कांग्रेसियों का दिल है कि मानता नहीं

महाराष्ट्र को लेकर जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक शिवसेना का राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी के बीच तालमेल जितना बेहतर है, उतना कांग्रेस के साथ नहीं है। कांग्रेस की ओर से ही जब-तब इस तरह के बयान आते दिखे हैं, जिससे शिवसेना को असहज होना पडा। कहा जा रहा है कि कांग्रेस सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण गठबंधन सरकार में जगह न पाने की वजह से खुश नहीं हैं। कहा जाता है कि इनके कुछ बयानों को लेकर उद्धव ठाकरे ने शरद पवार से मिलकर अपनी नाराजगी जताते हुए कहा है कि इस तरह के बयान अपनी ही गठबंधन सरकार की सेहत के लिए अच्छे नहीं। पवार ने भी उनकी नाराजगी को वाजिब मानते हुए कांग्रेस आलाकमान को चेताया है कि महाराष्ट्र में बडी मुश्किल से गठबंधन सरकार बनी है और अगर वह अपनी ही ‘कोशिशों’ के जरिए गिरती है तो कांग्रेस को ही ज्यादा नुकसान होगा। अब देखना होगा कि पवार की इस चेतावनी को कांग्रेस नेतृत्व कितनी गंभीरता से लेता है और अपने राज्य नेताओं की वाचालता पर कोई अंकुश लगाता है या नहीं। उधर, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता राज ठाकरे भाजपा के साथ कदमताल ताल करने के लिए बेहद आतुर हैं। इस सिलसिले में अमित शाह के साथ उनकी मुलाकात भी प्रस्तावित है। वे एनआरसी और एनपीआर के समर्थन में राज्य में अभियान भी चला सकते है।

इस हद तक राजनीतिक अदावत

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी इस वक्त अपने सूबे की विधान परिषद को खत्म करने के लिए कमर कसे हुए हैं। उनकी दलील है कि इसके खत्म होने से सदस्यों के वेतन और दूसरी सुविधाओं पर जो मोटी रकम खर्च होती है, उसे बचाया जा सकता है। यह दलील अपनी जगह बिल्कुल जायज है, लेकिन राजनीति में अक्सर जो दिखता है, वह होता नहीं और जो होता है वह दिखता नहीं। आंध्र की राजनीति में जगन रेड्डी की तेलुगू देशम सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू के साथ जो अदावत है, वह किसी से छिपी नहीं है। यह अदावत पार्टी स्तर से हटकर निजी स्तर तक जा चुकी है। कहा जा रहा है कि विधान परिषद को खत्म कराने के जगन रेड्डी का जो इरादा है, उसकी पृष्ठभूमि में यही कटुता छिपी हुई है। दरअसल चंद्रबाबू के पुत्र नारा लोकेश जो कि पिछली नायडू सरकार में सबसे ‘ताकतवर’ चेहरा बनकर उभरे थे, वे इस समय विधान परिषद के ही सदस्य हैं। 2019 के विधानसभा चुनाव में वे जगन की पार्टी के उम्मीदवार से हार गए थे। जगन रेड्डी अब उन्हें विधान परिषद में भी नहीं देखना चाहते। ऐसे तो वह उन्हें हटा नहीं सकते, इसलिए उन्होंने विधान परिषद ही खत्म करने का फैसला कर लिया। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। वैसे जगन ने आंध्र प्रदेश में विधान परिषद को खत्म करने का जो मुद्दा छेडा है, उसका असर विधान परिषद वाले अन्य राज्यों में भी भी देखने को मिल रहा है। वहां भी विधान परिषद को खत्म करने की मांग उठ रही है।

गांव बसा नहीं और..

कांग्रेस के लिए कहा जाता है कि उसके नेताओं में एक ‘क्रीमी लेयर’ है, जो हर कीमत पर ‘पॉवर’ में बने रहना चाहती है और इन्हीं की वजह से पार्टी के अंदर दूसरी कतार के नेता तैयार नहीं हो सके हैं। वैसे तो पार्टी के ज्यादातर बडे नेता चुनाव नहीं लडते हैं और अलग-अलग सूबों से राज्यसभा में दाखिल हो जाते हैं। जो नेता चुनाव लडते हैं, वे भी पिछले दो चुनावों से हार रहे हैं और संसद से उनकी दूरी उन्हें बेचैन किए हुए है। ताजा संदर्भ इस साल प्रस्तावित राज्यसभा के चुनाव का है। इस साल अलग-अलग राज्यों की 73 सीटों के लिए चुनाव होना है। इनमें वे राज्य भी शामिल हैं, जहां पिछले दिनों विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की है या अपनी स्थिति में सुधार किया है। ऐसे में इन राज्यों से राज्यसभा पहुंचने की संभावनाएं भी बढी हैं और दावेदार भी। जो लोग पहले से राज्यसभा में हैं और जिनका कार्यकाल अब समाप्त होने वाला हैं, वे तो अपनी सीट बचाने की कोशिश मे तो हैं ही, लेकिन जो लोग लगातार हार की वजह से संसद नहीं पहुंच पा रहे हैं, उनके लिए भी यह चुनाव एक उम्मीद है।

