निशाने पर सोनिया हैं या अहमद पटेल?

इन दिनों कांग्रेस के कई नेता मुखर होकर होकर सामने आ रहे हैं। वे पार्टी के कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं। अध्यक्ष के चुनाव की बात भी कर रहे हैं। वे चाहते हैं कि कांग्रेस कार्यसमिति का भी चुनाव हो। यहां तक कह रहे हैं कि भाजपा को हराने की अपनी जिम्मेदारी कांग्रेस दूसरी पार्टियों पर डालती जा रही है। इस तरह की बातें जयराम रमेश, अभिषेक मनु सिंघवी और शशि थरुर ने कही है। ये तीनो पार्टी के सांसद है। ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, संजय निरुपम आदि ने भी तीखे बयान दिए हैं। थरुर ने तो बहुत साफ शब्दों में कहा है कि राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव होना चाहिए था। सवाल है कि क्या थरुर ने सोनिया गांधी की ऑथोरिटी पर सवाल उठाया है? ध्यान रहे राहुल के इस्तीफ़े के बाद चुनाव इसलिए नहीं हुआ क्योंकि कार्य समिति ने सोनिया को अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया था। अब जबकि सोनिया खुद कांग्रेस संगठन चला रही हैं, तो सवाल उठाने का मतलब उनकी ऑथोरिटी पर सवाल उठाना है। पर इसे लेकर एक दूसरी थ्योरी भी कांग्रेस के ही नेता बता रहे है। उनका कहना है कि असल में सवाल अहमद पटेल पर उठ रहे हैं, क्योंकि सोनिया के नाम से संगठन वे ही चला रहे है। इसीलिए यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस नेताओं की ताजा बयानबाजी प्रायोजित है। राहुल के करीबी नेताओं की शह पर बयानबाजी हो रही है। नेता के चुनाव का हल्ला मचा कर राहुल गांधी को फिर से कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की तैयारी हो रही है।

भाजपा का चुनावी एजेंडा नहीं बदलेगा

ऐसा कतई नहीं लग रहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली में विधानसभा चुनाव की हार के सबक को बहुत गंभीरता से लिया है। अगर दिल्ली में विभाजनकारी एजेंडे को पार्टी फेल हुआ मानती तो निश्चित रूप से पार्टी नेताओं के सुर बदले होते। पर उलटे बिहार में पार्टी के नेताओ ने दिल्ली की तरह का भाषण अभी से शुरू कर दिया है। पिछले दिनों बिहार भाजपा के नेता और केद्गीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा- ‘हमारे पूर्वजों से गलती हो गई, 1947 में ही सभी मुसलमानों को पाकिस्तान भेज देना चाहिए था।’ जाहिर है कि भाजपा को बिहार में भी उसी एजेडे से उम्मीद है, जो एजेंडा दिल्ली में नहीं चला है। इसका यह भी मतलब निकाला जा रहा है कि भाजपा के नेता दिल्ली मे पांच फीसदी वोट और पांच सीटें बढने को ही अपनी कामयाबी मान रहे हैं। इसीलिए पार्टी अपने पुराने एजेंडे को छोड नहीं रही है। हालांकि इस बार लोकल नैरेटिव भी रहेगा, इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के हुनर हाट में लिट्टी-चोखा खाकर सांकेतिक तौर पर बिहार चुनाव का प्रचार अभियान शुरू किया।

शत्रु फिर मित्र बनने को आतुर!

अभिनेता से नेता बने शत्रुघ्न सिन्हा को अब लग रहा है कि उन्होंने सियासी हवा का रुख भांपने में गलती कर दी और यशवंत सिन्हा के चक्कर में पडकर नाहक ही भाजपा से बाहर आ गए। किसी तरह से सांसद बने रहने की जद्दोजहद में वे खुद कांग्रेस की टिकट पर पटना साहिब सीट से चुनाव लडे और अपनी पत्नी पूनम सिन्हा को भी समाजवादी पार्टी के टिकट पर लखनऊ से चुनाव लडवा दिया। दोनों हार गए। अब शत्रुघ्न सिन्हा राज्यसभा के लिए प्रयास कर रहे है। पर बिहार के मौजूदा गणित को देखते हुए यह मुश्किल लग रहा है। इसीलिए वे फिर से भाजपा में लौटना चाहते है। पिछले दिनों उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह की तारीफ की। बहरहाल, अभी तो उन्हें भाजपा में कोई भी भाव देने को तैयार नहीं है। वैसे भी उनकी उम्र 74 साल हो गई है और वे भाजपा मे बने अघोषित नियम के मुताबिक रिटायर होने की कगार पर हैं। इसलिए उनके शुभचिंतक उन्हें सलाह दे रहे हैं कि फिलहाल वे विपक्ष में ही बने रहे, क्योंकि अभी नहीं तो दो साल बाद वहां उनके लिए राज्यसभा में जाने की गुंजाइश बन सकती है।

