ़ने की आवश्यकता पड़ी और न औचित्य ही ढूँढ़ने की। जीवन कारण और कार्य की ऐसी लंबी श्रृंखला है कि देवता और मनुष्य दोनों को अपने कामों का औचित्य दूर तक जा कर ढूँढ़ना होता है। यह एक खतरनाक बात है। अनुचित कामों को ठीक ठहराने के लिए चतुराई से भरे, खीझ पैदा करनेवाले तर्क पेश किए जाते हैं। इस तरह झूठ को सच, गुलामी को आजादी और हत्या को जीवन करार दिया जाता है। इस तरह के दुष्टतापूर्ण तर्कों का एकमात्र इलाज है शिव का विचार, क्यों कि वह तात्कालिकता के सिद्धांत का प्रतीक है। उनका हर काम स्वयं में तात्कालिक औचित्य से भरा होता है और उसके लिए किसी पहले या बाद के काम को देखने की जरूरत नहीं होती।

रेणु को फिर से खोजना होगा

चार मार्च देश के मशहूर कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु का जन्मदिन है। इस अवसर पर पेश है बिहार के वरिष्ठ साहित्यकार और राजनीतिकर्मी प्रेमकुमार मणि के संस्मरण।
” उन पर मैंने और बहुतों ने बहुत बार लिखा है ,लेकिन उन पर और लिखा जायेगा ,लगातार लिखा जाता रहेगा ,क्योंकि वह कुछ खास थे। उनकी खासियत की चर्चा बहुतों ने की है। बहुतों ने अपने -अपने नजरिये से उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को देखने -दिखाने की कोशिश की है। लेकिन अभी भी बहुत कुछ ऐसा है ,जिसका अनावरण नहीं हुआ है। आने वाली पीढ़ियां शायद इसका अन्वेषण करेगी।”

‘उन्हें नहीं मालूम कि जलते हुए जहाज से दुश्मन की धरती पर जा गिरना कैसा होता है!’

यह कविता विंग कमांडर अभिनंदन की बहन अदिति ने अपने भाई के साहस को सलाम करते हुए लिखी है, जिसकी महत्वपूर्ण लाइनों का भावानुवाद किया गया है। अंग्रेजी में लिखी गई पूरी मूल कविता भी साथ में प्रस्तुत है।

नामवरी जीवन और एकांत भरा अंतिम अरण्य

हिंदी साहित्य की प्रगतिशील परम्परा का सबसे चमकदार सितारा अंततः अस्त हो गया। लगभग एक दशक पहले सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रियंवद को दिए एक साक्षात्कार में तब 80 पार के नामवर ने कहा था , मैं अपने पिता की तरह अकेला हो गया हूं । हालांकि वे तब काफी सक्रिय थे और लगातार देश भर में व्याख्यान दे रहे थे । मगर भीतर ही भीतर वे तभी से अकेलापन महसूस करने लगे थे । जीवन के अंतिम अरण्य में एक लम्बे अरसे से अपनो से उपेक्षित व नीम एकांत में रहे आये हिन्दी साहित्य के पर्याय नामवर सिंह उड़ जाएगा हंस अकेला की तर्ज पर बिल्कुल अकेले से चले गए।

हम जहां रुकें, वहाँ से तुम चलो

साहित्यिक, मानवीय सरोकारों के प्रति पूर्ण प्रतिबद्ध कृष्णा सोबती में अंतिम समय तक सही के पक्ष में खड़े होने और हर गलत का सक्रिय विरोध करने का हौंसला था। जब कहीं, जहाँ कहीं नागरिक अधिकारों का हनन होता दिखा उन्होंने तत्काल और प्रचंड विरोध किया। खुद्दार शख्सियत वाली कृष्णा सोबती लेखन में ही नहीं जीवन का, व्यक्तित्व का भी एक नया व्याकरण रचती रहीं। एक ऐसा व्याकरण जिसमें से होकर आकार लेते समय की शख्सियत ऐसी मजबूत और निराली होती कि न स्त्री होना बाधक बन सकता था, न भाषा सीमित कर सकती थी, न सत्ता नीचा दिखा सकती थी।

गोवर्द्धन पूजा: रूढ मान्यताओं के खिलाफ पहले विद्रोह का पर्व

गोवर्द्धन पूजा का पर्व भारतीय संस्कृति में स्थापित मान्यताओं के प्रति उस पहले विद्रोह का प्रतीक भी है, जो द्वापर युग में इंद्र की निरंकुश सत्ता-व्यवस्था के खिलाफ कृष्ण के नेतृत्व में हुआ था। इसी विद्रोह से कृष्ण की सामाजिक क्रांति के योद्धा-नायक की छवि उभरती है। किसी भी समाज में स्थापित मान्यताओं और व्यवस्थाओं के विरुद्ध विद्रोह एकाएक ही नहीं फूट पड़ता। उसके पीछे सामाजिक चेतना और उससे प्रेरित संकल्प के अनेक छोटे-बड़े कृत्य होते हैं। कृष्ण की बाल लीला ऐसे ही कृत्यों से परिपूर्ण थी।

दीपावली की सामाजिकता भी बाजार की बंधक बनी

दीपावली खास तौर पर लक्ष्मी की पूजा-आराधना का पर्व ही माना जाता है। लक्ष्मी यानी धन-धान्य और ऐश्वर्य की देवी। लेकिन लक्ष्मी अब लोक की देवी नहीं, बल्कि ग्लोबल प्रतिमा बन गई हैं। उसकी पूजा में अब लोक-जीवन को संपन्न बनाने की इच्छा कम और खुद को समृद्ध बनाने की लालसा ज्यादा व्यक्त की जाती है। डिजायनों और ब्रांडों के बोलबाले ने मिट्टी की लक्ष्मी प्रतिमाओं और कुम्हार के कलाकार हाथों से ढले दीयों को भी डिजायनर बना दिया है। दीपावली पर उपहारों और मिठाइयों के आदान-प्रदान का चलन पुराना है लेकिन पहले उनमें गहरी आत्मीयता होती थी। अब जिन महंगे उपहारों और मिठाइयों का लेन-देन होता है उनमें से आत्मीयता और मिठास का पूरी तरह लोप हो गया है और उनकी जगह ले ली है दिखावे और स्वार्थ ने। यानी अब राजनीति के साथ-साथ हमारी संस्कृति और सामाजिकता भी बाजार के रंग में रंग गई है।

मिट्टी के दीये का सौंदर्य

मिट्टी का नन्हा दीया मनुष्य का एक प्राचीनतम आविष्कार है जिसका परिष्कार होता चला गया। आज तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि हमारे आदिम मनुष्य ने गुफाओं से बाहर आकर जब पहले पहल मिट्टी के बर्तन बनाए होंगे और फिर दीए का आविष्कार किया होगा तो उसे कैसी अपार खुशी हुई होगी। मिट्टी से बनाया गया, मिट्टी में उगाए गए कपास की बत्ती और मिट्टी में ही उगाए गए सरसों या अन्य तिलहनों के तेल से भरे नन्हे दीए को गौर से देखें तो उसमें मानवीय श्रम, प्रतिभा और सौंदर्य के दर्शन होंगे।