हिंदुत्व के अस्तबल से शिवसेना के बाहर आने का मतलब..!

हर संत का एक अतीत होता है और हर डाकू का एक भविष्य! शिवसेना का भाजपा के साथ 30 साल पुराना रिश्ता तोड कर एनसीपी और कांग्रेस के साथ आना गठबंधन की राजनीति के मौजूदा दौर की एक महत्वपूर्ण घटना है, जिसे महज सत्ता के लिए बने गठजोड के रूप में देखना सही नहीं होगा। तीनों दलों के न्यूनतम साझा कार्यक्रम का पहला बिंदू यह है कि इस गठबंधन की सरकार धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में आस्था रखते हुए काम करेगी। न्यूनतम साझा कार्यक्रम के दस्तावेज पर सबसे पहला हस्ताक्षर उद्धव ठाकरे का है। धर्मनिरपेक्षता या सेक्यूलर शब्द से बिदकने और हमेशा खिल्ली उडाने वाली शिवसेना का धर्मनिरपेक्षता में आस्था जताना एक महत्वपूर्ण आश्वस्तकारी बदलाव है, जिसे आसानी से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सर्वसमावेशी राजनीति के रास्ते पर शिवसेना के आगमन की वजहों के विस्तृत विश्लेषण का निष्कर्ष भी बताता है कि कांग्रेस और एनसीपी के साथ उसका यह गठजोड लंबी दूरी तय करेगा और महाराष्ट्र में एक नया सकारात्मक सामाजिक माहौल कायम करेगा।

अब तिरुवल्लुवर और सुब्रह्मण्य भारती के ‘अपहरण’ की तैयारी!

केंद्र और कई राज्यों में सत्ता पर काबिज भाजपा के साथ सबसे बडी समस्या यह है कि उसके पास अपना कोई ऐसा नायक नहीं है, जिसकी उसके सहमना संगठनों के बाहर कोई स्वीकार्यता या सम्मान हो। उसके अपने जो नायक हैं, उनका भी वह एक सीमा से ज्यादा इस्तेमाल नहीं कर सकती, क्योंकि ऐसा करने पर स्वाधीनता संग्राम के दौरान किए गए उनके पापों का पिटारा खुलने लगता है। इसीलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा ने पिछले कुछ दशकों से भारत के महापुरुषों और राष्ट्रीय आंदोलन के नायकों का ‘अपहरण’ कर उन्हें अपनी विचार-परंपरा का पुरखा बताने का हास्यास्पद अभियान चला रखा है। उनकी इस मुहिम में ताजा नाम जुडे हैं- महान तमिल संत तिरुवल्लुवर और तमिल कवि सुब्रह्मण्य भारती। भाजपा और संघ द्वारा तमिलनाडु में अपनी जडें जमाने के लिए तमिल अस्मिता के इन दोनों प्रतीक-पुरुषों का बेहद फूहडता और निर्लज्जता से इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन उनका यह दांव उन पर भारी पड सकता है।

सरकार के ‘राजनीतिक विवेक’ पर निर्भर करती है वीआईपी सुरक्षा!

मोदी सरकार ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को दी गई एसपीजी सुरक्षा को हटाने का निर्णय लिया है. 2003 में वाजपेयी सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्रियों के लिए पद छोड़ने के 10 साल बाद तक सुरक्षा के प्रावधान को घटाकर एक साल कर दिया था, जिसे प्रतिवर्ष रीव्यू के बाद यदि आवश्यक हो तो बढाया जा सकता है. मजे की बात यह है कि 2004 में प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद वाजपेयी मृत्युपर्यन्त एसपीजी सुरक्षा में रहे. कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने सदाशयता दिखाते हुए उनकी सुरक्षा नहीं घटाई जबकि संशोधित कानून के तहत उनकी एसपीजी सुरक्षा हटाई जा सकती थी. जाहिर है कि गांधी परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटाने में मौजूदा सरकार ने सदाशयता के बजाय ‘राजनीतिक विवेक’ का इस्तेमाल किया है।

डिजिटल जासूसी से बेखबर भारत का अफीमची राष्ट्रवाद

एडवर्ड स्नोडन ने आज से 6 साल पहले सरकारों द्वारा डिजिटल निगरानी या कहें डिजिटल जासूसी के खतरों के प्रति दुनिया को आगाह कर दिया था. मगर अफ़सोस कि भारत में 6 साल बाद इसकी आहट तब सुनी गई जब स्वयं व्हाट्सएप्प ने खतरे की घंटी बजाकर हमें नींद से जगाया. जिस वक़्त सरकार देश की अंतरात्मा के पहरुए पत्रकारों, सोशल एक्टिविस्टों और राजनीतिज्ञों के मोबाइल फोनों को जासूसी सॉफ्टवेयरों के ज़रिए चौबीसों घंटे खंगाल रही थी उस वक़्त हम इस डिजिटल जासूसी से बेखबर राष्ट्रवाद की अफीम के नशे में बेसुध पड़े हुए थे. सवाल है कि टेक्नॉलोजी के क्षेत्र में कुलांचे भर रहे हमारे इस देश में कोई स्नोडन पैदा क्यों नहीं हुआ जो निजता के अधिकार और लोकत्रंत्र की जड़ों में मठ्ठा डाल रही सरकार की जासूसियों का समय रहते पर्दाफ़ाश कर देता? व्हाट्सएप्प कम्पनी से अनएनक्रिप्टेड मैसेजिंग की मांग करने वाली सरकार को बेनकाब करने का साहस कोई भारतीय स्नोडन क्यों नहीं जुटा पाया?

