बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में मरने वालों बच्चों की संख्या सौ पार कर गई है। लेकिन मीडिया में यह खबर अभी भी क्रिकेट के वर्ल्ड कप और डाक्टरों की हड़ताल की खबरों से छोटी है। मीडिया अपने को जनहितों का रखवाला साबित करने के लिए अपना कुछ समय इस  खबर को दे रहा है और लेकिन थोड़ी गहरी नजर डालने पर पता चलता है कि वह जितना बता रहा है, उससे ज्यादा छिपा रहा है। उसका निशाना बिहार सरकार है। जाहिर है राज्य के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय भी लपेटे में आ गए हैं। लेकिन असली निशाने पर नीतीश कुमार हैं। मीडिया के रवैऐ को समझना हो तो स्वास्थ्य मंत्री डा हर्षवर्धन के मुजफ्फरपुर दौरे का कवरेज देख लीजिए। हर्षवर्धन निशाने पर नहीं हैं। इसके उलट, उनकी सराहना हो रही है। एक चैनल, जो निष्पक्ष दिखता रहा है, के रिपोर्टर ने तो उनके दौरे की गंभीरता साबित करने के लिए यहां तक कह डाला कि वह खानपूरी करने  नहीं आए थे, बल्कि उन्होंने घंटों बिता कर पूरी स्थिति का जायजा लिया है। रिपोर्टर की नज़र में,  यह सामान्य घटना नहीं है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने अस्पतालों में बेहतर सुविधाओं की व्यवस्था की घोषणा कर डाली-ज्यादा आईसीयू और ज्यादा उपकरण। सवाल उठता है कि क्या जापानी इसेंफलाइटिस की यह महामारी पहली बार फैली है और केंद्र सरकार अनजान थी? क्या इसे रोकने का कोई उपाय नहीं था? अगर इसके रोकने के उपाय थे तो ये क्यों नहीं किए गए?
जापानी इंसेफलाइटिस की महामारी पर आ रही खबरों पर गौर करिए तो पता चल जाएगा कि भारतीय मीडिया कितना धारहीन हो चुका है। इस बीमारी पर आ रही खबरों  में यह बताया जा रहा है कि यह वायरस किस तरह बीमार करता है और इसका कोई इलाज नहीं है। मुजफ्फरपुर को लेकर एक और बहस की जा रही है कि लीची खाने से इसका संबंध है। हां, मीडिया की नजर अस्पताल में बेहतर सुविधाओं के अभाव पर जरूर है। सवाल जायज है, लेकिन निशाने पर सिर्फ राज्य सरकार है।  मीडिया  अपने इस कवरेज से वास्तव में इन मौतों के असली गुनहगार केंद्र सरकार को अपराध-मुक्त करता है और उस स्वास्थ्य-व्यवस्था को भी जो डाक्टर, निजी अस्पतालों और दवा कंपनियों के जाल में फंस गई है।
मीडिया को हर बात में इतिहास की याद आ जाती है, लेकिन इस महामारी में उसे कोई इतिहास नहीं दिखाई दे रहा है। शिव सेना नेता उद्भव ठाकरे अपने होनहार बेटे आदित्य ठाकरे के साथ अयोध्या पहुंच गए तो उसे राम जन्मभूमि का इतिहास ही नहीं, भूगोल और दर्शन याद आने लगा। लेकिन बच्चों की मौत के बारे में उसकी याददाश्त इतनी कमजोर हो जाती है कि उसे गोरखपुर में हुई बच्चों की मौत की याद तो नहीं ही आती, जापानी इंसफेलाटिस की बीमारी पर जापान, मलेशिया, सिंगापुर और कोरिया जैसे देशों ने किस तरह काबू किया, इसका भी पता नहीं चलता। बीमारी को उन्नीसंवीं सदी में सबसे पहले जापान में देखा गया था। इस बीमारी का वायरस भी 1930 के दशक में पहचान लिया गया था और इस महामारी के फैलने तथा रोकथाम के बारे में भारत के वैज्ञानिकों ने भी काफी शोध किए हैं। भारतीय वैज्ञानिकों ने इसे रोकने के लिए 2012 में जेनवैक नामक जो टीका निकाला है, वह काफी असरदार है और उसके उपयोग का कार्यक्रम 2013 में यूपीए के स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने शुरू किया था। चीन में बन रहे टीके का इस्तेमाल 2006 से चल रहा है, लेकिन उसके परिणाम उतने अच्छे नहीं हैं।
