असली सवालों से कब तक बचाएगी राष्ट्रवाद की ढाल?

सरकार सब कुछ जानकर भी अनजान बन रही है। वो हर वक्त राष्ट्रवाद, कश्मीर और पाकिस्तान का राग अलाप कर देश को मूल मुद्दों से भटका रही है। लेकिन यह कब तक चलेगा? वैसे यह कहना गलत है कि मुद्दों की बात नहीं हो रही है। बात हो रही है और सब कर रहे हैं, क्योंकि चारों ओर सभी तो आर्थिक मंदी की बात कर रहे हैं। लेकिन मई 2019 विजय के बाद पुन: शुरू हुए मोदी-मोदी के स्वर ने इसे ढंक रखा है। लोकसभा की जीत को चार माह होने को आ रहे हैं। हनीमून पीरियड खत्म होने को है। इसके बाद जनता के दबे प्रश्न सामने आना शुरू हो जाएंगे।

कौन नहीं है कश्मीर का गुनहगार?

कश्मीर को सुर्ख और सांप्रदायिक नजरों से देखने वाले अक्सर प्रश्न करते हैं कि कश्मीर का मुख्यमंत्री सिर्फ मुसलमान ही क्यों बनता है? ऐसे लोगों से क्या यह प्रतिप्रश्न नहीं किया जाना चाहिए कि पंजाब के बंटवारे के बाद वहां का मुख्यमंत्री कब कोई गैर सिक्ख बन पाया? क्या महाराष्ट्र में कभी कोई गैर मराठीभाषी या दशकों से वहां रह रहा कोई उत्तर भारतीय या गुजराती मुख्यमंत्री बन सका है या बन सकता है?

कांग्रेस अभी भी अपने पुराने वैभव की यादों में ही कैद है!

जनता जानती थी कि मोदी अपनी दुकान पर कोई शुद्ध दूध नहीं बेच रहे हैं। वह यह भी जानती थी कि कांग्रेस और बाकी प्रतिपक्षी दल भी कोई दूध के धुले नही है। मिलावट दोनों में ही है। जो दल सबल प्रतिपक्ष नही बन सकता है, जो गांधी की बात करता है लेकिन गांधी के सत्याग्रह की अवधारणा से दूर रहता है, वह देश को एक जिम्मेदार सरकार कैसे दे सकता है। जिसकी उम्र 125 वर्ष है, जो देश की सबसे बड़ी पार्टी है, वह अहंकार और अति आत्मविश्वास का शिकार होकर अन्य दलों को एकजूट करने की अपनी जिम्मेदारी से भागती रही। अपने पुराने वैभव की याद में खोकर वह यह भूल गई कि उसकी भव्य इमारत खंडहर बन चुकी है। उसके पास अनुभवी नेताओं पूर्व मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों का एक बड़ा समूह है, लेकिन उसकी हठधर्मिता और भोग विलास ने उसे जनता से दूर कर दिया है। जनता ने देश-काल-परिस्थिति के मद्देनजर अपना फैसला सुना दिया।

घमंड और पाखंड के बीच लोकतंत्र का महापर्व

लोकतंत्र का महापर्व यानी लोकसभा चुनाव 2019 जारी है। पूरा देश पाखंड और घमंड से भरपूर तमाशे रोज देख रहा है। पाखंड के वाहक केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा और उसके सहयोगी दल हैं और घमंड के वाहक कांग्रेस व अन्य प्रतिपक्षी दल। भाजपा को लग रहा है कि उसे 325 से ज्यादा सीटें मिलेंगी। कांग्रेस को लग रहा है मोदी सौ के अंदर हैं और वो अपने सहयोगियों के साथ पार है। सच यही है कि जो डुबोते हैं, वे खुद पार नहीं हो पाते हैं। हो भी जाएं तो डूबे ही कहलाते हैं। इस चुनाव में कोई पार नहीं हो सकेगा। भाजपा असफल है, वो पाखंड है। कांग्रेस प्रतिपक्षीय एकता से वंचित है, वो घमंड है। सबके चेहरे बेनूर हैं। जनता के चेहरे पर जो नूर लाएगा, उसी के चेहरे पर असल नूर आएगा। अभी तो बिखरी, बगैर बहुमत की संसद ही सामने आएगी।

इस युद्धोन्माद से किसी को मिली खुशी, किसी को मिला गम

युद्धोन्माद के इस दौर में ‘देशभक्ति’ का जैसा प्रदर्शन भाजपा कर रही है, वैसा कांग्रेस नहीं कर पा रही है। उसकी स्थिति वैसी ही है जैसे किसी की लॉटरी तो खुल चुकी है लेकिन लॉटरी का टिकट गुम हो गया है या फट गया है।