दिल्ली में नीतीश भी काम नहीं आए

भाजपा ने दिल्ली के चुनाव में इस बार पूर्वांचल के वोटों के लिए नीतीश कुमार से भी प्रचार कराया। बिहार से सटे झारखंड में तीन महीने पहले ही दोनों पार्टियां अलग अलग लडी थीं। सोचें, झारखंड में जहां जनता दल (यू) का पुराना आधार रहा है और एक समय वहां उसके छह विधायक होते थे। राज्य में भाजपा की पहली सरकार जद (यू) के साथ ही बनी थी। वहां दोनों पार्टियों ने तालमेल नहीं किया। वहां दोनों अलग लडे पर दिल्ली में दोनों का तालमेल हुआ और भाजपा ने जद (यू) के लिए दो सीटें छोड़ी। भाजपा ने बिहार की दूसरी सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी के लिए भी एक सीट छोड़ी। इसका मकसद पूर्वांचल का वोट सुनिश्चित करना था। इसी मकसद से नीतीश कुमार से दिल्ली में प्रचार कराया गया। दिल्ली में उनके साथ मंच पर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह भी रहे। इसके बावजूद पूर्वांचल का वोट भाजपा की बजाय आम आदमी पार्टी के साथ गया। दिल्ली में पूर्वांचल के वोटों को ध्यान में रख कर ही भाजपा ने मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। इसी वोट को लुभाने के लिए अमित शाह ने बिहार में जाकर कहा कि भाजपा बिहार का चुनाव जद (यू) के साथ ही लडेगी और नीतीश कुमार ही गठबंधन का चेहरा होंगे। पर इनमें से कोई भी दांव कारगर नहीं रहा।

एनसीआर पर भाजपा की फंसावट

केंद्र की भाजपा सरकार ने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी पूरे देश में लागू करने का इरादा तो जाहिर कर दिया है लेकिन भाजपा नेतृत्व अब इस बात को लेकर दुविधा में है कि है कि वह इसे राजनीतिक मुद्दा कैसे बनाए। अभी बिहार में चुनाव होना है, जहां भाजपा को नीतीश कुमार के साथ लडना है और नीतीश कुमार ने दो टूक अंदाज में कहा है कि वे एनआरसी का समर्थन नहीं करेंगे। भाजपा की दूसरी सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी भी एनआरसी का समर्थन नहीं करेगी। सो, अगर भाजपा को जद (यू) और लोजपा के साथ मिल कर लडना है तो उसे एनआरसी का मुद्दा छोडना होगा। भाजपा की असली समस्या इस बात को लेकर है कि वह अगर बिहार में एनआरसी का मुद्दा छोडती है तो उसके लिए पश्चिम बंगाल में इसे बडा मुद्दा बनाना आसान नहीं होगा। असल में बंगाल में 29 फीसदी मुस्लिम आबादी है और भाजपा के पास ध्रुवीकरण के लिए ब्रह्मास्त्र के रूप में एनआरसी है। भाजपा और संघ बहुत पहले से दावा करते रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को पश्चिम बंगाल मे शरण दे रखी है। इस प्रचार का फायदा भाजपा को लोकसभा में मिल चुका है और उसे उम्मीद है कि विधानसभा में भी मिलेगा। भाजपा के कई नेता मान रहे है कि पार्टी को बिहार में नीतीश से अलग होकर एनआरसी के मुद्दे पर लडना चाहिए। हो सकता है कि पार्टी बिहार मे हार जाए पर इससे बंगाल जीतना आसान हो जाएगा।

भाजपा ने माना कि हिंदू भी आतंकवादी हो सकता है!

भाजपा नेताओं का बहुत पुराना डॉयलॉग है- ‘आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।’ ऐसा कहने के साथ ही अगली सांस में वे यह कहना भी नहीं भूलते कि ‘हिंदू आतंकवादी नहीं हो सकता।’ लेकिन दिल्ली में विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा अपनी इस थ्योरी से एकदम पलट गई। भाजपा के एक नहीं, बल्कि कई नेताओं ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को आतंकवादी करार दिया। सबसे पहले केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने केजरीवाल को आतंकवादी करार देते हुए दावा किया कि उनके आतंकवादी होने के पर्याप्त सबूत हैं। केजरीवाल के संपर्क पाकिस्तान से जुडे होने की बात भी कही गई। जावडेकर के बाद सांसद परवेश वर्मा, भाजपा उम्मीदवार कपिल मिश्रा, तेजिंदर बग्गा और अन्य नेताओं ने भी केजरीवाल को आतंकवादी बताया। यह तो हुई चुनाव से पहले की बात। चुनाव नतीजे आने के बाद भी भाजपा के नवनिर्वाचित विधायक ओपी शर्मा ने कहा कि अरविंद केजरीवाल आतंकवादी है। गौरतलब है कि इन तमाम नेताओं में से किसी ने भी अपना बयान वापस नहीं लिया है और न ही पार्टी के किसी प्रवक्ता ने यह कहा है कि पार्टी इन बयानों से सहमत नहीं है। यानी कुल मिलाकर पार्टी इस बात पर एक मत है कि ‘केजरीवाल आतंकवादी है।’ यानी भाजपा ने मान लिया कि हिंदू भी आतंकवादी हो सकता है।

चलते-चलते

टेलीकॉम कंपनियों से जुडे एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जजों की अंतरात्मा इस कदर हिल उठी कि दुखी होकर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को बंद कर देने तक की सिफारिश कर दी। इससे देश को पता चला कि हमारे देश की न्यायपालिका की अंतरात्मा अभी पूरी तरह मरी नहीं है। इसी सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के आरोपी चिन्मयानंद को जमानत देकर उस मामले में पीडिता को हडकाने वाले जज को प्रमोशन देने का फैसला भी किया है, जो कि उसकी ‘अंतरात्मा’ के ‘जीवित’ होने का ही प्रमाण है।

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