शिव: असीम तात्‍कालिकता की महान किंवदंती

शिव ने कोई भी ऐसा काम नहीं किया जिसका औचित्य उस काम से ही न ठहराया जा सके। आदमी की जानकारी में वह इस तरह के अकेले प्राणी हैं जिनके काम का औचित्य अपने-आप में था। किसी की भी उस काम के पहले कारण और न बाद में किसी काम का नतीजा ढूँढ़ने की आवश्यकता पड़ी और न औचित्य ही ढूँढ़ने की। जीवन कारण और कार्य की ऐसी लंबी श्रृंखला है कि देवता और मनुष्य दोनों को अपने कामों का औचित्य दूर तक जा कर ढूँढ़ना होता है। यह एक खतरनाक बात है। अनुचित कामों को ठीक ठहराने के लिए चतुराई से भरे, खीझ पैदा करनेवाले तर्क पेश किए जाते हैं। इस तरह झूठ को सच, गुलामी को आजादी और हत्या को जीवन करार दिया जाता है। इस तरह के दुष्टतापूर्ण तर्कों का एकमात्र इलाज है शिव का विचार, क्यों कि वह तात्कालिकता के सिद्धांत का प्रतीक है। उनका हर काम स्वयं में तात्कालिक औचित्य से भरा होता है और उसके लिए किसी पहले या बाद के काम को देखने की जरूरत नहीं होती।

जाति और योनि के कठघरे में जकडा भारतीय समाज

भारतीय समाजवादी के आंदोलन विशिष्ट नेता और प्रखर चिंतक-विचारक डॉ. राममनोहर लोहिया ने भारत के पिछडेपन के दो प्रमुख कारणों की शिखाख्त की है- एक, जाति व्यवस्था और दूसरी स्त्री को गुलाम बनाए रखने की प्रवृत्ति। उनका मानना था कि जाति और यौनि के कटघरों में जकडे रहने की वजह से ही भारत का सदियों पुराना इतिहास एक पराजित समाज का इतिहास रहा है। इन दिनों मीटू अभियान के तहत जारी बहस में डॉ. लोहिया का यह व्याख्यान भी गंभीर हस्तेक्षप करता प्रतीत होता है। उन्होंने यह व्याख्यान 65 वर्ष पूर्व 1953 में दिया था। पेश है उस व्याख्यान का पहला भाग।

आसमानी देवताओं के खिलाफ विद्रोह का नाम है कृष्ण

राम त्रेता के मीठे, शांत और सुसंस्‍कृत युग का देव है। कृष्‍ण पके, जटिल, तीखे और प्रखर बुद्धि युग का देव है। राम गम्‍य है, कृष्‍ण अगम्‍य है। कृष्‍ण ने इतनी अधिक मेहनत की कि उसके वंशज उसे अपना अंतिम आदर्श बनाने से घबड़ाते हैं, यदि बनाते भी हैं तो उसके मित्रभेद ओर कूटनीति की नकल करते हैं, उसका अथक निस्‍व उनके लिए असाध्‍य रहता है। इसीलिए कृष्‍ण हिंदुस्‍तान में कर्म का देव न बन सका। कृष्‍ण ने कर्म राम से ज्‍यादा किए हैं। कितने संधि और विग्रह और प्रदेशों के आपसी संबंधों के धागे उसे पलटने पड़ते थे। यह बड़ी मेहनत और बड़ा पराक्रम था। इसके यह मतलब नहीं कि प्रदेशों के आपसी संबंधों में कृष्‍णनीति अब भी चलाई जाए। कृष्‍ण जो पूर्व-पश्चिम की एकता दे गया, उसी के साथ-साथ उस नीति का औचित्‍य भी खत्‍म हो गया। बच गया कृष्‍ण का मन और उसकी वाणी। और बच गया राम का कर्म। अभी तक हिंदुस्‍तानी इन दोनों का समन्‍वय नहीं कर पाए हैं।