मोदी उन्हीं मुद्दों पर काम करते रहेंगे, जिनके बारे में उनकी सोच स्पष्ट है!

भाजपा के पास कश्मीर और अयोध्या को लेकर स्पष्ट दृष्टि थी और बतौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन मामलों में दृढ़ता दिखाई। तीन तलाक के मामले में भी वे अपने दृष्टिकोण को लेकर इतने स्पष्ट और दृढ़ थे कि विरोध में उठने वाली किसी भी आवाज को उन्होंने कोई अहमियत नहीं दी। लेकिन, यथार्थतः जो सबसे जरूरी मुद्दे हैं, मसलन शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार, आर्थिक विकास, विकास के लाभों का सम्यक वितरण आदि…उन्हें लेकर भाजपा की या मोदी की वैचारिकी उतनी स्पष्ट नहीं। इसलिए यह सोचना महज़ खुशफहमी है कि इतने जटिल और विवादास्पद मुद्दों को निर्णायक परिणति तक पहुंचाने के बाद भाजपा सरकार आर्थिक मामलों पर ध्यान केंद्रित करेगी और रोजगार के लिये भटकते युवाओं का कुछ कल्याण हो सकेगा, विकास के लाभों से वंचित समुदायों का कुछ भला हो सकेगा।

क्यों गतिहीन हो गया मंडल-आंदोलन ?

कभी राजनीति को गतिशीलता देने वाला मंडल आंदोलन आखिर स्वयं ही गतिहीन क्यों लग रहा? ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिनके जवाब ढूंढने की कोशिश में हमें उत्तर भारत की राजनीति की पतन गाथा के अनेक सूत्र मिलते हैं। जिनके हाथों की तख्तियों पर शिक्षा, चिकित्सा और रोजगार के नारे लिखे होने थे, उन वंचित समुदाय के युवाओं के हाथों में त्रिशूल और तलवार हैं जिसका प्रदर्शन रामनवमी और शिवरात्रि के जुलूसों में करके वे मुदित हैं। जिनके कंधों पर प्रतिगामी सांस्कृतिक मूल्यों की लाशें होनी थी, जिन्हें किसी बियाबान में फेंक कर उन्हें उनसे मुक्त होना था, उनके कंधों पर कांवड़ हैं और भांग, गांजा आदि के नशे में धुत हो वे कल्पित परलोक सुधारने को व्यग्र हैं…इहलोक की आपराधिक उपेक्षा करते हुए।

कश्मीर के समाधान का यह कदम डराता भी है!

कश्मीर मसले के समाधान की दिशा में बढ़ा सरकार का यह निर्णायक कदम अधिक आश्वस्त नहीं कर रहा। एक भय का संचार भी मन में हो रहा है। ताकत के दम पर अस्मितावादी विवादों का हल निकल जाए, यह कैसे संभव होगा? आप पाकिस्तान को रगड़ सकते हैं, आतंकियों को रौंद सकते हैं लेकिन अपने ही भाई-बंधुओं को न आप रगड़ सकते हैं, न रौंद सकते हैं। अगर कश्मीर देश का है तो कश्मीरी भी देश के हैं और देश उनका है। भावनाओं में दूरी बाकी रह गई तो ताकत का प्रयोग कर स्थापित की गई एकता अपने भीतर इतने अंतर्विरोधों को जन्म देगी कि कभी भी ऐसी ऊपरी एकता का शीराज़ा बिखर सकता है। यह बहुत भयानक मंजर हो सकता है।

वे बहुत जल्दी में हैं !

उन्हें  क्या  हासिल होने जा रहा है तमाम राजनीतिक नैतिकताओं को दरकिनार कर कर्नाटक में अपनी सरकार बना  लेने से ? या…भविष्य में इसी खेल के सहारे मध्य प्रदेश या राजस्थान में?
संविधान के अनेक प्रावधानों को बदलने में विधान सभाओं की भी भूमिकाएं होती हैं, राज्यसभा में भी संख्या बल बढाने के लिये विधान सभाओं में मजबूत होना जरूरी है।
अच्छा है। इनके राज में मीडिया ने दिखा दिया कि वह कितना गिर सकता है, अनेक संवैधानिक शक्तियों ने दिखा दिया कि वे कितने पालतू हो सकते हैं और…नेता लोग भी दिखा रहे हैं कि बाजार के आलू-बैंगन और उनमें कितना फर्क रह गया है।
खुली थैलियों के आगे कौन कितनी देर ठहर सकता है? कसौटी पर है भारतीय राजनीति, समाज, संवैधानिक प्रतिमान। इस दौर के अनैतिक खोखलेपन को उजागर करने के लिये इनका राज याद किया जाएगा।

कौन रोकेगा सरकारी कंपनियों को बिकने से ?

कौन नहीं जानता था कि नरेंद्र मोदी पुनः सत्ता में आएंगे तो रेलवे या सार्वजनिक क्षेत्र की अन्य इकाइयों में विनिवेश, निगमीकरण, निजीकरण का आक्रामक दौर नए सिरे से शुरू होगा ? जिन्होंने इन चुनावों में अपनी पसंदीदा सरकार बनवाने के लिये अरबों अरब रुपये खर्च किये थे उन्होंने ये रुपये हिंदुत्व की रक्षा के लिये नहीं लगाए थे, न ही राष्ट्र उनके एजेंडा में था।  वे सब कुछ खरीद लेंगे और फिर…और ताकतवर, बेहद, बेहद ताकतवर बन कर सामने आएंगे। आपने “देश के लिये” वोट दिया, राष्ट्रवाद के लिये वोट दिया, हिंदुत्व के लिये वोट दिया। तो, अपने देश में ‘हिंदुत्व और राष्ट्रवाद’ के घालमेल से रची जा रही कारपोरेट संस्कृति के नग्न नृत्य का दृश्य देखने के लिये आपको तैयार रहना चाहिये।

