लोक सभा चुनावों के नतीजे आ जाने के बाद देश में दिलचस्प बहस शुरू हो गई है कि कांग्रेस का क्या हो। कुछ लोग पार्टी की समाप्ति चाहते हैं। कई दूसरे लोग राहुल गांधी को उसके अध्यक्ष पद से हटाने पर तुल गए। इनमें अधिकतर ऐसे हैं जिन्होंने इस पार्टी के साथ काम नहीं किया है। पार्टी के भीतर ऐसी आवाज उठे तो इसका कुछ मतलब भी हो सकता है। लेकिन पार्टी के बाहर से ऐसी आवाज लोकतंत्र की सामान्य समझ के खिलाफ है।  लेकिन यहां हमें अमर्त्य  सेन की इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि मोदी ने सत्ता की लड़ाई जीती है, विचारधारा की लड़ाई नहीं। नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री हिंदुत्व की  विचारधारा की बात कर रहे हैं। जाहिर है कि अगले पांच साल भाजपा इस लड़ाई को जीतने की कोशिश करेगी। वह देश की प्रगतिशील विचारधारा पर हमले करगीे। वामपंथ को विदेशी विचार बता कर उस पर हमला आसान है, लेकिन कांग्रेस की विचारधारा पर हमला आसान नहीं है। यह यहां की मिट्टी में पैदा हुई है और इस विचारधारा के लिए लोगों ने ढेरों कुर्बानियां दी है।  हिंदुत्व की विचारधारा का मुख्य टकराव कांग्रेस की विचारधारा से है क्योंकि वह आजादी के आंदोलन की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है।
भाजपा कांग्रेस को क्यों खत्म करना चाहती है ? क्या वह चाटुकारिता पर आधारित दरबारी संस्कृति  को खत्म करना चाहती है? क्या वह वंशवाद के खिलाफ है? गहराई से जांच करने पर लगता है कि यह सच नहीं है। देश की कई पार्टियां हैं जहां दरबारी संस्कृति है और जो परिवार की जागीर बन गई हैं। इनमें समाजवादी पार्टी, राजद से लेकर शिव सेना, डीएमके, टीआरएस, लोक जनशक्ति पार्टी और तेलुगु देसम जैसी पाटियां हैं। यही नहीं कुछ पार्टियां है जो अभी सीधे-सीधे वंशवाद का इजहार नहीं करती हैं, लेकिन एक व्यक्ति की ओर से संचालित हैं। इन पार्टियों में आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और बहुजन समाज जैसी पाटियों को गिनाया जा सकता है। निर्णय की प्रक्रिया के एक-दो आदमी केे हाथ में केेंद्रित होने का उदाहरण तो भारतीय जनता पार्टी में भी दिखाई देता है। यहां भी दरबार वाली स्थिति है। पार्टी के सभी निर्णय अमित शाह और नरेंद्र मोदी लेते हैं। यह जरूर है कि वे संघ परिवार की सहमति के बगैर ऐसा नहीं कर सकते। भाजपा मेें एक महासचिव और संगठन मंत्री आरएसएस की ओर से नियुक्त किए जाते हैं।
यह दिलचस्प है कि भाजपा कांग्रेस को छोड़ कर परिवार की जागीर बनी अन्य पार्टियों  के विनाश की कामना नहीं करती है। इनमें से एकाध को छोड़ कर उसने सभी के साथ गठबंधन किया है।  वह वंशवाद के खात्मे की कसम भी नहीं खाती है और अपनी पार्टी में ही इसके खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाती। पार्टी के कई नेताओं की संतानों को लोक सभा और विधान सभा में जगह दी गई है। वैसे भी, संघ परिवार देश की परंपरागत पारिवारिक व्यवस्था  में यकीन करता है। इससे दो बातें साबित होती है। एक, भाजपा की लड़ाई कांग्रेस के वंशवाद से नहीं है और दूसरी, कांग्रेस की बीमारी वंशवाद नहीं है और न ही फैसले लेने की प्रक्रिया का केंद्रीकरण है क्योंकि दोनों ही देश की सभी पार्टियों में किसी न किसी तरीके से मौजूद है।