लोगों को जानना जरूरी है कि टीकाकरण के राष्ट्रीय कार्यक्रम, यूंनिवर्सल इम्म्युनाइजेशन प्रोग्राम में जापानी इसेंफलाटिस के प्रतिरोध का टीका भी शामिल है और इसमें देश के वे सारे जिले शामिल हैं जहां यह बीमारी पाई जाती है। यह कार्यक्रम सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में चलता है। मीडिया की किसी रिपोर्ट में इस कार्यक्रम का जिक्र नहीं है। यह सवाल कोई नहीं कर रहा है कि इस कार्यक्रम का क्रियान्वयन बिहार ,खासकर मुजफ्फरपुर में किस तरह हुआ है ? यह सवाल बिहार सरकार से लेकर केंद्र सरकार की नौकरशाही और राजनीतिक नेतृत्व के निकम्मेपन को सामने ला देगा।
यह भी जानना चाहिए कि टीकाकरण का कार्यक्रम देश के विभिन्न राज्यों में कैसा चल रहा है। टीकाकरण के कार्यक्रम बीमार कहे जाने वाले बिहार, उत्तर प्रदेश और ओडिसा जैसे राज्यों में तो बुरी हालत में हैं ही, गुजरात भी इसे खराब तरह से  चलाने वाले राज्यों में शामिल है। वहां टीकाकरण की सुविधा के अभाव वाले स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बिहार से दोगुनी है। बच्चों के टीकाकरण का प्रतिशत भ्ी पचास प्रतिशत से कम है। गनीमत है कि वहां जापानी इंसेफलाटिस का कहर नहीं है।
भारत में विकसित टीके के बारे में भी जान ले। नेशनल इंस्टीच्यूट आफ वायरोलौजी और प्राइवेट कंपनी भारत बायोटेक के संयुक्त शोध से विकसित जेनवैक का उत्पादन भारत बायोटेक करता है। यह माना गया था कि यह चीन से आयात होने वाले टीके के मुकाबले काफी सस्ता होगा । सरकार इसे सस्ते में खरीदती भी है, लेकिन बाजार में इासकी कीमत पांच सौ से नौ सौ रूपए  के बीच है और गरीब लोग इसे सिर्फ सरकारी मदद से ही उपयोग में ला सकते हैं।
अब इस बीमारी के सामाजिक पहलुओं की ओर आएं। इसमें ज्यादातर गरीब परिवारों के हैं और कुपोषण के शिकार हैं। उनके रहने-सहने की स्थिति भी ऐसी है कि इस बीमारी को फैलाने वाले मच्छरों से बचाव का कोई साधन उनके पास नहीं है। मुजफ्फरपुर में इसे भयावह बनाने में लीची भी अपना योगदान करता है। शोधकर्ताओं ने इस फल की भूमिका भी खोज ली है। उनके मुताबिक लीची में एक प्रकार का विष होता है जो शरीर में ग्लूकोज की मात्रा कम कर देता है। कम पकी लीची में इसकी मात्रा दुगुनी होती है। दिमाग को लगातार ग्लूकोज सप्लाई की जरूरत होती है। बच्चे दिन में ज्यादा लीची खाने के बाद रात का खाना छोड़ देते हैं और यह जानलेवा बन जाता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक रात का खाना नहीं खाने पर संचित ग्लूकोज की मात्रा कम हो जाती है और दिमाग को ग्लूकोज की सप्लाई नहीं मिलती है।   कुपोषण से ग्रस्त बच्चों में संचित ग्लूकोज की मात्रा नहीं के बराबर होती है और बच्चे  के लिए जानलेवा स्थिति हो जाती है। यह जानकारी डाक्टरों को है, सरकार को है। अगर किसी को नहीं है तो वे हैं मरीज के अशिक्षित परिवार वाले।
इस शोध का सरकार ने क्या उपयोग किया? क्या लोगों में इसकी जागरूकता फैलाई गई ? क्या कुपोषण रोकने के कार्यक्रमों के इन क्षेत्रो में क्रियान्वयन की समीक्षा नहीं होनी चाहिए थी? इतने महत्वपूर्ण शोध को मीडिया प्रचारित करने के बदले बीमारी को लीची से जोड़ कर एक आसुरी आनंद ही ले रहा है।
बच्चों को काल के मुंह में भेजे जाने का कलंक सिर्फ सरकार पर नहीं लगेगा,  बल्कि वर्ल्ड कप में मशगूल उस वर्ग को भी लगेगा जो पाकिस्तान को हारा हुआ देख कर खुश होने को अपने राष्ट्रवादी होने का सबूत मानता है। उसे मुजफ्फरपुर के बच्चों की मौत पर भी उत्तेजित होना चाहिए और सरकार से सवाल करना चाहिए। वे मासूम भी इसी देश के हैं।  विपक्ष और मीडिया भी इसमें बराबर का भागीदार  क्योंकि वह भी अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकामयाब है।

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