हर जनादेश स्वागत के लायक नहीं होता!

नरेंद्र मोदी को बधाई दीजिए क्योंकि वे इसके हकदार हैं, लेकिन यह उम्मीद मत पालिये कि इस दूसरे कार्यकाल में उनका हृदय परिवर्त्तन होगा और वे वंचितों की शिक्षा, चिकित्सा के लिये, उनके जीवन के मौलिक संदर्भों के लिये कुछ ठोस और सकारात्मक करेंगे। नहीं, वे ऐसा कर ही नहीं सकते क्योंकि इसके लिये वे हैं ही नहीं। वे उन नवउदारवादी शक्तियों के राजनीतिक ध्वज वाहक हैं जिन्हें दुनिया के अनेक ज़िंदा देशों में अब वैचारिक चुनौतियों का सामना है लेकिन भारत में जिनके लिये मैदान खुला है।

वैचारिक अंधकार के दौर से गुजरता भारत

‘मिलेनियम सोशलिस्ट’…आजकल यूरोप में यह शब्द बहुत चर्चा में है। अमेरिका में इसी से मिलता-जुलता अर्थ रखने वाला शब्द अधिक प्रचलन में है…’मिलेनियम लेफ्ट’। सामान्य तौर पर इसका अर्थ है ऐसे युवा, जिन्होंने नई सहस्राब्दी में होश संभाला और अपनी सरकारों की आर्थिक नीतियों के नतीजों में जिस तरह के समाज का विकास देखा उससे वे असंतुष्ट हैं और चाहते हैं कि हालात बदलें। लेकिन…अफसोस…हमारा देश वैचारिक अंधकार के दौर से गुजर रहा है। कमजोर वर्गों का राजनीतिक विभाजन और ‘मिलेनियम यूथ’ की मति का नव औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा हरण हमारी त्रासदी का रूप ले चुका है।

नरेंद्र मोदी की यह बेचैनी क्या कहती हैं?

जिस शैली की राजनीति नरेंद्र मोदी ने की है और जितनी लोकप्रियता हासिल की है, वह तभी तक है जब तक वे सत्ता में हैं। अगर वे दुबारा सत्ता में आ सके तो ‘मोदी ब्रांड पॉलिटिक्स’ का यह सिलसिला चलता रहेगा, देश का चाहे जो हाल हो। लेकिन तब क्या होगा…जब 23 मई, 2019 को ही सत्ता से उनकी रुखसती का फरमान जारी हो जाए? अगर मोदी चुनाव में पराजित हो सत्ता से बाहर होंगे तो भारतीय राजनीति में उनकी प्रासंगिकता कितनी रह जाएगी? और तो और…भाजपा में ही उनकी प्रासंगिकता कितनी रह जाएगी? यही सवाल मोदी को बेचैन कर रहा है, बल्कि बेहद बेचैन कर रहा है।

यह जश्न मनाने का नहीं, सोचने का वक्त है!

जब 90 प्रतिशत या उसके आसपास अंक लाने पर छात्र उदास हो जाए और अभिभावक चिंतित हो जाएं तो समझना चाहिये कि चीजें गलत दिशा में जा रही हैं। यह दूसरी, तीसरी क्लास की नहीं, 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं का मामला है। 500 में 499, 498, 497…नहीं, यह सही नहीं। कुछ न कुछ तो ऐसा है जिसे लेकर अकादमिक नियंताओं को सोचना होगा।

भारतीय राजनीति के सबसे घटिया दौर पर एक नज़र !

भारतीय राजनीति वैचारिक और व्यावहारिक, दोनों स्तरों पर अपने निकृष्टतम दौर में है। सारे दल, तमाम राजनेता इसके जिम्मेवार हैं। लेकिन, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी सर्वथा अग्राह्य है। क्योंकि, नोटबन्दी की विभीषिका के बाद, कारपोरेट लूट का रिकार्ड तोड़ने के बाद भी मोदी राष्ट्रवाद और धर्म-संस्कृतिवाद की खतरनाक आड़ ले सकते हैं, ले रहे हैं, पुलवामा के शहीदों के नाम पर वोट मांगने की राजनीतिक अनैतिकता का खुलेआम प्रदर्शन कर रहे हैं जबकि अमित शाह बालाकोट में 250 आतंकियों के मारे जाने की नितांत झूठी खबर को चुनावी रैली में राजनीतिक अस्त्र की तरह इस्तेमाल कर चुके हैं।

अब सिर्फ अमीर के बच्चे लेंगे ऊँची शिक्षा !