इसलिए इसमें किसी को शक नहीं होना चाहिए कि संघ परिवार को आजादी के आंदोलन की विचारधारा को खत्म करना है और इसके लिए कांग्रेस को खत्म करना जरूरी है क्योंकि उसकी विरासत की साक्षात प्रतिनिधि है। आजादी की इस विचारधारा के मूल तत्व हैं-धर्म, लिंग और जाति की बराबरी, लोगों के बीच आर्थिक और सामाजिक समानता स्थापित करना, अभिव्यक्ति की आजादी, विश्व-शांति , अहिंसा, कमजोर तबकों  के लिए विशेष अवसर, गैर-बराबरी वाली, शोषणकारी तथा अत्याचारी प्रथाओं का अंत, वैज्ञानिक दृष्टि और इतिहास के बारे में साझाी विरासत वाली समझ।
संघ परिवार इन विचारों के आधार पर विकसित भारतीय राष्ट्र की परिकल्पना के  खिलाफ हैै। यही वजह है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद सबसे ज्यादा हमले इन्हीं विचारों पर हुए। उसके निशाने पर जवाहर लाल नेहरू रहे क्योंकि वह इन विचारों का सबसे प्रभावशाली प्रतिनिधि हैं। उन्होंने आजाद भारत को इन्हीं विचारों पर विकसित करने की कोशिश की।
यह और बात है कि कांग्रेस की जिस विचारधारा से भाजपा लड़ रही है, खुद कांग्रेस उससे पीछे हटती रही है और  वह विचारधारा के लिए संघर्ष करना भी छोड़ चुकी है। उसने आंदोलन से परहेज करने वाली राजनीतिक संस्कृति अपना ली है।  पार्टी की विचारधारा में बदलाव की यह शुरूआत इंदिरा गांधी के शासन में ही हो चुकी थी। उन्होंने जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में बनी मजबूत लोकतांत्रिक परंपराओं को तोड़ा और आपातकाल लगाने की हद तक गईं। इससे उन्होंने कांग्रेस की विचारधारा को ऐसी हानि पहुंचाई जिसकी आज तक भरपाई नहीं हो सकी है। राजीव गांधी के समय में कांग्रेस अपनी आर्थिक नीतियों से हटने लगी थी और उनके समय में ही उदारवादी नीतियों की नींव रखी जा चुकी थी जिसकी परिणति नरसिंहा राव के समय मे नई आर्थिक नीतियों के निर्माण में हुई। गांधी जी के रास्ते को नेहरू ने छोड़ना शुरू कर दिया था, इंदिरा और राजीव ने नेहरू का रास्ता छोड़ा। राव के समय में कांग्रेस नेहरू की नीतियों से एकदम अलग हो चुकी थी। अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढहाने के समय उनकी भूमिका सेकुलरिज्म की नीति को धक्का पहुंचाने वाली नीति थी । बाद में, सोनिया गांधी ने नरसिंहा राव के समय की आर्थिक नीति के निर्माता मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना कर आर्थिक नीतियों में राव वाला रास्ता ही अपनाया। पार्टी के सभी बड़े नेता-प्रणब मुखर्जी, चिदंबरम, कमलनाथ, आनंद शर्मा आदि इन नीतियों के पक्के समर्थक हैं। वे निजीकरण, विदेशी पूंजी और सरकारी कंपनियों को निजी हाथोें में सौंपने के बारे में एक राय रहे हैं। इस तरह भाजपा की आर्थिक नीतियों और मनमोहन सिंह की नीतियों में कोई फर्क नहीं दिखाई देता। यही वजह है कि मोदी सरकार सत्ता संभालने के बाद जिस किसी फैसले की घोषणा करती थी तो आनंद शर्मा जैसे नेता यही कहते पाए जाते थे कि यह तो हमारे कार्यक्रम की नकल है।
