सरकार में अपनी वापसी के बाद विपक्ष को मिटा देने की भाजपा की जिद ने लगभग एक बीमारी की शक्ल अख्तियार कर ली है। पार्टी केंद्र से लेकर पंचायत तक के स्तर पर विपक्ष की कमर तोड़ने में जुटी हुई है। हालत की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पार्टी अब तक अलग-अलग राज्यों में 50 विधायकों और पांच सांसदों को अपनी पार्टी में शामिल कर चुकी हैं। विपक्ष के लोगों को पार्टी में शामिल करने का यह सिलसला नगर निकायों और पंचायतों तक इसी तेजी से चालू है। सच्चाई यह है कि पार्टी का नेतृत्व या कार्यकर्ता अब यह मान कर चल रहा है कि विपक्ष की कोई जरूरत नहीं है।
भारत में दल-बदल का रोग कोई नया नहीं है। यह भारतीय गणतंत्र की स्थापना समय से ही अपने लक्षण दिखाने लगा था। लेकिन पहले और अब की हालत में फर्क  है। शुरू में पार्टी के विचारों या इसके नेतृत्व से मतभेद ही पार्टी छोड़ने का मुख्य कारण था। बाद में, सत्ता हासिल करने का जरिया बना। अभी यह विपक्ष को नेस्तानाबूद करने का औजार बन गया है। कर्नाटक की घटना इसका उदाहरण है। वहां भाजपा ने सुनियोजित तरीके से सरकार गिराई है और यह काम सिर्फ इसलिए हुआ है कि पार्टी का केंद्रीय और स्थानीय नेतृत्व राज्य में विप़क्षी पार्टी की सरकार  की मौजूदगी सहने के लिए तैयार नहीं है।
भले ही प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह इस बात को बार-बार दोहराएं कि उनकी पार्टी को अभूतपूर्व  जनादेश मिला है, सच्चाई यह है कि कांग्रेस इससे बड़ा जनादेश पाती रही है। आजादी के बाद जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में पार्टी को जिस तरह का बहुमत और जनता का समर्थन हासिल था, वैसा बहुमत और समर्थन भाजपा या अन्य कोई पार्टी कभी हासिल नहीं कर पाई है। लेकिन संख्या-बल  को लेकर विपक्ष को कभी  आत्महीनता का बोध नेहरू जी ने नहीं होने दिया। यह कुछ हद तक इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के काल में भी जारी रहा।  आपातकाल को छोड़ दें तो इंदिरा ने भी विप़क्ष की राय को महत्व देने में कमी नहीं की। विदेश नीति से लेकर आर्थिक नीतियों में एकराय बनाने की कोशिश करती रहीं। नेहरू के जमाने में तो भाजपा के पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ जैसे दल की राय का भी महत्व था। खुद कांग्रेस में फिरोज गांधी  जैसे नेता थे जो सरकार की इतनी तीखी आलोचना करते थे कि उन्हें विप़क्षी नेता असली विपक्ष मानते थे।
अगर संसद के चालू सत्र पर गौर करें तो यह साफ दिखाई देता है कि विपक्ष को महत्वहीन करने  की रणनीति भाजपा के एजेंडे का प्रमुख हिस्सा है। मोदी सरकार ने किसी भी महत्वपूर्ण विधेयक पर विपक्ष की राय नहीं मानी और  न ही विधेयकों की बेहतर जांच-परख के लिए इसे प्रवर समिति में जाने दिया। लोकतांत्रिक अधिकारों की दृष्टि से जरूरी सूचना- अधिकार कानून  और अवैध गतिविधि निवारक कानून में संशोधन जैसे विधेयकों पर भी विपक्ष की राय को जरा भी महत्व नहीं दिया गया। सूचना आयुक्तों की नियुक्ति, वेतन और स्थानांतरण को सरकारी हस्तक्षेप से आजाद रखने का प्रावधान इसलिए रखा गया था कि सूचना आयुक्त स्वतंत्र होकर काम करें। संशोधन के बाद उनकी यह स्वायत्तता खत्म हो जाएगी। इसी तरह अवैध गतिविधि निवारण विधेयक यानि यूएपीए कानून पुलिस को इतने असीमित अधिकार देता है कि किसी को आतंकवादी बताने के लिए उसे कानून की जरूरी प्रक्रियायों का पालन करने की जरूरत नहीं है। दोनो ही संशोधन विरोध की  आवाज को उठने से रोकने का काम करते हैं। ये लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज कम करते हैं।
