अर्थव्यवस्था

मोदी सरकार उद्योगोँ को जमींदारी में बदल देगी

‘‘ हम नए श्रम कानूनों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। आगामी जनवरी में दो दिनोे की राष्ट्रव्यापी हड़ताल भी होगी,’’ हिंद मजदूर सभा के महासचिव हरभजन सिंह सिद्धू कहते हैं। लेकिन वह मीडिया के रवैए से निराश हैं। उनका कहना है कि नए श्रम कानून लोकतंत्र के खिलाफ हैं क्योंकि ये मजदूरों को उन अधिकारों से वंचित करते है जो किसी भी लोकतंत्र के लिए जरूरी हैं। मीडिया इस पर कोई बहस चलाने के लिए तैयार नहीं है।

रुपये का अवमूल्यन : भारतीय अर्थव्यवस्था की डरावनी तस्वीर

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री विवेक कौल, जिन्होंने “ईजी मनी ट्रायोलॉजी” लिखी है, ने अपने एक आलेख में भारतीय अर्थव्यवस्था की एक तस्वीर खींची है। यह तस्वीर उजली तो कतई नहीं है। हम इस तस्वीर को ‘डार्क’ न भी कहें तो भी ‘मटमैली’ तो कहना ही पड़ेगा!

नोटबंदी अमेरिकी कम्पनियों के फायदे के लिए थी ?

जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, वह अमरीकी दबाव के आगे घुटने टेकती रही है और अमरीकी कॉर्पोरेशन्स को लाभान्वित करने वाली नीतियों पर अमल करती रही है। नोटबंदी का अभियान अमरीकी कॉर्पोरेट हितों के समक्ष समर्पण का ही एक और कदम था। अक्टूबर २०१६ में यूएसएड और भारत के वित्त मंत्रालय के बीच एक समझौता हुआ था जिसका नाम है कैटालिस्ट: इंक्लूसिव कैशलेस पेमेंट पार्टनरशिप इसका लक्ष्य था भारत में नगदीविहीन भुगतान में जबरदस्त बढ़ोतरी करना। यह साझेदारी यूएसएड द्वारा २०१५ में कराए गए और जनवरी २०१६ में प्रस्तुत एक अध्ययन की रिपोर्ट पर आधारित है। इस रिपोर्ट का शीर्षक: बियॉण्ड कैश (नगद से आगे)। इस रिपोर्ट और उसके बाद की योजनाओं को गुप्त रखा गया। इससे प्रधान मंत्री का वक्तव्य, कि नोटबंदी की तैयारियां कई महीनों से चल रही थीं , का वास्तविक अर्थ समझ में आ जाता है।

रिजर्व बैंक की रिपोर्ट बता रही है कि देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है!

रिजर्व बैंक की कल पेश हुई रिपोर्ट ने नोटबन्दी को तो पूरी तरह से फ़ेल करार दिया ही है, साथ ही इस रिपोर्ट से मोदी सरकार के नेतृत्व में देश के बर्बाद होने वाले भविष्य की भयावह तस्वीर उभर रही है। देश का बिका हुआ और डरा हुआ मीडिया कभी इस तरह के विश्लेषण पेश नहीं करता।

मोदी सरकार के चार साल और विकास दर में वृद्धि का सच

देश की अर्थव्यवस्था के बारे में मोदी सरकार की ओर से जारी आंकड़ों को के बाद से विकास दर को लेकर यह बहस तेज है कि मनमोहन सरकार ने देश का बेहतर आर्थिक विकास किया या मोदी सरकार। सरकार अब आंकड़ों को ही अस्थायी बता रही है। सच्चाई यह है कि पहले दो वर्षों के दौरान सरकार ने जीडीपी आकलन की प्रणाली में दो बार संशोधन किए, ताकि संवृद्धि दर को 7% से ऊपर दिखाया जा सके। इसके बावजूद 2016 के बाद से जीडीपी संवृद्धि दर में पुनः गिरावट आनी शुरू हो गई। लगातार छह तिमाहियों तक इसमें निरंतर गिरावट आई, 2016 की पहली तिमाही में यह 9.2% थी जो गिरते-गिरते 2017 की दूसरी तिमाही तक 5.7% तक आ गई। अब सरकार दावा कर रही है कि अर्थव्यवस्था में पुनः सुधार आना शुरू हो गया है, 2017 की तीसरी तिमाही में इसमें 6.3% की वृद्धि हुई और भविष्य में इसमें और अधिक वृद्धि होने की संभावना है। वास्तविकता यह है कि विकास में पुनरुद्धार का यह दावा अधूरे आंकड़ों पर आधारित है।

भारत में रोजगार के अवसरों को डकार रहा है चीन

देश मे बेरोजगारी की स्थिति दिन ब दिन भयानक होती जा रही हैं।  अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) की मौजूदा रिपोर्ट बता रही है कि भारत मे 77 फीसदी लोगो की नॉकरियो पर खतरा मंडरा रहा है।  अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) की ओर से जारी ‘द वर्ल्ड एंप्लॉयमेंट एंड सोशल आउटलुक- ट्रेंड्स 2018’ बताती है कि मोदी सरकार ने बेरोजगारों को रोजगार नहीं दिया है बल्कि भ्रम फैलाया है।

डिजिटल लेन-देन: बडे धोखे हैं इस राह में!

इन दिनों भारत के डिजिटल होने पर काफी जोर है. डिजिटल इंडिया हुक्मरानों का एक बहुत बड़ा सपना है. नोटबंदी के बाद से ही ऑनलाइन भुगतान का चलन बढ़ गया है या यूं कहें कि बढा दिया गया है. पेटीएम, भीम और इसी तरह की त्वरित भुगतान वाली कई ऐप्स बाजार में आ चुकी हैं जिनका इस्तेमाल लोग धड़ल्ले से कर रहे हैं. नकद लेनदेन की जगह अब ऑनलाइन भुगतान चलन में है और लोग बजाय बाजार जाने के घर बैठे ही उपभोक्ता उत्पाद खरीद रहे हैं. इस डिजिटल लेनेदेन से उपभोक्ताओं का समय भी बच रहा है और बैंक से पैसा निकाल कर भुगतान करने की जहमत से बचा जा रहा है और कई लोगों का इसमें जबरदस्त विश्वास भी है. लेकिन सवाल है कि क्या डिजिटल या ऑनलाइन लेन-देन पूरी तरह सुरक्षित सुरक्षित है? जवाब है- बिल्कुल नहीं। बडे धोखे हैं इस राह में।