राहुल गांधी ने पार्टी की नीतियों में बुनियादी बदलाव लाए और वह जनविरोधी आर्थिक नीतियों से अलग होने लगे। सूट-बूट की सरकार से शुरू होकर वह सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करने और शिक्षा तथा स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च बढाने और न्यूनतम आमदनी स्कीम जैसे कार्यक्रम पर आ गए। वह नेहरूवाद के बेहद करीब आ गए हैं। भाजपा के लिए आजादी के आंदोलन की ओर लौट रही यह कांग्रेस असह्य है। यह महज संयोग नहीं है कि भाजपा और मोदी ने इस बीच सबसे अधिक हमले नेहरू पर ही किए। राहुल गांधी ने भाजपा और कांग्रेस के बीच के वैचारिक संधर्ष की एक स्पष्ट लाइन खींचने की कोशिश की है। लेकिन पार्टी के नेता भी इस बुनियादी बदलाव के लिए तैयार नहीं हैं। सच पूछिए तो नेहरूवाद की ओर लौट रही कांग्रेस के नए घोषणा-पत्र को फैलाने के लिए उन्होंने कोई प्रयास नहीं किया।
राहुल ने सामाजिक न्याय की शक्तियों को भी पार्टी में जगह दी है। उन्होंने सचिन पायलट, अशोक गहलोत, राज बब्बर को पार्टी  में   निर्णायक भूमिका दी। प्रियंका ने भी चुनाव के समय कुछ दलित और पिछड़ों को साथ लाने की कोशिश की। दलित नेता उदित राज को जिस तत्परता से पार्टी में लिया गया, वह भी पार्टी की प्राथमिकता को दर्शाता है। गुजरात विधान सभा के चुनावों में राहुल गांधी ने जिग्नेश मेवाणी, अल्पेश ठाकुर जैसे लोगों के जरिए एक सामाजिक समीकरण बनाने में सफलता पाई थी। यह अलग बात है कि वहां पार्टी फिर से पुरानी पटरी पर लौट आई।  सामाजिक न्याय के सिद्धांत को आत्मसात करने में पार्टी की विफलता की वजह से ही महाराष्ट्र जैसे राज्य में वह कोई गठबंधन या नया सामाजिक समीकरण बनाने में विफल रही।
स्पष्ट हिंदुत्व-विरोधी लाईन अपनाने में कांग्रेस कई बार चूक जाती है।  राहुल गांधी से लेकर दिग्विजय सिंह तक अपने को आस्थावान हिंदू साबित करने में लग जाते हैं।  कट्टर हिंदुत्व के सामने नरम हिंदुत्व रखने की नीति ने पार्टी नेताओं को जोकर ही बनाया। इससे ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ने वाली ताकतों को एकजुट करने की संभावना कम हो गई। नरम हिंदुत्व के जरिए वोटरों को लुभाने की इस कोशिश का नाकाम होना पक्का था। इस नीति के कारण मुसलमानों और दलितों में उत्साह भरने में भी  पार्टी नाकामयाब रही।
नेहरूवादी घोषणा-पत्र बनाया, लेकिन उसके अनुरूप राजनीति नहीं की और वामपंथी, लोकतंात्रिक तथा सेकुलर मोर्चा नहीं बनाया। इसके विपरीत भाजपा ने कारपोरेट पूंजीवाद और कठोर हिंदुत्व की विचारधारा को लेकर एक मजबूत अभियान चलाया। उसने पाकिस्तान और मुसलमान के विरोध के जरिए राष्ट्रवाद की नैरेटिव बनाई। उसने जाति के आधार पर अवसरवादी गठबंधन भी बनाया।
कांग्रेस  सामने वैकल्पिक नैरेटिव और राजनीति खड़ी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। इसके लिए उसे अपनी पुरानी शैली छोड़नी पड़ेगी और नेता भी बदलने पड़ेंगे। राहुल के इस बदलाव के वाहक हैं। कांग्रेस का इतिहास ही भाजपा के विजय-अभियान में बाधक है। भाजपा और संघ परिवार इतिहास की इस शक्ति को पहचानता है। जरूरत इस बात की है कि कांगे्रस अपनी शक्ति पहचाने और वैचारिक ढुलमुलपन छोड़ कर एक स्पष्ट राजनीतिक लाइन तय करे। मोदी-शाह की जोड़ी नेहरू और उनकी विरासत पर और भी वार करेगी।  प्रज्ञा ठाकुर के जरिए गांधी पर भी हमला जारी रहने वाला है। कांग्रेस आजादी के आंदोलन की उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व  करती है जिसे नष्ट करना संघ परिवार का लक्ष्य है। संघ परिवार के वैचारिक अभियान में कांग्रेस की विचारधारा ही बाधक है।  इन दोनों विचराधाराओं में संघर्ष ही आगे आने वाली राजनीति  का मुख्य हिस्सा होगा।
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