डिजिटल जासूसी से बेखबर भारत का अफीमची राष्ट्रवाद

एडवर्ड स्नोडन ने आज से 6 साल पहले सरकारों द्वारा डिजिटल निगरानी या कहें डिजिटल जासूसी के खतरों के प्रति दुनिया को आगाह कर दिया था. मगर अफ़सोस कि भारत में 6 साल बाद इसकी आहट तब सुनी गई जब स्वयं व्हाट्सएप्प ने खतरे की घंटी बजाकर हमें नींद से जगाया. जिस वक़्त सरकार देश की अंतरात्मा के पहरुए पत्रकारों, सोशल एक्टिविस्टों और राजनीतिज्ञों के मोबाइल फोनों को जासूसी सॉफ्टवेयरों के ज़रिए चौबीसों घंटे खंगाल रही थी उस वक़्त हम इस डिजिटल जासूसी से बेखबर राष्ट्रवाद की अफीम के नशे में बेसुध पड़े हुए थे. सवाल है कि टेक्नॉलोजी के क्षेत्र में कुलांचे भर रहे हमारे इस देश में कोई स्नोडन पैदा क्यों नहीं हुआ जो निजता के अधिकार और लोकत्रंत्र की जड़ों में मठ्ठा डाल रही सरकार की जासूसियों का समय रहते पर्दाफ़ाश कर देता? व्हाट्सएप्प कम्पनी से अनएनक्रिप्टेड मैसेजिंग की मांग करने वाली सरकार को बेनकाब करने का साहस कोई भारतीय स्नोडन क्यों नहीं जुटा पाया?

यूरोप में ढीली पड़ रही है इस्लामोफोबिया की जकड़न

इस्लामोफोबिया यानी मुसलमानों के खिलाफ और उनके प्रति तर्कहीन नफरत या भय ने यूरोप सहित लगभग समूची दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। भारत भी इस बीमारी से अछूता नहीं है। यह बीमारी मुसलमानों के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भेदभाव, नफरत तथा हिंसा के रूप में पैर पसारती जा रही है। जहाँ एक ओर यूरोप में कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी समूहों के छिटपुट हमलों के चलते बढते हुए इस्लामोफोबिया ने संदेह, विवाद और नफरत को जन्म दिया है, वहीं दूसरी ओर इसका शमन करने हेतु व्यक्तिगत व सामूहिक तौर पर तथा सरकारों की तरफ से कोशिशें जारी हैं ताकि मुसलमानों के दानवीकरण की उस प्रवृत्ति पर काबू पाया जा सके, जिसने यूरोप के गैर-मुस्लिम समाजों को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। ये कोशिशें वैचारिक और व्यावहारिक, दोनों स्तरों पर लगातार जारी है। ऐसी ही तमाम कोशिशों की विस्तार से चर्चा की की गई है इस लेख में।

डॉ. पायल तडवी की आत्महत्या में छुपा है खतरनाक संकेत

आम चुनाव के नतीजे आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के केंद्रीय कक्ष में अपने गठबंधन के सांसदों को और प्रकारांतर से देश-दुनिया को संबोधित करते हुए दावा किया कि इस चुनाव के जरिए भारत में जाति और धर्म की दीवारें टूट चुकी है, लेकिन मुंबई में मेडिकल की पढाई कर रहीं डॉ. पायल तडवी का आत्महत्या करना बताता है कि हाल के वर्षों में जाति-धर्म की दीवारें गिरने के बजाय न सिर्फ मजबूत हुई हैं बल्कि ऊंची भी उठी हैं। मुस्लिम भील समुदाय की डॉ.पायल को भी लगभग उन्हीं हालात में आत्महत्या करने जैसा कदम उठाना पडा है, जिन हालात में चार साल पहले हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी। पायल तडवी की आत्महत्या प्रधानमंत्री मोदी के ‘सबका साथ सबका विश्वास’ के उदघोष को ही चुनौती नहीं है, बल्कि हमारे सभ्य समाज के तेजी से असभ्य होते जाने का भी संकेत है।

हमारे नेताओं और संवैधानिक संस्थानों को आईना दिखाती हैं विदेशों से आती ये खबरें।

मौजूदा दौर में जब भारतीय राजनीति से नैतिकता का लगभग लोप हो चुका है और नियम-कायदों और नैतिक मूल्यों को हमारे बडे-बडे राजनेता ठेंगे पर रखे हुए हैं, तमाम संवैधानिक संस्थाएं सरकार और सत्तारू ढ दल की दासी बनकर उनकी चाकरी करने में जुटी हुई हैं, सरकार के शीर्ष पदों पर बैठे नेता बेशर्मी के साथ इस पतनशील स्थिति को भी अपनी उपलब्धि के तौर पर गिना रहे हैं, तब विदेशों से आ रही खबरें बता रही हैं कि वहां राजनीति में नैतिक मूल्यों की जडें कितनी गहरी हैं और वहां की संवैधानिक संस्थाएं अपने कर्तव्यों के प्रति कितनी सजग हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के कथित भूमि घोटाले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका

