गुजरात के रेलवे स्टेशन पर प्रवासी बिहारियों की भीड़ है। बोरिया-बिस्तर समेट कर अपने गांव लौटने वालोें के चेहरे पर अनिश्चित भविष्य की चिंता आसानी से पढी जा सकती है। अहमदाबाद से दरभंगा आई साबरमती एक्सप्रेस से उतरे नौजवान टेलीविजन के कैमरों के सामने जिस तटस्थता से गुजरात के हालात बयान कर रहे थे, उससे पता चलता है कि हमलों ने उनके मन में नफरत नहीं पैदा की है। इसने उन्हें सिर्फ परेशानी और चिंता दी है। नफरत का नहीं होना एक सुकून की बात है।
बिहारी महाराष्ट्र, आसाम और अब गुजरात से चोट खाकर खामोश लौट रहा है। क्या इसका कोई असर राज्य के नेताओं पर होगा? ऐसा लगता तो नहीं है। टीवी पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यह कहते नजर आए कि घटना पर नजर रखे हैं और मुख्यमंत्री विजय रूपानी से बात कर चुके हैं। एकदम चुस्त सरकारी बयान।
मीडिया भी काफी समझदार है। हर घटना का महत्व समझता है। उसे पता है कि 14 महीने की बच्ची के साथ बलात्कार की जिस घटना ने अभी के हमलों को जन्म दिया है उसमें कोई मजहबी कोण नहीं है। वह बड़े तटस्थ भाव से बच्ची के साथ बलात्कार की घटना और लोगों के भागने की कहानी बता रहा है। उसे बिहार की ध्वस्त हो गई अर्थव्यस्था और दिशाहीन हो चुकी राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। वह यह नहीं बता रहा है कि ऐसे नियोजित हमले अपराध की एकाध घटना को लेकर नहीं होते। नफरत का जहर समाज की नसों मेें पूरी तरह फैल चुका होता है।
उसे यह नहीं बताना है कि लगभग डेढ दशक से राज्य में शासन चला रहे नीतीश कुमार और उनकी सहयेागी भाजपा बिहार के लोगों को इतना ही दे पाई है कि उन्हें आजीविका के लिए देश के दुर्गम से दुर्गम इलाके का चक्कर लगाना पड़ता है। देश का ऐसा कोई इलाका नहीं हैं जहां बिहारी काम के लिए नहीं जाता है।
कुछ साल पहले तक अपमान और तिरस्कार भूलने के लिए आम बिहारी कहता था कि देश की सिविल सर्विस या वैज्ञानिक संस्थानों में उसके प्रतिनिधित्व को देख लीजिए। अब यह स्वर सुनाई नहीं देता क्योंकि वह यह जान गया है कि इस सच्चाई से उसे कोई फायदा मिलने वाला नहीं है। वह समझ गया है कि बिहार की हालत ऐसी ही रहेगी।
दिल्ली, मुंबई, सूरत, बड़ौदा से लेकर देश के किसी भी औद्योगिक नगरी की झोपड़पट्टी में रहने वाले बिहारी के जीवन पर शायद ही कोई फिल्म या डाक्यूमेंटरी बनी हो। फिल्मकार प्रकाश झा ने भी बिहार के दबंगों पर ही फिल्म बनाई। यह देश के मध्य वर्ग की उसी भावना को मजबूत करता है कि बिहार का समाज जाहिल है। इससे झा को मुंबई में भी दिक्कत नहीं होती क्योंकि इससे शिव सेना और मनसे जैसे संगठनों का यह आरोप सही साबित होता है कि बिहारी बर्बर होते हैं।
रेल के साधारण डिब्बों मंे जानवरों की तरह सफर करने वाले बिहारी से पूछ लीजिए कि उसका सफर कैसे बीतता है। वह बताएगा कि रेलवे पुलिस से लेकर रेल के कर्मचारी उसके साथ किस तरह का व्यवहार करते हैं।

