देश तोड़क या राष्ट्र विभाजक कौन होते हैं? यह राष्ट्र का विभाजन कैसे कराया जाता है? एक बार तो भारत के टुकड़े हो चुके हैं और उसके पीछे कुछ सोच, विचार, प्रक्रिया व परिस्थितियॉं आदि भी होती है। यदि हम अतीत के इतिहास को ठीक से निष्पक्ष ढंग से देखें और हालात का विश्लेषण करें तो आसानी से हम जान सकते हैं कि भारत कैसे टूटा और उसके बाद हम चौंकन्ने होकर उन सब बातों को पीछे धकेल सकते हैं, जिनसे राष्ट्र के टूटने विभाजित होने का खतरा बना रहता है

देश टूटा 1947 में जब मोहम्मद अली जिन्ना ने कांग्रेस से अलग होकर सिर्फ मुसलमानों की पार्टी बना ली और उनके लिये ही अलग देश की माँग रख दी। उसी समय हिंदू महासभा, रामराज्य परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आदि जैसे भी संगठन थे जो मुसलमानों के अलग देश का परोक्ष और दबी जुबान से समर्थन करते थे। इसे कहा जाता था “दो राष्ट्र का सिद्धांत“ यानि हिंदू के लिये अलग देश और मुसलमानों के लिये अलग देश। इसी को यदि कुछ लोग संगठित ढंग से आगे बढ़ाते तो सिखों का अलग देश व ईसाइयों के लिये अलग देश की माँग की जा सकती थी पर हो न सकी।

जिन्ना ने शुरु में कांग्रेस की आजादी की माँग का सक्रिय समर्थन किया और अंग्रेज़ों के खिलाफ मुहिम भी छेड़ी जो इतिहास में दर्ज है। कट्टर संगठनों ने तो हिंदू राष्ट्र व हिंदू संगठन के अपने एकमात्र उद्देश्य पर न सिर्फ काम को जारी रखा बल्कि स्पष्ट रूप से यह ऐलान किया कि भारत की आजादी से हिंदुओं को कुछ नहीं मिलने वाला है बल्कि कई बार स्पष्ट रूप से अंग्रेज़ों का साथ दिया इन हिंदुत्ववादी शक्तियों ने आजादी के तुरंत बाद तिरंगे को अपना राष्ट्रीय ध्वज और संविधान को मानने से इंकार कर दिया जिसका वर्णन “विचार नवनीत“ नामक पुस्तक में संघ के गुरु गोलवलकर ने लिखा है।

राष्ट्र हमेशा टूटता है राष्ट्र में रहने वाले विभिन्न जाति या धर्मावलंबियों के बीच गहरे मतभेद होने से या करने-कराने से। जब समाज में मतैक्य न होगा तो राष्ट्र के टूटने की शुरुआत हो जायेगी। और यदि जीवन धर्म, पूजा-पद्धतियों, संस्कृति, भाषा आदि पर विभिन्न समाजों में सच्चा सामंजस्य समंझौता टिकाऊ न रह पायेगा तब भी राष्ट्र के टूटने की शुरुआत हो जायेगी।
यह सामंजस्य कैसे दरकना शुरु होता है? जब हम एक दूसरे के खान-पान, जीवन शैली, भाषा, भूषा, तीज त्यौहार व धर्म को आदर सम्मान की दृष्टि से देखना बंद कर देंगें और हर बात पर विवाद रचते जायेंगें तो समाजिक सौहार्द व समन्वय की हानि शुरु होकर राष्ट्र की एकता दरकना शुरु होती जायेगी।

पिछली कम से कम सात आठ सदियों से कमोबेश भारत में धार्मिक सद्भाव व एकता की नई मिली जुली अवधारणा जो एक दूसरे के प्रति सम्मान व प्रेम पर आधारित बनी रही है जिसके कारण राष्ट्र का भौगोलिक सामाजिक अहित नहीं हुआ, सिवाय अंग्रेज़ों के आगमन तक। अंग्रेज़ों के विभेदकारी विभाजक राजशैली के अन्याय से हिंदू-मुसलमान दोनों ने मिलकर लडाई लड़ी और दोनों की एकता से ही हमें आजादी मिली। इस लड़ाई में कट्टर हिंदू व कट्टर मुसलमान दोनों ही शामिल न हुये लेकिन हर धर्म का सामान्य जन भागीदार रहा। आजादी मिलने के समय ही ये दोनों धार्मिक कट्टरपंथी पुन: अपने विभाजक व्यवहार से भारत को तोड़ने में जुट गये नतीजतन बडे पैमाने पर हिंसा मारकाट बेदख़ली आगज़नी शुरु की गई जिसके दबाब में विखंडित आजादी को स्वीकार करना पडा।

इस विखंडन विभाजन के शीर्ष पर जिन्ना जैसे मुसलमान नेता उनके संगठन तथा कट्टर हिंदुओं के संगठन और उनके नेता शामिल रहे जिसकी परिणति गांधी जी की हत्या में हुई। आज फिर खान-पान, भूषा, पूजापद्धति, तीज त्यौहार की संस्कृति, भाषा आदि के फ़ालतू सवाल उठाकर राष्ट्र को तोड़ने का काम शुरु हो चुका है। यही असली टुकड़े टुकड़े गैंग है वे नहीं जिन पर कोई अप्रमाणित वीडियो चिपकाया गया है लेकिन बगैर सुबूत के!

ठीक से सोचिये और पहचानिये कि वास्तविक रूप से भारत को टुकड़े टुकड़े करने का काम कौन कर रहा है?

 

 

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