स्मरण कामरेड पेंटर हरिपाल त्यागी का !

हरिपाल त्यागी एक प्रतिबद्ध रचनाकार थे। आज जहां लाखों में पेंटिंग्स बिक रही हैं और बेची जा रही हैं , वहीं भाऊ समर्थ और हरिपाल त्यागी ने देश की सभी लघु पत्रिकाओं के कलापक्ष को मजबूत किया और पाठकों में आधुनिक कला संस्कार भी विकसित किए । उन लघु-पत्रिकाओं को आकर्षक बनाया। भयानक बीमारी से पीड़ित होने के बाद भी उन्होंने तूलिका , और रंग का साथ नहीं छोड़ा। त्यागी जी नागार्जुन, त्रिलोचन के अनन्य मित्र थे। उन्होंने इन दोनों महाकवियों के अनगिनत चित्र बनाए हैं। कविता , और साहित्य की अन्य विधाओं में उन्होंने विपुल व मूल्यवान लेखन किया है। देश – विदेश के श्रेष्ठ चित्रकारों पर उन्होंने बेहतरीन विश्लेषणात्मक लेख लिखें हैं।

रमणिका गुप्ता: संघर्ष की बहुआयामी कहानी का अंत !

रमणिका जी ने कभी दोहरा जीवन नहीं जिया। उनका  जीवन समाज को समर्पित था। उनकी निजता उनके सामाजिक व सांस्कृतिक कार्यों में विलीन हो गई थी। पिछले कई वर्षों से वे एकनिष्ठ हो कर  आदिवासी समाज के लिए काम कर रही थीं। उन्होंने देश के हर आदिवासी समाज के साहित्य को हिन्दी, अंग्रेजी और उनकी बोली-भाषा में लाने का महान कार्य किया। पूर्वोत्तर भारत की जन-जातियों के साहित्य को हमने पहली बार मुकम्मल तरीके से उनके यहां ही पढ़ा।

याद अमर शहीद पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थ की

वे साम्प्रदायिकता के खिलाफ सतत संघर्षरत रहे। भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव की शहादत के बाद जनभवनाओं को मोड़ने के लिए अंग्रेजो ने साम्प्रदायिक ताक़तो से मिलकर कानपुर को हिन्दू-मुस्लिम दंगे की आग में झोंक दिया। इसी दंगे में निसहायों को बचाते हुए 25 मार्च 1931 को वे शहीद हो गये। दंगों की भेंट चढ़ने वाले वह संभवतः पहले पत्रकार थे।

खतरनाक है भारतीय मध्यवर्ग का बदलता चरित्र

दुर्भाग्य से बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में जिस तरह से मध्यमवर्ग में लोलुपता, प्रदर्शन, जड़ता अशिक्षा , (साक्षरता बढी है, शिक्षा, वैज्ञानिक चेतना, सांस्कृतिक चेतना)बढ़ी है , वह समाजविज्ञानियों को अचरज में डालती है। आज़ का मध्यमवर्ग बेहद आत्मकेंद्रित, क्रूर , ठस और धर्मांध हुआ है। आज़ अस्सी प्रतिशत ऐसे लोग हैं , जो हाथ में रक्षा धागा बांधते हैं, जो बेहद गंदा , बे रंग , व खंडित रहता है। लाल या सिंदूरी टीका इतना भड़कीला व असुंदर , जिसका सौन्दर्य से दूर -दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। शूट पहनने के बाद पगड़ी और ललाट पर विद्रूप टीका, हर सप्ताह कानफोडू संगीत के साथ जगराता, विवाह समारोह हो या, धार्मिक समारोह, आक्रामक सौन्दर्य विहीन , पर्यावरण विनाश के अयवय का भद्दा व मारक प्रदर्शन ।

उन्माद के माहौल में गाँधी ही रौशनी हैं !

चुनाव जीतने के लोभ में कोई भी दल अहिंसात्मक तरीके से बात -चीत करने पर बल नहीं दे रहा है। गांधी , गफ्फार खान, नेल्सन मंडेला,  मार्टिन लूथर किंग , विनोबा, सुब्बाराव , जे पी, सुंदर लाल बहुगुणा, बाबा आमटे, चंडी प्रसाद भट्ट ,  आदि ने अहिंसा और सत्याग्रह की अहमियत, जरूरत और प्रसांगिकता को अपने क्रियात्मक व्यवहार से  बार-बार सिद्ध ही नहीं किया ,बल्कि उसे ग्राह्य व प्रतिष्ठित बनाया। क्रांतिकारी भगत सिंह ने भी अपने एक लेख में हिंसा का तीव्र विरोध किया था और अहिंसा के महत्त्व को रेखांकित किया था। उन्माद के इस माहौल में हमें हर प्लेटफार्म पर अहिंसा व सत्याग्रह की बात जोर से करनी चाहिए।

अन्नपूर्णा देवी : संगीत साधना की एक अनोखी कहानी

विवाह के बाद रविशंकर जी ने उनसे स्टेज पर अपनी प्रस्तुति न करने का एक तरह से आदेश दिया था, जिसे अन्नपूर्णा जी ने स्वीकार कर लिया । बाद में रविशंकर जी से उनका संबंध विच्छेद हो गया ,बावजूद इसके उन्होंने कभी स्टेज पर अपने संगीत को प्रस्तुत नहीं किया । वे पिता की तरह बहुमुखी प्रतिभा की धनी थीं। प्रसिद्ध फिल्मकार ऋषिकेश मुख़र्जी ने उनके रिश्तों पर ‘ अभिमान’ नामक फिल्म बनाई जिसमे अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी प्रमुख भूमिकाओं में हैं।