मोदी सरकार की नीतियों के चलते उच्च मध्यम और उच्च वर्ग के लोग ही गुणवत्ता पूर्ण उच्च शिक्षा प्राप्त करने के हकदार होंगे क्योंकि उन्हीं की ऐसी आर्थिक हैसियत होगी। जिन युवाओं को शिक्षा के सवालों पर सड़कों पर उतरना था उनमें से बहुत सारे युवा ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद, भारत माता की जय, वन्दे मातरम’ आदि का गगनभेदी निनाद करते सड़कों पर उधम मचाते देखे जाने लगे। . ऐसे समय में, जब रोजगार का संकट खतरे के निशान को पार कर चुका है, हमने सड़कों पर ऐसी तख्तियां थामे युवाओं के हुजूम को भी देखा, जिन पर लिखा था…”हमें नौकरी नहीं, बदला चाहिये।”

मोदी-शाह के हिंदुत्व की असलियत सामने आ चुकी है !

कारपोरेट लूट और बेरोजगारी से त्रस्त आम लोगों की नजरों में मोदी-शाह ब्रांड राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की असलियत आ चुकी है। अब कौतूहल नहीं रहा, जिज्ञासा नहीं रही। लगातार 32 वर्षों से घोषणापत्रों में राम मंदिर का जिक्र भी यह अहसास कराने के लिये काफी है कि इन्हें कोई मंदिर-वन्दिर बनाना नहीं है, बस उन मुद्दों को ज़िंदा रखना है जो इनकी राजनीति के लिये उपयोगी हैं। दरअसल, इनके हिंदुत्व को, इनके राष्ट्रवाद को सदैव जन उन्मादों का संबल चाहिये। लेकिन, लोग तो अब बेरोजगारी पर सवाल पूछने लगे हैं, सत्ता और कारपोरेट के गठजोड़ के खेल पर सवाल पूछने लगे हैं।

राहुल की ‘न्याय’ योजना पर भी चर्चा हो!

बीते दो-ढाई दशकों में सत्ता-संरचना में कारपोरेट के बढ़ते प्रभाव ने आर्थिक नीतियों को उनके हितों के अनुरूप बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। नतीजा में उनकी समृद्धि में बीते वर्षों में बेहिंसाब इज़ाफ़ा हुआ है, जबकि आधी से अधिक आबादी विकास के लाभों से वंचित होती गई है। अर्थशास्त्रियों का एक वर्ग न्यूनतम आय की गारंटी का पक्षधर होकर सामने आया है। राहुल गांधी के सौजन्य से भारत के राजनीतिक विमर्श में भी यह मुद्दा शामिल हुआ है। निर्धनों के एकाउंट में कुछ पैसे आएंगे और बाजार को भी कुछ राहत मिलेगी। कांग्रेस की ‘न्याय’ योजन पर चर्चा आवश्यक है।

किस तरह के लोग वरदान हैं मोदी के लिए?

फिल्म अभिनेता रणबीर कपूर ने पिछले दिनों एक इंटरव्यू में कहा था, ” मेरे घर में बिजली और पानी की अबाध आपूर्त्ति है, फिर मुझे राजनीति से कोई मतलब रखने की क्या जरूरत है.?” यानी, जब उन्हें सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं ही तो देश की राजनीतिक-सामाजिक दशा-दिशा से उन्हें क्या मतलब? नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं के लिये वैचारिक रूप से दरिद्र और सामाजिक रूप से निरपेक्ष पीढ़ी वरदान साबित होती है। रणबीर कपूर ऐसी ही पीढी का प्रतिनिधि चेहरा है।

मोदी तो जाएंगे लेकिन अपने पीछे कैसी भाजपा छोड जाएंगे?

नरेंद्र मोदी आज हैं, कल नहीं रहेंगे, लेकिन भाजपा को रहना है। सवाल है कि मोदी कैसी भाजपा को छोड़ कर जाएंगे? एक विफल प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की विरासत भाजपा के लिये भारी बोझ साबित होगी लेकिन उससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण सवाल भाजपा के सामने मोदी की लफ्फाजी भरी राजनीतिक शैली को ले कर होगा। इतिहास बहुत निर्मम होता है और वह व्यक्ति मोदी से अधिक सवाल भाजपा नामक संगठन से करेगा। मोदी ने देश का नुकसान तो किया ही है, एक संगठन के रूप में भाजपा का बहुत नुकसान कर दिया है।