अंग्रेजी ने चौपट कर डाला है उनका भविष्य

आपको जाना अंग्रेजी स्कूल में ही है, पढ़ना अंग्रेजी में ही है, लिखना अंग्रेजी में ही है। लेकिन, न आपको अंग्रेजी आती है, न आपके बाप-दादा-चाचा को…और तो और…आपको पढ़ाने वाले शिक्षक को भी अंग्रेजी नहीं आती।
निजी अंग्रेजी स्कूलों से निकल कर ऊंची कक्षाओं में जाने वाले बच्चे कालेजों में फिर हिन्दी माध्यम में लौटते हैं। खास कर बिहार-यूपी में। लेकिन, अब स्थिति यह रहती है कि अंग्रेजी पर उनकी पकड़ तो नहीं ही बन पाई, हिन्दी में भी वे चौपट हैं। बचपन से जिस हिन्दी को हिकारत के भाव से देखा, अब उसी हिन्दी माध्यम में पढ़ना-लिखना…बीए लेवल की परीक्षा देना। न हिन्दी में ठीक से लिख सकते हैं न अंग्रेजी में।

राष्ट्रवादी कर्मकांड खत्म, निजीकरण का सिलसिला फिर शुरू

चुनाव खत्म हुए, नई सरकार बन गई। अब सारे राष्ट्रवादी कर्मकांड खत्म और जोर-शोर से निजीकरण का सिलसिला शुरू। निजीकरण यानी जिन कॉरपोरेट महाप्रभुओं के पैसे पर चुनाव लडा गया, उनका कर्ज उतारने का उपक्रम। हमारी वायुसेना का जहाज 13 जवानों के साथ पिछले पांच दिनों से से चीनी सीमा के आसपास गायब है लेकिन न तो घर में घुसकर मारने वाले प्रधानमंत्री बोल रहे हैं और न ही उनकी पार्टी। युद्धोन्मादी मीडिया में भी उस गायब हुए जहाज का कोई जिक्र नहीं हो रहा है।

क्या नई पीढ़ी मनुष्य होने का अधिकार ही खो देगी?

फ्री डाटा की उपलब्धता ने स्मार्टफोन को व्यवस्था का प्रभावी औजार बना दिया और नई पीढ़ी को राजनीतिक रूप से दिग्भ्रमित करना इतना आसान हो गया जितना इतिहास में कभी नहीं था। हमारी शिक्षा प्रणाली, मीडिया की प्रकृति और उसके चरित्र में आये बदलावों ने यह सुनिश्चित किया है कि नई पीढ़ी अपने हित.अहित को लेकर इतनी संवेदनशील न बन पाए कि वह व्यवस्था को चुनौती दे सके। निम्न वर्गीय युवाओं के लिए बने रोजगार में आकर टिकने की जद्दोजहद कर रहे मध्यवर्गीय युवा भी मनुष्य होने का अधिकार खोते जा रहे हैं।

खुशहाली की उम्मीद न करें इस दौर में !

नरेंद्र मोदी ने बस इतना किया कि सरकारी उपक्रमों, सरकारी शिक्षा संस्थानों को अपनी मौत मरने के ज्यादा करीब ला दिया। वे इसी लिये सत्ता में आए ही थे…या कहें…इसी लिये उनको सत्ता में लाया ही गया था। बीते दो साल में ही देश में ढाई हजार सरकारी स्कूल बंद किये जा चुके हैं। बिहार, हरियाणा, राजस्थान, एमपी आदि में चार हजार और स्कूलों को बंद करने का निर्णय हो चुका है। शिक्षकों का सम्मान और वेतन मांगने वाले पारा/नियोजित अब निश्चिंत हो सकते हैं कि वे चाहे जितना चीखें, अनशन धरना करें, उन्हें यह नहीं मिलेगा, क्योंकि मोदी जी की आर्थिक नीतियां इसकी इजाजत बिल्कुल नहीं देती।
बीएसएनएल जैसी संस्थाओं के वजूद का ही कोई औचित्य नहीं, जहां पब्लिक सेक्टर के बैंकों के बने रहने का कोई मतलब नहीं…यानी रेलवे सहित परिवहन के तमाम साधनों का अवश्यम्भावी निजीकरण, यानी शिक्षा और चिकित्सा के तंत्र पर मुनाफा की संस्कृति का एकांत आधिपत्य, यानी…पूरी व्यवस्था को अपने दायरे में समेट कर बाजार का मुक्त अट्टहास।

हर जनादेश स्वागत के लायक नहीं होता!

नरेंद्र मोदी को बधाई दीजिए क्योंकि वे इसके हकदार हैं, लेकिन यह उम्मीद मत पालिये कि इस दूसरे कार्यकाल में उनका हृदय परिवर्त्तन होगा और वे वंचितों की शिक्षा, चिकित्सा के लिये, उनके जीवन के मौलिक संदर्भों के लिये कुछ ठोस और सकारात्मक करेंगे। नहीं, वे ऐसा कर ही नहीं सकते क्योंकि इसके लिये वे हैं ही नहीं। वे उन नवउदारवादी शक्तियों के राजनीतिक ध्वज वाहक हैं जिन्हें दुनिया के अनेक ज़िंदा देशों में अब वैचारिक चुनौतियों का सामना है लेकिन भारत में जिनके लिये मैदान खुला है।