अगर कर्नाटक में चल रहे नाटक को अन्य राजनीतिक घटनाओं से जोड़ कर देखें तो यह साफ हो जाएगा कि भारत में एक विपक्षविहीन लोकतंत्र बनाने की कोशिश चल रही है। भाजपा की ओर से हो रही बाकी पार्टियों को तोड़ने की कोशिश महज दल-बदल की घटना नहीं है। यह लोकतंत्र का स्वरूप बदलने की कोशिशों का हिस्सा है जिसमें एक पार्टी और एक व्यक्ति का शासन हो। इस अभियान की सफलता के लिए विप़क्ष-मुक्त भारत जरूरी है।   एक सशक्त विप़क्ष का मतलब होता है ऐसा लोकतंत्र जिसमें अलग-अलग विचार और कार्यक्रमों को उसी सम्मान से देखा जाए जिस सम्मान से  सरकारी विचार और कार्यक्रम को देखा जाता है। जाहिर है कि अगर  विपक्ष ताकतवर रहा तो भाजपा के अभियान को सफल नहीं होने देगा। विपक्ष सवाल उठाएगा, विरोध करेगा और जरूरी हुआ तो अपनी बात के प़क्ष में लोगां का समर्थन जुटाने के लिए सड़क पर उतरेगा। मोदी सरकार इन सब चीजों  से नफरत करती है या यूं कहिए कि कड़ी  आलोचना से डरती है। मोदी के कांग्रेस-मुक्त भारत की कल्पना वास्तव में एक विपक्ष-मुक्त भारत की ही कल्पना है।
विधायकों की खरीद-फरोख्त और पैसा तथा पद के लिए पार्टी बदलना कोई नई बात नहीं है। विधायकों को होटलों और रिसार्टों में घुमाना भी नया नहीं है। वैसे भाजपा के विधायक इसमें रिकार्ड बना चुके हैं। गुजरात में शंकरसिंह वाघेला और केशुभाई पटेल के बीच के युद्ध में ही हजूरिया-खजूरिया वाला प्रकरण हुआ था। विधायकों को लोभ और लालच या धमकी आदि से से बचाने के लिए किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाना और उन्हें पिकनिक का आनंद देने का तरीका भाजपा के लोगां ने ही ईजाद किया है। विधायकों को मध्यकालीन सिपाहियों में तब्दील करने का यह तरीका लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। मध्यकाल में फौज को इसी आधार पर इकट्ठा किया जाता था कि लूट में उन्हें पर्याप्त हिस्सा मिलेगा। विधायकां की फौज को भी नए मंत्रिमंडल में लूट का हिस्सा देने का वायदा रहता है। अगर देश की जांच एंजेसियां मजबूत होतीं तो यह पता लगाना असंभव नहीं था कि इन खेलों  के पीछे कौन लोग थे और इसका खर्च किन लोगों ने उठाया। अदालत ऐसे मामलों की जांच दे सकती है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का रवैया भी मौजूदा सरकार के पक्ष में फैसला देने का है।
कर्नाटक के बागी विधायकां को अपनी मर्जी से चलने का मौका देकर सुप्रीम कोर्ट ने न केवल दल-बदल को अप्रत्यक्ष रूप  स्वीकृति दी है,बल्कि सदन के भीतर के मामलों में विधान सभा के अध्यक्ष के अंतिम अधिकार को भी अमान्य किया है। यह फैसला विधायिका के अधिकारों को कम करता है। जरूरत इस बात की थी कि सुप्रीम कोर्ट विधायिका को दल-बदल कानून को मजबूत करने का निर्देश सरकार को देता क्यांकि दल-बदल कानून का कोई ज्यादा मतलब नहीं रह गया है। विधायकों  से इस्तीफा दिला कर सदन के सदस्यों की संख्या कम करना और सरकार गिरा देना उन विधान सभाओं में दल-बदल कानून को बेअसर करने का आसान तरीका है जहां बहुमत बड़े मामूली अतर से हो। गोवा जैसे छोटे राज्यों में तो यह काम और आसान है। हम देख ही चुके हैं कि कांग्रेस के 15 में से दस विधायकों को भाजपा में मिला लिया गया। दल-बदल करने वाले विधायक  किस तरह पार्टी छोड़ने के लिए अलग-अलग तर्क ढूंढ लेते हैं। गोवा में कांग्रेस छोड़ने वालों ने सरकार के कामकाज से प्रभावित होकर पार्टी छोड़ी है तो कर्नाटक में पार्टी छोड़ने वाले सरकार के कामकाज से असंतुष्ट होकर बाहर गए हैं। दोनों मामले में विधायकों का भ्रष्टाचार साफ दिखाई दे रहा है, लेकिन वोटरों के फैसले के खिलाफ जाने वाले इन विधायकों को दंडित करने का कोई उपाय नहीं है।
दल-बदल कानून को राजीव गांधी की सरकार  ने लाया था और 1985 में बने इस कानून ने इस बीमारी से बचाने में काफी हद तक सफलता भी पाई थी। लेकिन पार्टियों ने इस कानून को तोड़ने का उपाय कर लिया है। अब तो दल-बदल करने वाले मंत्री भी बन जाते हैं और उनकी अयोग्यता का फैसला विधानसभाध्यक्ष जान-बूझकर लटकाए रखते हैं। दल-बदल कानून ने सदन के अध्यक्ष की गरिमा को भी नुकसान पहुंचाया है। सरकार बचाए रखने में अध्यक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है, इसे ध्यान में रख कर अब संसद और लोकसभा में इस पद पर ऐसे लोगों को बिठाया जाता है जो सरकार का पिट्ठू हो। अब यह पद भी राज्यपालों की तरह का ही हो गया है। सत्ताधारी दल के इशारे पर काम करने वाले ही लोग इन पदों पर बिठाए जाते हैं।
