नामवरी जीवन और एकांत भरा अंतिम अरण्य

हिंदी साहित्य की प्रगतिशील परम्परा का सबसे चमकदार सितारा अंततः अस्त हो गया। लगभग एक दशक पहले सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रियंवद को दिए एक साक्षात्कार में तब 80 पार के नामवर ने कहा था , मैं अपने पिता की तरह अकेला हो गया हूं । हालांकि वे तब काफी सक्रिय थे और लगातार देश भर में व्याख्यान दे रहे थे । मगर भीतर ही भीतर वे तभी से अकेलापन महसूस करने लगे थे । जीवन के अंतिम अरण्य में एक लम्बे अरसे से अपनो से उपेक्षित व नीम एकांत में रहे आये हिन्दी साहित्य के पर्याय नामवर सिंह उड़ जाएगा हंस अकेला की तर्ज पर बिल्कुल अकेले से चले गए।

सबरीमाला: मनुवाद के खिलाफ लड़ती औरतें

वाम मोर्चे की सरकार संवैधानिक तरीके से सुप्रीम कोर्ट का आदेश पालन करवाने के प्रयास में जरूर है मगर वाम मोर्चा संगठनात्मक स्तर पर साफ  खुलकर औरतों के साथ नहीं दिख पा रहा है। कोई और राजनैतिक संगठन के साथ ही न कोई बौद्धिक , सामाजिक या धार्मिक संगठन ही खुलकर मैदान में आने की हिम्मत कर सका है । छुटपुट विरोध कोई कारगर नहीं होता । हमारा तमाम बौद्धिक वर्ग सोशल मीडिया पर मिमियाते ही रहा।