हैरान करती नीतीश की कलाबाजी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों जिस तेजी से कलाबाजी दिखा रहे हैं, उससे उनके समर्थक और विरोधी दोनों हैरान हैं। उन्होंने इसी साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अपना प्रचार अभियान जिस राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के 15 साल पुराने शासन को निशाना बना कर शुरू किया था, उसी राजद के साथ अब वे नजदीकी बढाते दिख रहे हैं। राजद भी उनके प्रति सद्भाव दिखा रहा है। बीते मंगलवार को जब राज्य विधानमंडल का सत्र शुरू हुआ तो विधान परिषद में विपक्ष की नेता राबडी देवी ने गुलदस्ता देकर नीतीश का स्वागत किया। जबकि परंपरा के मुताबिक विधान परिषद के सभापति मुख्यमंत्री को गुलदस्ता भेंट करते हैं। इसके बाद दो दिनों में नीतीश कुमार ने विधानसभा मे नेता विपक्ष तेजस्वी यादव से दो बार मुलाकात की। मुलाकात के बाद राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर, (एनपीआर) का फॉर्मेट बदलने और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर, (एनआरसी) के खिलाफ विधानसभा में आम सहमति से प्रस्ताव पास हुआ। इसी सबके चलते सवाल उठ रहा है कि नीतीश आखिर चाहते क्या हैं? वे 2015 की तरह फिर से राजद के साथ तालमेल की तैयारी कर रहे हैं या सीट बंटवारे से पहले भाजपा पर दबाव बनाने के लिए उसे यह संदेश दे रहे हैं कि वे भाजपा का साथ छोड भी सकते हैं? सवाल यह भी है कि क्या नीतीश को इस बात का अहसास हो गया है कि भाजपा चुनाव से पहले या नतीजों के बाद उनके साथ धोखा कर सकती है? कुल मिलाकर भाजपा, जद (यू) और लोजपा के गठबंधन में सबकुछ ठीक नही है। आने वाले दिनों में कुछ भी हो सकता है।

भाजपा ने बाहर कराया प्रशांत किशोर को?

राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर को क्या भाजपा ने जनता दल (यू) से अलग कराया है? बिहार मे जदयू के कई नेता और करीबी नौकरशाह मान रहे है कि भाजपा का इसमे कुछ न कुछ हाथ जरूर रहा। पर दूसरा सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को खुद एनपीआर और एनआरसी का विरोध करना था तो उसी का विरोध कर रहे प्रशांत किशोर और पवन वर्मा को क्यों हटाया? यह समझ मे नहीं आने वाली गुत्थी है। कुछ जानकार मान रहे है कि यह पूरा मामला जितना ऊपर से दिख रहा है, असल में वैसा ही नहीं है। इसके कई और पहलू है, जो अभी दिख नहीं रहे हैं। बहरहाल, जद (यू) के एक नेता का कहना है कि प्रशांत किशोर को हटाने का एक कारण भाजपा का दबाव था। भाजपा के शीर्ष नेताओ ने इस बारे में नीतीश कुमार से बात की और कहा कि प्रशांत हर जगह भाजपा विरोधी पार्टियों के लिए काम कर रहे हैं और बिहार मे गठंबधन के साथ है। ये दोनों बातें नहीं चल सकती। लेकिन कहा यह भी जा रहा है कि नीतीश कुमार इतने भोले तो हैं नहीं कि वे सिर्फ दबाव में आकर प्रशांत किशोर को बाहर कर देते। उनका भी कोई न कोई गेम प्लान जरूर है।

गुजरात में राज्यसभा के लिए फिर घमासान होगा

गुजरात में राज्यसभा की चार सीटों के चुनाव होना हैं। इनमे से तीन भाजपा की है और एक सीट कांग्रेस के मधुसूदन मिस्त्री की है। विधानसभा के मौजूदा गणित के हिसाब से भाजपा के 103 और कांग्रेस के 73 विधायक हैं। ध्यान रहे चुनाव के समय भाजपा 99 सीटों पर जीती थी और कांग्रेस के 79 विधायक थे। बहरहाल, 182 सदस्यों वाली गुजरात विधानसभा मे दो सीटें खाली है। इस लिहाज से राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए 37 वोट की जरुरत है। इस हिसाब से भाजपा दो सीटें जीतेगी और उसके पास 29 अतिरिक्त वोट बचेंगे। दूसरी ओर कांग्रेस अपनी मौजूदा संख्या में अगर एक विधायक जोड लेती है तो वह दो सीटें जीत सकती है। ध्यान रहे राज्य में विधानसभा की एक सीट एनसीपी के पास और दो सीटें भारतीय ट्राइबल पार्टी के पास है, जिसके नेता छोटूभाई वसावा है। एक निर्दलीय विधायक भी है। कांग्रेस को उम्मीद है कि ये चारों विधायक उसका साथ देंगे। पर भाजपा इतनी आसानी से अपनी एक सीट का नुकसान नहीं उठाने वाली है। वह छोटी पार्टियों व निर्दलीय विधायक को पटा कर और कांग्रेस में क्रॉस वोटिग करा कर तीसरी सीट जीतने का प्रयास करेगी। यानी एक बार फिर गुजरात मे राज्यसभा का चुनाव बेहद दिलचस्प होने वाला है। दो साल पहले अहमद पटेल का चुनाव भी ऐसे ही लड़ा गया था।

चलते-चलते

दिल्ली में दंगों के सिलसिले में आम आदमी पार्टी ने चुनौती देने के अंदाज में सवाल किया कि हमने तो अपने एक पार्षद पर आरोप लगने के बाद उसे निकाल दिया, लेकिन भाजपा ने क्या किया? इस पर भाजपा ने जुबानी तौर पर तो कोई जवाब नहीं दिया लेकिन उसी दिन देर रात में दंगों से जुडे मामलों की सुनवाई कर रहे हाई कोर्ट जज का तबादला कर दिया कर दिया गया।

Comments