दल-बदल वोटरों का अपमान है। सांसद या विधायक किसी पार्टी के नुमाइंदे के रूप में चुने जाते  हैं और उस पार्टी को छोड़ना जनता के खिलाफ अपराध है। जनता की भूमिका महज वोट डालने वाले की रह जाती है। इन मामलों में जनता की राय ही अहम होनी चाहिए और जन-प्रतिनिधियों के इस तरह के भ्रष्ट आचरण पर लगाम लगाने का अधिकार वोटरों को होना चाहिए। इस्तीफे के बाद तुरंत चुनाव हो और विधान सभा में सदस्यों की पूरी संख्या होने पर ही  अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान होना चाहिए। वैसे भी, यह नैतिक रूप से गलत है कि सरकार बदलने के मामले में उन सीटों के वोटरों की राय नहीं ली जाए जो खाली रह गई हैं। यह सरकार चुनने के उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है।
निरंकुश सत्ता चलाने की यह प्रवृत्ति नई नहीं है। कांग्रेस ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व में इस प्रवृत्ति का परिचय दिया था और इसका नतीजा आपातकाल के रूप में सामने आया। मोदी उससे भी भयानक खेल लोकतंत्र के साथ कर रहे हैं। वह इस खेल के अनुभवी खिलाड़ी हैं। गुजरात के हजूरिया-खजूरिया प्रकरण में उनकी भूमिका को विवादास्पद माना गया था। इसी प्रकरण में वाघेला समर्थक वरिष्ठ नेता और सुरेश मेहता मंत्रिमंडल के सदस्य आत्माराम पटेल की  जमकर पिटाई हुई थी और उनकी धोती खोल दी गई थी। राजनीति का गुजरात माडल अब देश का माडल बनने जा रहा है।
कुछ लोग मानते हैं कि मोदी सरकार राज्यसभा में बहुमत कायम करने के लिए यह कर रही है ताकि उन कारपोरेट को फायदा पहुंचाने वाले कानूनों को पारित कर सकें। सच्चाई यह है कि यह इस अभियान का एक छोटा सा हिस्सा भर है। विपक्षी पार्टियों पर नजर डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि कानून पास कराने में भाजपा को कोई कठिनाई नहीं है। वह कभी बसपा, कभी समाजवादी पार्टी का साथ ले सकती है। बीजू जनता दल और टीआरएस जैसी पार्टियां उसे उबारने के लिए तैयार ही बैठी हैं। भाजपा का असली मकसद एक पूंजीवादी हिंदू राष्ट्र बनाने का है। यह एक ऐसा राष्ट्र होगा जिसमें धर्म और जाति तथा आर्थिक असमानताओं को वैध माना जाएगा।  लेकिन भगत सिंह, गांधी, आंबेडकर, लोहिया और जयप्रकाश के विचारों की मौजूदगी में यह संभव नहीं है। देश का विपक्ष चाहे कितना भी लंगड़ा हो, वह इन्हीं विचारों से संचालित है। सच मानिए तो भाजपा ही देश की एकमात्र पार्टी है जो स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही समानता और सहअस्तित्व के विचारों के खिलाफ है। वह मुसलमानों के साथ भेदभाव का बर्ताव करना चाहती है और िंहंदू श्रेष्ठता के नाम पर जाति आधारित शोषण जारी रखना चाहती है। भाजपा के इन प्रतिगामी विचारों का विरोध होना स्वाभाविक है। भाजपा इन सारे मुद्दों को सतह पर आने देने से रोकना चाहती है। इसलिए मोदी कांग्रेस-मुक्त भारत की कल्पना करते हैं और असली मायनों में देश को विपक्ष-मुक्त बनाना चाहते हैं। वह विपक्ष को विकलांग कर देना चाहते हैं। इस मुहिम का नेतृत्व कर रहे मोदी और अमित शाह निरंकुश शासन चाहते हैं और आरएसएस उन्हें साथ दे रहा है क्योंकि उसे लग रहा है कि उसके हिंदू राष्ट्र का सपना ये लोग ही पूरा कर सकते हैं ।
देश के संविधान ने एक व्यापक विपक्ष का माडल हमारे सामने रखा है। इसमें सिर्फ विपक्षी पार्टियां नहीं हैं। इसमें निष्पक्ष नौकरशाही, न्यायपालिका तथा चुनाव आयोग से लेकर राष्ट्रपति तथा संसद और विधान मंडल के अध्यक्ष तथा सभापति शामिल हैं। इनका काम सरकार के कामों में स्वतंत्र चेतना के साथ हिस्सा लेना और गलत काम का विरोध करना। आज इन सभी संस्थाओं को भाजपा ने अपने कब्जे में कर लिया है। सूचना का अधिकार कानून में संशोधन ने सरकार की मंशा को सबके सामने ला दिया है। मिडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है। इस स्तंभ  का भी काम है कि सरकार के कामों की समीक्षा आजादी के साथ करे। मीडिया की हालत तो लोग देख ही रहे हैं।
क्या सरकार अपनी मुहिम में कामयाब हो पाएगी?
