कोरोना: गरीब भारत पर एक और कहर 

ताला-बंदी के चार-पांच दिनों के भीतर यह सच्चाई सामने आ गई कि अमीर भारत असंगठित क्षेत्र के करीब 50 करोड़ प्रवासी/निवासी मेहनतकशों की पीठ पर लदा हुआ है. इनमें करीब 10 प्रतिशत ही स्थायी श्रमिक हैं. बाकी ज्यादातर रोज कुआं खोदते हैं और पानी पीते हैं. महामारी में इन मेहनतकशों की भूमिका अचानक स्थगित हो जाने से रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया और वे हुजूम में अमीर भारत और उसकी सरकार के सामने आ गए. यह एक बड़ी खबर बन गई.

कोरोना : चार सुझाव

अभी भारत के सामने कोविड-19 के हमले से निपटने की चुनौती दरपेश है. विशषज्ञों के कई तरह के अनुमान हैं. यह कहा जा रहा है कि मौजूदा हमले के बाद महामारी की दूसरी लहर भी आ सकती है. महामारी का असर तीन साल तक बना रह सकता है. मौजूदा हमले में सामाजिक संक्रमण (सोशल ट्रांस्मिसन) की स्थिति नहीं आती है तो काफी बचाव हो जाएगा. लेकिन वायरस का सामाजिक संक्रमण होता है तो हालत भयावह होंगे. विशाल आबादी, नितांत नाकाफी स्वास्थ्य सेवाएं, अस्वच्छ वातावरण, व्यापक पैमाने पर फैली बेरोजगारी, जर्जर अर्थव्यवस्था जैसे कारको के चलते बड़े पैमाने पर मौतें हो सकती हैं. ज़ाहिर है, गरीब ज्यादा मरेंगे, लेकिन यूरोप के उदहारण से स्पष्ट है अमीर भी बड़ी संख्या में महामारी का शिकार होंगे. लिहाज़ा, भारत में ठोस फ़ौरी और दूरगामी उपायों की जरूरत है.

दिल्ली का असली दावेदार कौन है ?

लुटियंस की दिल्ली बनने के बाद से दिल्ली में कई तरह के निर्माण कार्य तो काफी होते रहे, लेकिन 20वीं सदी के अंत तक उसकी मूल संरचना में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। पहली बार शीला दीक्षित ने, जो 1998 से 2013 तक 15 साल दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं, दिल्ली के विकास की एक नई अभिकल्पना की और उसे अंजाम देना शुरु किया। आज शहर में जितने फ्लाईओवर, अंडरपास, दिल्ली के चौतरफा बने राष्ट्रीय राजमार्ग, सिग्नेचर ब्रिज, आलीशान फार्म हाउस, बैंकट हॉल, रिसॉर्ट्स, मोटल्स, मॉल, दिल्ली सरकार का नया सचिवालय, क्नॉट प्लेस और अंतर्राज्यीय बस अड्डे सहित कई स्थलों का नवीनीकरण और सौन्दर्यीकरण, सरोजिनी नगर और किदवई नगर में पुराने सरकारी आवासों को गिरा कर बने नए सरकारी आवास/ऑफिस/बिज़नेस कॉम्प्लेक्स … और ज़मीन के नीचे से ज़मीन के ऊपर तक आश्चर्य की तरह बिछता चला गया दिल्ली मेट्रो का जाल – सब शीला दीक्षित की देन है।

बुजदिल और गुलाम दिमाग की देशभक्ति

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही कहा जाता है कि अगला विश्वयुद्ध, उसका जो भी स्वरूप रहे, एशिया की धरती पर लड़ा जाएगा. उस युद्ध में भारत की भूमिका और उस युद्ध के बाद भारत कैसा होगा, इस बारे में भारत के नागरिक समाज की कोई सोच देखने-सुनने को नहीं मिलती. क्योंकि वह यह तक नहीं जानता है कि उपनिवेशवादियों से पहले के आक्रमणकारियों और उपनिवेशवादियों को भारत की सेनाओं को परास्त करने में कामयाबी क्यों मिलती चली गयी. भारत की आज़ादी के दो बड़े युद्धों – 1857 का सशस्त्र संग्राम और 1942 का जनसंग्राम – के बारे में वह प्राय: निरक्षर है.