मोदी का मोदी के लिए मोदी द्वारा एक कथित भूमि घोटाला! जी हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निजी तौर पर जुडे गुजरात के एक भूमि घोटाले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। याचिका में आरोप लगाया है कि मोदी ने अपनी संपत्ति के विषय में 2007, 2012 और 2014 में अपने नामांकन के समय चुनाव आयोग के समक्ष पेश अपने हलफनामे में भी कथित तौर पर गलत एवं भ्रामक सूचनाएं दी हैं और आयोग ने भी उसे जस का तस स्वीकार कर लिया।

संघर्षों की आग में तपा एक ऐसा भी नौजवान है चुनाव के मैदान में!

आंध्र प्रदेश के चुनाव मैदान में उतरे विजयकुमार उन पांच छात्रों में से एक हैं जिन्हें रोहित वेमुला के साथ हैदराबाद यूनिवर्सिटी हॉस्टल से प्रताड़ित करके निष्कासित कर दिया गया था। रोहित वेमुला की तरह ही दलित समुदाय से आने वाले विजय कुमार चाहते तो किसी भी आरक्षित सीट से चुनाव लड़ सकते थे मगर उन्होंने जानबूझकर परचूर की अनारक्षित सीट का चुनाव किया ताकि जातिभेद की अभेद्य दीवार को तोड़ा जा सके।

‘उन्हें नहीं मालूम कि जलते हुए जहाज से दुश्मन की धरती पर जा गिरना कैसा होता है!’

यह कविता विंग कमांडर अभिनंदन की बहन अदिति ने अपने भाई के साहस को सलाम करते हुए लिखी है, जिसकी महत्वपूर्ण लाइनों का भावानुवाद किया गया है। अंग्रेजी में लिखी गई पूरी मूल कविता भी साथ में प्रस्तुत है।

गौरक्षा के पाखंड की आड में जैन धर्म के राजनीतिकरण का निर्लज्ज प्रयास

बुलंदशहर में तथाकथित गौरक्षकों द्वारा एक पुलिस अफसर की ह्त्या के बाद टीवी न्यूज़ चैनलों पर गौरक्षकों की हिंसा के पक्ष में हिन्दू गौरक्षा वाहिनी, बजरंग दल आदि जैसे संघ परिवार के जो प्रवक्ता आए उनमे से अधिकतर जैन है. उसी की प्रतिक्रिया में यह आलेख लिखा गया है.

कांग्रेस और टीडीपी का गठबंधन राजनीतिक से ज्यादा आर्थिक है!

तेलंगाना में कांग्रेस और टीडीपी का यह गठबंधन दो राजनीतिक दलों का गठबंधन कम और  कम्मा व रेड्डी समुदायों का गठबंधन अधिक है। नायडू के लिए कम्मा समुदाय के उद्योगतियों के हितों की रक्षा के लिए तेलंगाना मे खासी तादाद वाले रेड्डी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली कांग्रेस से हाथ मिलाना फायदे का सौदा है। इससे दोनों राज्यों मे सत्ता से बाहर बैठे रेड्डी समुदाय के लिए भी दोनों जगह उम्मीद की किरण जागती है।

स्विट्जरलैंड में गायों के ‘सींग उच्छेदन’ के मुद्दे पर अनोखा जनमत संग्रह

लाखों स्विस नागरिक २5 नवम्बर को मतदान के ज़रिए गायों के ‘सींग उच्छेदन‘ के मुद्दे पर अपनी राय ज़ाहिर करेंगे. जनमत संग्रह के नतीजे इस बात का निर्णय करेंगें कि जो स्विस गौ-पालक अपनी गायों के सींग नहीं काटते हैं और इसके कारण गौपालन की लागत में जो इजाफा होता है उसकी भरपाई के लिए सरकार गौ-पालकों सब्सिडी दे या नहीं. स्विट्ज़रलैंड में गायों की पीड़ा के प्रति इस उच्चकोटि की संवेदनशीलता भारत के उन तथाकथित गौ रक्षकों के मुंह पर भी तमाचा है जो गाय का इस्तेमाल केवल धार्मिक उन्माद फैलाने और अपनी साम्प्रदायिक राजनीति चमकाने के लिए करते हैं, बाकी समय सडकों पर आवारा घूमती उनकी गौमाता कूड़े के अम्बार में प्लास्टिक खाकर अपना पेट भरती है या फिर गौरक्षा के नाम पर सरकारी अनुदान को डकार जाने वाले गौ- भक्तों की गौशालाओं में चारे–पानी के अभाव में दम तोड़ देती हैं.