लेकिन क्या सरकार की इन कोशिशों से विपक्ष भारतीय राजनीतिक परिदृश्य से गायब हो जाएगा? क्या चारो ओर सरकार की जय के नारे ही लगेंगे? नहीं, यह सिर्फ वे लोग ही सोच सकते हैं जिन्हें इतिहास की समझ नहीं है। विरोध की आवाज तो उस समय भी उठती थी जब लोकतंत्र नहीं था। लोकतंत्र के इस युग में तो विपक्ष की अनुपस्थिति सुनिश्चित करने का प्रयास करना बचकाना ही माना जाएगा। देश के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो साफ हो जाएगा कि विपक्ष एक नई गोलबंदी के साथ उठ खड़े होने की कोशिश कर रहा है। यह नए चेहरे और नए स्वर के साथ उभर रहा है। संसद का बजट सत्र तो कम से काम यही बता रहा है।
संसद में तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा ने अपने पहले भाषण से जो सनसनी फैलाई वह हाल के संसदीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। उन्होंने विरोध की उस भावना को स्वर देने की कोशिश की जो घुटी-घुटी सी थी। उन्होंने मोदी शासन में दिखाई देने वाले फासीवादी लक्षणों को लोगां के  सामने लाने की जबर्दस्त कोशिश की। राष्ट्रवाद के नाम पर विरोध की आवाज दबाने तथा सेना के पराक्रम को निजी राजनीतिक फायदें  के लिए  उपयोग करने पर तीखा प्रहार किया। एक पार्टी के रूप में तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूण विपक्षी पार्टी के रूप में उभरने में नई-नई आईं महुआ मोइत्रा और पुराने सौगत राय महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
डीएमके भी अपनी बेहतर संख्या बल से मिले आत्मविश्वास का खुल कर उपयोग कर रहा है। पार्टी को इस बार 22 सीटें मिली हैं। पार्टी की राय उन मामलों में भी साफ है जिन पर कांग्रेस जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टी की राय भी  साफ नहीं है। पार्टी नेता कनिमोई ने सरकारी उद्योगों और रेलवे के निजीकरण पर तीखी राय व्यक्त की। पार्टी ने सलेम स्टील प्लांट और रेलवे के निजीकरण के खिलाफ आंदोलन का फैसला भी किया है।
विपक्ष की  इस नई आवाज को किन पार्टियों का साथ मिलेगा,  यह भी साफ होता जा रहा है। सूचना के अधिकार और यूएपीए बिल पर टीआरएस, वाईएसआर कांग्रेस और बीजेडी के रवैए से साफ हो गया है कि वे सरकार के खिलाफ नहीं जाएंगे। उत्तर भारत में नए समीकरण चौंकाने वाले हो सकते हैं। बसपा और समाजवादी पार्टी ढुलमुल हैं और नीतीश कुमार का जेडीयू विपक्षी भूमिका में आ सकता है। लेकिन असली चुनौती गैर-हिंदी पट्टी से ही आती दिखाई दे रही है। इसमें संघीय ढांचे और भाषा आदि के मसलों पर सरकार  के घिरने की पूरी संभावना है।
सबसे अहम बात है कि सरकार समझ रही है कि जनता को सूचना से वंचित करने और विरोध में आवाज उठाने वालां के खिलाफ पुलिस का इस्तेमाल कर वह असानी से राज करती रहेगी। लेकिन उसे इतिहास के पन्ने उलटना चाहिए। जनता का प़क्ष ही असली विपक्ष है। यह पक्ष कभी भी उभर सकता है।

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