युद्धोन्माद के कोलाहल में गुम होते असल सवाल

जवानों की सीमा पर युद्ध में शहादत हुई होती तो देश को फख होता, लेकिन कायरतापूर्वक धोखे से जवानों को मार दिया गया। केन्द्र सरकार और खुफिया तंत्र पूरी तरह से असफल रहे हैं। जब परिवार में मौत होने पर अस्पताल और डॉक्टर से प्रश्न पूछे जाते हैं, तो यह शहादत तो देश के लिए हुई है। ऐसे में सरकार पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। वे हो भी रहे हैं, लेकिन उत्तर देने के बजाय उलटे उन्हें हमेशा की तरह प्रश्नों-प्रतिप्रश्नों में बदला जा रहा है। इसमें चुनाव और उसमें जीतने-हारने के दुस्वप्न देखने वालों की एक बड़ी तादाद शामिल है।

अब बारी है प्रियंका को स्वयंसिद्ध करने की

राहुल-प्रियंका ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में कोई महत्वाकांक्षा नहीं दिखाई। आज प्रियंका गांधी 47 वर्ष की हो रही हैं। उनका आगमन भारतीय राजनीति में उनकी चिर प्रतिक्षित इंतजार के बाद आगमन की घटना है। उनसे चमत्कार की उम्मीद की जा रही है। पक्ष-विपक्ष के अपने-अपने तर्क है, जिनका जवाब उनकी दादी इंदिरा गांधी ने जिस तरह अपनी खूबसुरती से नहीं वरन स्वयं को सिद्ध करके दिया था। उसी तर्ज पर प्रियंका को स्वयं को सिद्ध करना होगा।

कांग्रेस को मीसाबंदियों से इतना परहेज क्यों?

सन् 1975 के आपातकाल को 43 वर्ष हो गए हैं। पेंशन लेने वाला कोई भी 65 वर्ष से कम का नहीं है। अधिकांश तो दुनिया से रुखसत हो चुके हैं। आजादी की लड़ाई के जेलयात्रियों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कहते हैं। इन मीसाबंदियों से इतना परहेज क्यों? आपातकाल एक गलती थी, यह तो कांग्रेस भी कबूल कर चुकी है। जिन लोगों को बगैर किसी गुनाह के 19 माह जेल में डाला गया, आंदोलन और जेल यात्राओं से उन्हें और उनके घर परिवार को हुई नुकसानी या तबाही के बदले मिली सम्मान निधी है।

सवर्णों को दस फीसद आरक्षण उर्फ फेअर एण्ड लवली!

आर्थिक रूप से पिछडे सवर्णों को सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में 1० फीसद आरक्षण देने का नरेंद्र मोदी सरकार का फैसला वैसा ही जैसे किसी सांवले या अश्वेत व्यक्ति को फेयर एंड लवली क्रीम थमा दी जाए, इस गारंटी के साथ कि इसके लगाने से उसकी चेहरे का रंग गोरा हो जाएगा। यह क्रीम बनाने वाली कंपनी कई वर्षों से करोडों रुपये के विज्ञापन देकर काले चेहरे को गोरा बनाने का झुंझूना बजाती आ रही है लेकिन आज तक किसी के चेहरे का रंग नहीं बदला है। आर्थिक आधार पर 10 फीसदी आरक्षण का फैसला भी ऐसा ही है, जिससे किसी को कुछ हासिल नहीं होने वाला है।

मोदी का बेहतर विकल्प ऐसे तो मिलने से रहा!

मध्य प्रदेश के नए नवेले मुख्यमंत्री कमलनाथ पूछते हैं कि मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी की हैसियत क्या है! उन्होंने यह टिप्पणी एक पत्रकार के प्रश्न पर प्रतिप्रश्न के रूप में की है। कमलनाथ से पूछा गया था कि आपने अपनी मंत्रिपरिषद में सपा और बसपा को जगह नहीं दी, जिससे दोनों पार्टियां आपसे नाराज है, आपकी क्या प्रतिक्रिया है। कमलनाथ ने जो अहंकार भरी प्रतिक्रिया जाहिर की है, वह उनकी सरकार के स्वास्थ्य और दीर्घायु को लेकर तो आशंका पैदा करती ही है, साथ ही लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और राहुल गांधी की संभावनाओं को भी कमजोर करती है।