यूरोप में ढीली पड़ रही है इस्लामोफोबिया की जकड़न

इस्लामोफोबिया यानी मुसलमानों के खिलाफ और उनके प्रति तर्कहीन नफरत या भय ने यूरोप सहित लगभग समूची दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। भारत भी इस बीमारी से अछूता नहीं है। यह बीमारी मुसलमानों के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भेदभाव, नफरत तथा हिंसा के रूप में पैर पसारती जा रही है। जहाँ एक ओर यूरोप में कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी समूहों के छिटपुट हमलों के चलते बढते हुए इस्लामोफोबिया ने संदेह, विवाद और नफरत को जन्म दिया है, वहीं दूसरी ओर इसका शमन करने हेतु व्यक्तिगत व सामूहिक तौर पर तथा सरकारों की तरफ से कोशिशें जारी हैं ताकि मुसलमानों के दानवीकरण की उस प्रवृत्ति पर काबू पाया जा सके, जिसने यूरोप के गैर-मुस्लिम समाजों को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। ये कोशिशें वैचारिक और व्यावहारिक, दोनों स्तरों पर लगातार जारी है। ऐसी ही तमाम कोशिशों की विस्तार से चर्चा की की गई है इस लेख में।

डॉ. पायल तडवी की आत्महत्या में छुपा है खतरनाक संकेत

आम चुनाव के नतीजे आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के केंद्रीय कक्ष में अपने गठबंधन के सांसदों को और प्रकारांतर से देश-दुनिया को संबोधित करते हुए दावा किया कि इस चुनाव के जरिए भारत में जाति और धर्म की दीवारें टूट चुकी है, लेकिन मुंबई में मेडिकल की पढाई कर रहीं डॉ. पायल तडवी का आत्महत्या करना बताता है कि हाल के वर्षों में जाति-धर्म की दीवारें गिरने के बजाय न सिर्फ मजबूत हुई हैं बल्कि ऊंची भी उठी हैं। मुस्लिम भील समुदाय की डॉ.पायल को भी लगभग उन्हीं हालात में आत्महत्या करने जैसा कदम उठाना पडा है, जिन हालात में चार साल पहले हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली थी। पायल तडवी की आत्महत्या प्रधानमंत्री मोदी के ‘सबका साथ सबका विश्वास’ के उदघोष को ही चुनौती नहीं है, बल्कि हमारे सभ्य समाज के तेजी से असभ्य होते जाने का भी संकेत है।

हमारे नेताओं और संवैधानिक संस्थानों को आईना दिखाती हैं विदेशों से आती ये खबरें।

मौजूदा दौर में जब भारतीय राजनीति से नैतिकता का लगभग लोप हो चुका है और नियम-कायदों और नैतिक मूल्यों को हमारे बडे-बडे राजनेता ठेंगे पर रखे हुए हैं, तमाम संवैधानिक संस्थाएं सरकार और सत्तारू ढ दल की दासी बनकर उनकी चाकरी करने में जुटी हुई हैं, सरकार के शीर्ष पदों पर बैठे नेता बेशर्मी के साथ इस पतनशील स्थिति को भी अपनी उपलब्धि के तौर पर गिना रहे हैं, तब विदेशों से आ रही खबरें बता रही हैं कि वहां राजनीति में नैतिक मूल्यों की जडें कितनी गहरी हैं और वहां की संवैधानिक संस्थाएं अपने कर्तव्यों के प्रति कितनी सजग हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के कथित भूमि घोटाले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका

मोदी का मोदी के लिए मोदी द्वारा एक कथित भूमि घोटाला! जी हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से निजी तौर पर जुडे गुजरात के एक भूमि घोटाले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। याचिका में आरोप लगाया है कि मोदी ने अपनी संपत्ति के विषय में 2007, 2012 और 2014 में अपने नामांकन के समय चुनाव आयोग के समक्ष पेश अपने हलफनामे में भी कथित तौर पर गलत एवं भ्रामक सूचनाएं दी हैं और आयोग ने भी उसे जस का तस स्वीकार कर लिया।

संघर्षों की आग में तपा एक ऐसा भी नौजवान है चुनाव के मैदान में!

आंध्र प्रदेश के चुनाव मैदान में उतरे विजयकुमार उन पांच छात्रों में से एक हैं जिन्हें रोहित वेमुला के साथ हैदराबाद यूनिवर्सिटी हॉस्टल से प्रताड़ित करके निष्कासित कर दिया गया था। रोहित वेमुला की तरह ही दलित समुदाय से आने वाले विजय कुमार चाहते तो किसी भी आरक्षित सीट से चुनाव लड़ सकते थे मगर उन्होंने जानबूझकर परचूर की अनारक्षित सीट का चुनाव किया ताकि जातिभेद की अभेद्य दीवार को तोड़ा जा सके।

‘उन्हें नहीं मालूम कि जलते हुए जहाज से दुश्मन की धरती पर जा गिरना कैसा होता है!’

यह कविता विंग कमांडर अभिनंदन की बहन अदिति ने अपने भाई के साहस को सलाम करते हुए लिखी है, जिसकी महत्वपूर्ण लाइनों का भावानुवाद किया गया है। अंग्रेजी में लिखी गई पूरी मूल कविता भी साथ में प्रस्तुत है।