किसी को यह बताने की फुर्सत नहीं है कि उत्तर भारतीयों पर हमले की घटनाओं के पीछे उन्हीं संगठनों का हाथ रहा है जो हिंदूवादी हैं और जिनका तालमेल भाजपा के साथ रहा है। यह सभी जानते हैं कि भाजपा शिव सेना के सहारे ही महाराष्ट्र में फैली है। शिव सेना जैसे संगठन गुजरात और कर्नाटक में भी उग आए हैं। वैसे गुजरात में बनी ठाकोर सेना का नेतृत्व फिलहाल कांग्रेस के विधायक अल्पेश ठाकोर के हाथ में है। कांग्रेस भी इन संगठनों को पालने-पोसने में पीछे नहीं रही है। इन संगठनोें से मुकाबले की कोई रणनीति कांग्रेस क्या किसी भी पार्टी के पास नहीं है।
महाराष्ट्र में राज ठाकरे की मनसे और उद्धव ठाकरे की शिव सेना के बीच प्रतिस्पर्धा रहती है कि उत्तर भारतीयों को कौन ज्यादा सताता है। मुंबई में एक रेल पुल गिरने के बाद फुटकर सामान बेचने वाले उन बिहारियों को मनसे निशाना बनाया जाता है जो पुल पर अपनी दुकान लगाते हैं। मनसे के वीरों ने उन्हें इस तरह मारापीटा जैसे कोई चोर-उच्चके हैं। राज्य की भाजपा सरकार ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।


बिहार जैसे राज्यों के पिछड़ेपन के बारे में अब राजनीति में बहस बंद हो चुकी है। इसे जानने में किसी को कोई रूचि नहीं है कि उनके आने के पहले अत्यंत समृद्ध इस क्षेत्र के उद्योग-धंधों को को अंग्रेजों ने खत्म कर दिया और यहां की संपदा लूट ली। आजादी के बाद विपन्न हो चुके इन राज्यों को अपने पैरों पर खड़े होने का कोई मजबूत तरीका नहीं अपनाया गया। उन्हें न तो नए औद्योगीकरण का फायदा मिला और न ही कोई वैकल्पिक अर्थव्यवस्था बनाने की कोशिश की गई।
विश्व बैंक ने इन राज्यों के पिछड़ेपन को दूर करने का अब एक नायाब फार्मूला दे दिया है और नेताओं को इसे अपनाने में मजा आ रहा है। यह फार्मूला है इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास का। एक्सपेे्रस वे और हाईवे बनाओ, स्मार्ट सिटी बनाओ। हर राजनीतिक पार्टी के नेता को इसमें दिलचस्पी है। उत्तर प्रदेश में मायावती, अखिलेश और योगी आदित्यनाथ में इसे लेकर कोई विवाद नहीं है कि एक्सप्रेस वे को जल्द पूरा किया जाए। जाहिर है ठेकों से मिलने वाला कमीशन नेता और पार्टी को बराबरी से मालामाल करता है। जनता भी इन चमचमाती सड़कों को देख कर गदगद हो जाती है।
बिहार में भी नीतीश कुमार ने इसी फार्मूले को अपनाया। चैड़ी सड़कें बनाई और लोगों को खुश कर दिया। वह तीसरी बार मुख्यमंत्री बन गए। लेकिन इन लोगों का आजीविका नहीं मिली।
बिहार और उत्तर प्रदेश के मजदूरों के श्रम से दूसरे राज्यों की सड़कें बनीं, अट्टालिकाएं बनीं और कारखाने चले। आज भी वे दूध पहुंचाने और बाकी छोटे-छोटे काम के जरिए वहां के संपन्न और मध्य वर्ग की सेवा कर रहे हैं। लेकिन उन्हें बदले में तिरस्कार मिलता है। नीतीश कुमार ने अब उन दावों को दोहराना छोड़ दिया है कि उनकी सरकार बाहर जाकर काम करने वालों के अधिकार की रक्षा करेगी। लेकिन इसके लिए बना विभाग कहीं नजर नहीं आता। रोजगार देकर लोगों को बाहर जाने से रोकने को लेकर उनसे कोई उम्मीद करना तो बेकार ही है।

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