कांग्रेस में अभी भी संभावनाएं शेष हैं!

इतनी विशाल पराजय के बाद भी कांग्रेस में पुनर्जीवित होने के पूरे अवसर हैं। पार्टी का संगठन देश के लगभग सभी राज्यों में आज भी विद्यमान है। जरूरत उसमें रक्त संचार करने की है और उसे आवश्यक विटामिन देने की है। यह कार्य कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को करना होगा। कांग्रेस को पुनर्जीवित ही नहीं करना है बल्कि उसका पुनरुद्धार करना भी जरूरी है। इसके लिये सबसे पहले चाटुकारिता और दलाल प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना होगा। कांग्रेस सेवादल को पुनर्जीवित करना होगा। सेवादल में ऐसे लोगों की भर्ती करना होगी जो चुनाव और सत्ता की राजनीति से अलग हट कर कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करें और उन्हें कांग्रेस की गांधीवादी विचारधारा से अवगत कराएं।

मोदी का धर्मनिरपक्षेता की खिल्ली उडाना किस बात का संकेत है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव नतीजे आने के बाद अपने पहले ही सार्वजनिक संबोधन में सेक्युलरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता के प्रति अपनी नफरत का इजहार किया और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत में आस्था रखने वालों की खिल्ली उडाई। ऐसा करके उन्होंने न सिर्फ संघ की विचारधारा को सार्वजनिक रू प से अभिव्यक्ति किया है बल्कि एक तरह से देश के संविधान का और उसे बनाने वाले हमारे महान स्वाधीनता सेनानियों का अपमान किया है। क्या यह माना जाए कि मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में संविधान के मूल स्वरूप से छेडछाड करने का आपराधिक कृत्य करेगी?

राजद्रोह के कानून से आखिर मोदी और जेटली को इतना प्रेम क्यों है?

कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में राजद्रोह के कानून को समाप्त करने की बात कही है। जाहिर है कि कांग्रेस पार्टी आजादी के बाद से अब तक चली आ रही एक भूल को सुधार कर देश को एक वास्तविक लोकतन्त्र बनाना चाहती है जबकि दूसरी ओर वर्तमान सत्ताधारी पार्टी और उसका शीर्ष नेतृत्व इस काले कानून को बनाये रख कर देश में फासिस्ट विचारधारा को मजबूती प्रदान करना चाहता है। आखिर क्या है यह राजद्रोह का कानून और इसे खत्म करने की बात पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके तमाम सिपहसालार क्यों परेशान हो रहे हैं?

आज के दौर में लोहिया की याद

डॉ.राममनोहर लोहिया भारतीय आकाश के अदभुत् नक्षत्र थे। आकाश में नक्षत्रों और तारों की संख्या अपरिमित है,परन्तु जिनसे प्रकाश और ऊर्जा मिलती है, निस्संदेह वे थोड़े हैं। लोहिया उन्हीं नक्षत्रों में से एक थे जिनका प्रकाश न केवल मार्गदर्शन करता है बल्कि हमें कर्तव्य की ओर अनुरक्त भी करता है।

फारुक अब्दुल्ला की देशभक्ति का इससे बडा प्रमाण और क्या हो सकता है?

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने मसूद अजहर समेत जिन तीन आतंकवादियों को रिहा कर कंधार पहुंचाया था उनमें से एक कश्मीरी मुश्ताक अहमद जरगर भी था, जो जम्मू कश्मीर के जेल में बंद था। जम्मू कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला उसे रिहा करने के खिलाफ थे। वे उसे 40 कश्मीरी पंडितों की हत्या का गुनहगार मानते थे और फांसी पर टांगना चाहते थे। जब उन्हें पता चला कि केंद्र सरकार ने उसे भी रिहा करने का फैसला किया है तो वे आगबबूला हो उठे थे। वे राज्यपाल के पास अपना इस्तीफा लेकर चले गए थे लेकिन केंद्र सरकार और राज्यपाल के दबाव में उन्हें अपने कदम पीछे खींचने पडे।

