भारतीय जनता पार्टी लम्बे समय से ये सच्चाई जानती है कि आदिवासी समुदाय में उसकी पैठ कमजोर है! क्योंकि, भाजपा आज भी आदिवासियों का भरोसा जीतने में कामयाब नहीं हो सकी! आजादी के बाद से ही आदिवासी कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक रहे हैं। इसमें सैंध लगाने के लिए संघ ने भी काफी कोशिशें की और ये कोशिश आज भी जारी है, पर इसका कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया! प्रदेश की 6 लोकसभा सीटों के लिए जब भी सही उम्मीदवार की खोज होती है तो असलियत सामने आ जाती है। इस बार भी भाजपा की स्थिति आदिवासी सीटों पर ठीक-ठाक नजर नहीं आ रही! करीब सभी सीटों पर भाजपा को आदिवासी क्षेत्रों में चुनौती मिलती दिख रही है। मोदी लहर में पिछली सभी सीटें (बाद में झाबुआ-रतलाम सीट हार भी गई थी) भाजपा ने भले जीत ली हों, पर वर्तमान हालात ऐसे नहीं हैं!
   मध्यप्रदेश की 7.26 करोड़ की आबादी में 21% अनुसूचित जनजाति की है। लेकिन, इस आबादी का झुकाव हमेशा कांग्रेस की तरफ रहा है। 2013 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने भले ही अपनी सीटें बढ़ा ली हों, पर पार्टी के पास ऐसा कोई नेता नहीं है, जो आदिवासियों को प्रभावित कर सके! धार और झाबुआ में आदिवासियों को जो नेतृत्व कांग्रेस ने दिया, वो भाजपा नहीं दे सकी! दिलीपसिंह भूरिया ने कांग्रेस छोड़ी तो उनकी जगह कांतिलाल भूरिया ने ले ली, पर भाजपा अपने बूते पर ऐसा कोई नेता खड़ा नहीं कर सका! कांग्रेस के शिवभानुसिंह सोलंकी और जमुना देवी के सामने भाजपा का कोई नेता टिक नहीं सका! यही स्थिति दिलीपसिंह भूरिया की भी थी। मंडला सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी रहे, लेकिन अपनी पहचान नहीं बना सके, बल्कि विवादों में ही ज्यादा रहे! यही कारण रहा कि 2013 के विधानसभा चुनाव में आदिवासी इलाके की करीब तीन चौथाई सीटें भाजपा के पास थीं! लेकिन, 2018 के चुनाव में हालात उलट गए। आज अधिकांश सीटें कांग्रेस के पास है।
     करीब 2 दशक बाद ये पहला मौका है, जब आदिवासी वोट भाजपा के हाथ से निकलता नजर आ रहा है। विधानसभा चुनाव के नतीजों का संकेत भी यही है। इन सुरक्षित सीटों पर भाजपा को बड़ा नुकसान होने की आशंका है। विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने मालवा-निमाड़ से महाकौशल तक आदिवासी सीटों पर नुकसान झेला है। मालवा-निमाड़ में भाजपा 2014 में मिली 66 में से 57 सीटों से फिसलकर 27 पर इसीलिए पहुंची कि धार, झाबुआ और खरगोन में उसके ज्यादातर उम्मीदवार हार गए। यदि विधानसभा चुनाव के नतीजों को आधार मानकर आंकलन किया जाए तो भाजपा के लिए पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों को दोहरा पाना मुश्किल लग रहा है। अनुसूचित जनजाति वाली सीटें हैं शहडोल, मंडला, बैतूल, खरगोन, धार और झाबुआ-रतलाम है। इनमें सिर्फ कांग्रेस झाबुआ-रतलाम ही उपचुनाव में जीत पाई थी! अब ये सभी आधा दर्जन सीटें खतरे में लगती हैं।
  धार लोकसभा सीट पर पिछला चुनाव भाजपा ने जीता था। यहाँ सवित्री ठाकुर ने जीती थी, लेकिन इस बार पार्टी ने थके, चुके उम्मीदवार छतरसिंह दरबार को टिकट दिया है। वे पहले सांसद रह चुके हैं, पर अब उनका कोई जनाधार नहीं बचा! वे न तो विक्रम वर्मा गुट के हैं न रंजना बघेल गुट के! उन्हें पार्टी ने क्या सोचकर टिकट दिया है, ये समझ से परे हैं। विधानसभा चुनाव में संसदीय क्षेत्र की 8 में से 6 सीटें कांग्रेस ने जीती है। यहाँ छतरसिंह दरबार का मुकाबला कांग्रेस के दिनेश गिरेवाल से होगा। दिनेश गिरेवाल भी बेहद कमजोर उम्मीदवार हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में वोटों के बड़े अंतर ने कांग्रेस की ताकत को बढ़ाया है। यही स्थिति खरगोन लोकसभा सीट की भी है। यहाँ भी भाजपा के लिए पिछली जीत दोहरा पाना आसान नहीं है। इस संसदीय सीट पर भाजपा को विधानसभा की 8 में से एक सीट पर बढ़त मिली है। एक पर निर्दलीय जीता और 6 सीटें कांग्रेस के पास गईं! ऐसे हालात में पार्टी ने पिछले चुनाव जीते सुभाष पटेल का टिकट काटकर गजेंद्र पटेल को उम्मीदवार बनाया है, जो किसी के गले नहीं उतर रहा!
