यह सच है कि ब्रिटिश हुकूमत ने अंतत: विनायक दामोदर सावरकर के माफीनामे को स्वीकार कर उन्हें न सिर्फ जेल से रिहा किया बल्कि स्वाधीनता संग्राम से अलग रहने के पुरस्कार स्वरुप 60 रुपए मासिक पेंशन भी दी। लेकिन सावरकर के जीवन का एक दूसरा पहलू भी है, जो बताता है कि वे अपनी जवानी के दिनों में एक प्रखर बुद्धिवादी, लेखक, साहित्यकार थे। अपनी नजरबंदी के दौरान उन्होंने हिन्दू समाज में व्याप्त धार्मिक अंधविश्वासों पर निर्मम प्रहार करने वाले लेखों के जरिए धूम मच दी थी। उन्होंने जातिप्रथा, यज्ञ, हवन, व्रत-अनुष्ठानों, गाय-पूजा आदि की जमकर खिल्ली उडाई। उन लेखों को यदि नरेंद्र मोदी, आदित्यनाथ, देवेंद्र फडनवीस जैसे आज के आज के हिंदू ह्रदय सम्राट पढ ले तो वे सावरकर को भारत रत्न देने की बात भूलकर मरणोपरांत हिंदूद्रोही करार दे देंगे और गिरिराज सिंह, प्रज्ञा ठाकुर और साक्षी महाराज जैसे लोग मरणोपरांत पाकिस्तान भेजने की मांग करने लगेंगे।