वाजपेयी-मुशर्रफ फार्मूले में छिपा है कश्मीर मसले का हल

हर बड़ी आतंकवादी घटना के बाद धुर दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों द्वारा पाकिस्तान को सबक सिखाने की तथा ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ करने की मांग शुरू हो जाती है, लेकिन इस तरह की कार्रवाइयों से कश्मीर की समस्या हल होने वाली नहीं है, क्योंकि कश्मीर की समस्या सैन्य या कानून-व्यवस्था की समस्या है ही नहीं। यह मूलतः एक राजनीतिक समस्या है और इस समस्या का राजनीतिक हल ही निकल सकता है। कश्मीर के समस्या स्थायी हल का गम्भीर प्रयास साल 2001 में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ ने किया था। उस समय अटलजी की सरकार के ही दक्षिणपंथी राष्ट्रवादियों ने अटल-मुशर्रफ वार्ता को उसके अंजाम तक नहीं पहुँचने दिया था।

आम चुनाव में विपक्ष की जीत के अगर-मगर

यदि विपक्षी दल मोदी और बीजेपी को हराना चाहते हैं तो उन्हें अपने क्षुद्र स्वार्थों का त्याग करना होगा और जहां जो पार्टी सबसे मजबूत है और जो उम्मीदवार बीजेपी के उम्मीदवार को हराने में सक्षम हो उसी को बाकी सभी दलों को खुले दिल से समर्थन देना होगा। चुनाव में विजयी होने के बाद विजयी सांसद अपने में से प्रधानमंत्री का चयन कर लें और .सामूहिक नेतृत्व के आधार पर सरकार बनायें तभी देश में लोकतन्त्र और संविधान सुरक्षित रह पायेगा।

प्रत्यक्ष कर वृद्धि के भ्रामक आंकडे पेश किए हैं कामचलाऊ वित्त मंत्री ने

कामचलाऊ वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने लोकसभा में वर्ष 2018-19 में प्रत्यक्ष कर वृद्धि के भ्रामक आंकडें पेश किए हैं और बेशर्मी के साथ उसका श्रेय नोटबंदी को देने का प्रयास किया है।

कुपात्रों की झोली में भारत रत्न और पद्म अलंकरण

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और गायक एवं संगीतकार भूपेन हजारिका को “भारत रत्न” सम्मान सिर्फ राजनीतिक कारणों से ही दिया गया है। भूपेन हजारिका पूर्व में ‘पद्मभूषण’ सम्मान प्राप्त कर चुके हैं और उन्हें इस बार मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ सम्मान देकर सम्मानित किया गया है। कला के क्षेत्र में उनके योगदान पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है। वे ‘भारत रत्न’ सम्मान के लिये सर्वथा योग्य चयन हैं। लेकिन उन्हें इस वर्ष सम्मानित करने के पीछे के राजनीतिक निहितार्थों पर सवाल अवश्य उठाया जा सकता है। जहां तक नानाजी देशमुख का सवाल है, उन्हें ‘भारत रत्न’ सिर्फ इसीलिये दिया गया है कि वे संघ के वरिष्ठ प्रचारक और भाजपा के संस्थापक नेताओं में से एक रहे हैं। उनका राष्ट्र और समाज के प्रति ऐसा कोई योगदान नहीं है कि वे ‘भारत रत्न’ के हकदार होते।

कमलनाथ के सामने बडी लकीर खींचने की चुनौती

मध्य प्रदेश में 15 वर्षों के अंतराल के बाद कांग्रेस फिर सत्ता में आ चुकी है। मुख्यमंत्री कमलनाथ के समक्ष राजनीतिक मोर्चे पर सबसे बडी चुनौती है अपनी पार्टी के लिए विधानसभा चुनाव की सफलता को चार महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में भी दोहराने की। अप्रैल-मई के दौरान लोकसभा चुनाव संभावित है। चुनाव से एक महीने पहले आचार संहिता लागू हो जाएगी। यानी महज तीन महीने की अवधि में ही कमलनाथ को खुद को साबित करना होगा और उस जन-विश्वास का विस्तार करना होगा जो विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हासिल हुआ है।