  मंडला लोकसभा सीट से भाजपा ने फग्गनसिंह कुलस्ते को फिर उम्मीदवार बनाया है। यहां के संसदीय क्षेत्र में भाजपा के पास विधानसभा की सिर्फ 2 सीटें हैं। 6 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस की जीत ने उनके उत्साह को बढ़ाया है। पार्टी ने अपने सर्वे में पाया कि यहाँ फग्गनसिंह कुलस्ते के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश है, इस कारण वे सीट बदलना भी चाह रहे थे, पर पार्टी ने उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी। यहाँ पार्टी के पास कोई विकल्प नहीं होने से उनको ही मैदान में उतारा गया! उनका अनमनेपन से चुनाव लड़ना, नतीजा साफ़ दर्शा रहा है। यहाँ से कांग्रेस ने कमल मरावी को उम्मीदवार बनाया है। वे भी लोकप्रिय नेता नहीं हैं, पर कुलस्ते का विरोध उनकी राह को आसान बना सकता है।
  शहडोल में भी भाजपा अंदरूनी राजनीति से जूझ रही है। जबकि, यहाँ कांग्रेस और भाजपा दोनों को विधानसभा की 4-4 सीटें मिली है और मुकाबला बराबरी का है। पिछली बार यहाँ गोंडवाना गणतंत्र पार्टी के उम्मीदवार हीरासिंह मरकाम ने चुनाव लड़कर त्रिकोणीय स्थिति बनाकर भाजपा की जीत को आसान कर दिया था। इस बार यहाँ भाजपा ने ज्ञानसिंह को हटाकर हेमाद्री सिंह को उम्मीदवारी सौंपी है। वे कांग्रेस की नेता राजेश नंदिनी सिंह की बेटी हैं। यहाँ कांग्रेस ने भाजपा छोड़कर आई प्रमिला सिंह को टिकट दिया है। विरोध के स्वर कांग्रेस में भी हैं, पर इससे भाजपा की जीत आसान हो जाएगी, ऐसा नहीं है। यहाँ यदि भाजपा को जीतना है तो उसे पूरा जोर लगाना पड़ेगा! बैतूल लोकसभा सीट से पिछला चुनाव जीतने वाली भाजपा की ज्योति धुर्वे फर्जी जाति प्रमाण पत्र के मामले में उलझी है। इसलिए धुर्वे को टिकट देने का तो सवाल ही नहीं उठता था! विधानसभा चुनाव में यहाँ कांग्रेस और भाजपा दोनों ने बराबरी से 4-4 सीटें जीती हैं। भाजपा ने इस बार संघ की पृष्ठभूमि वाले दुर्गादास उइके को मैदान में उतारा है। वे कोई कमाल कर सकेंगे, इसमें संदेह है। क्योंकि, उनका भी विरोध है।
  झाबुआ-रतलाम लोकसभा सीट कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया के पास है। वे 2013 में जीते भाजपा के दिलीपसिंह भूरिया के निधन के बाद के हुए उपचुनाव में भाजपा की निर्मला भूरिया को हराकर ये चुनाव जीते थे। इससे पहले दिलीपसिंह भूरिया ने ही कांतिलाल भूरिया को हराया था। इस संसदीय क्षेत्र की 8 में से सिर्फ 3 विधानसभा सीट पर ही भाजपा को बढ़त मिली है। कांग्रेस ने पांच सीटें जीती हैं। कांग्रेस ने फिर कांतिलाल भूरिया को उम्मीदवार बनाया, तो मुकाबले में भाजपा ने झाबुआ से विधायक गुमानसिंह डामोर को उतारा है! विधायक को लोकसभा चुनाव नहीं लड़ाने के नियम के बावजूद डामोर को उम्मीदवार बनाए जाने का साफ़ मतलब है कि यहाँ भाजपा के पास कोई सशक्त उम्मीदवार नहीं है! सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद गुमानसिंह डामोर भाजपा में आए और विधानसभा का चुनाव जीते! लेकिन, उनकी जीत का कारण कांग्रेस में फूट थी! जैवियर मेढ़ा ने निर्दलीय चुनाव लड़कर भाजपा के लिए रास्ता आसान कर दिया था, पर फिलहाल ऐसे हालात नहीं है!

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