कौन रोकेगा सरकारी कंपनियों को बिकने से ?

कौन नहीं जानता था कि नरेंद्र मोदी पुनः सत्ता में आएंगे तो रेलवे या सार्वजनिक क्षेत्र की अन्य इकाइयों में विनिवेश, निगमीकरण, निजीकरण का आक्रामक दौर नए सिरे से शुरू होगा ? जिन्होंने इन चुनावों में अपनी पसंदीदा सरकार बनवाने के लिये अरबों अरब रुपये खर्च किये थे उन्होंने ये रुपये हिंदुत्व की रक्षा के लिये नहीं लगाए थे, न ही राष्ट्र उनके एजेंडा में था।  वे सब कुछ खरीद लेंगे और फिर…और ताकतवर, बेहद, बेहद ताकतवर बन कर सामने आएंगे। आपने “देश के लिये” वोट दिया, राष्ट्रवाद के लिये वोट दिया, हिंदुत्व के लिये वोट दिया। तो, अपने देश में ‘हिंदुत्व और राष्ट्रवाद’ के घालमेल से रची जा रही कारपोरेट संस्कृति के नग्न नृत्य का दृश्य देखने के लिये आपको तैयार रहना चाहिये।

अंग्रेजी ने चौपट कर डाला है उनका भविष्य

आपको जाना अंग्रेजी स्कूल में ही है, पढ़ना अंग्रेजी में ही है, लिखना अंग्रेजी में ही है। लेकिन, न आपको अंग्रेजी आती है, न आपके बाप-दादा-चाचा को…और तो और…आपको पढ़ाने वाले शिक्षक को भी अंग्रेजी नहीं आती।
निजी अंग्रेजी स्कूलों से निकल कर ऊंची कक्षाओं में जाने वाले बच्चे कालेजों में फिर हिन्दी माध्यम में लौटते हैं। खास कर बिहार-यूपी में। लेकिन, अब स्थिति यह रहती है कि अंग्रेजी पर उनकी पकड़ तो नहीं ही बन पाई, हिन्दी में भी वे चौपट हैं। बचपन से जिस हिन्दी को हिकारत के भाव से देखा, अब उसी हिन्दी माध्यम में पढ़ना-लिखना…बीए लेवल की परीक्षा देना। न हिन्दी में ठीक से लिख सकते हैं न अंग्रेजी में।

राष्ट्रवादी कर्मकांड खत्म, निजीकरण का सिलसिला फिर शुरू

चुनाव खत्म हुए, नई सरकार बन गई। अब सारे राष्ट्रवादी कर्मकांड खत्म और जोर-शोर से निजीकरण का सिलसिला शुरू। निजीकरण यानी जिन कॉरपोरेट महाप्रभुओं के पैसे पर चुनाव लडा गया, उनका कर्ज उतारने का उपक्रम। हमारी वायुसेना का जहाज 13 जवानों के साथ पिछले पांच दिनों से से चीनी सीमा के आसपास गायब है लेकिन न तो घर में घुसकर मारने वाले प्रधानमंत्री बोल रहे हैं और न ही उनकी पार्टी। युद्धोन्मादी मीडिया में भी उस गायब हुए जहाज का कोई जिक्र नहीं हो रहा है।

क्या नई पीढ़ी मनुष्य होने का अधिकार ही खो देगी?

फ्री डाटा की उपलब्धता ने स्मार्टफोन को व्यवस्था का प्रभावी औजार बना दिया और नई पीढ़ी को राजनीतिक रूप से दिग्भ्रमित करना इतना आसान हो गया जितना इतिहास में कभी नहीं था। हमारी शिक्षा प्रणाली, मीडिया की प्रकृति और उसके चरित्र में आये बदलावों ने यह सुनिश्चित किया है कि नई पीढ़ी अपने हित.अहित को लेकर इतनी संवेदनशील न बन पाए कि वह व्यवस्था को चुनौती दे सके। निम्न वर्गीय युवाओं के लिए बने रोजगार में आकर टिकने की जद्दोजहद कर रहे मध्यवर्गीय युवा भी मनुष्य होने का अधिकार खोते जा रहे हैं।

खुशहाली की उम्मीद न करें इस दौर में !

नरेंद्र मोदी ने बस इतना किया कि सरकारी उपक्रमों, सरकारी शिक्षा संस्थानों को अपनी मौत मरने के ज्यादा करीब ला दिया। वे इसी लिये सत्ता में आए ही थे…या कहें…इसी लिये उनको सत्ता में लाया ही गया था। बीते दो साल में ही देश में ढाई हजार सरकारी स्कूल बंद किये जा चुके हैं। बिहार, हरियाणा, राजस्थान, एमपी आदि में चार हजार और स्कूलों को बंद करने का निर्णय हो चुका है। शिक्षकों का सम्मान और वेतन मांगने वाले पारा/नियोजित अब निश्चिंत हो सकते हैं कि वे चाहे जितना चीखें, अनशन धरना करें, उन्हें यह नहीं मिलेगा, क्योंकि मोदी जी की आर्थिक नीतियां इसकी इजाजत बिल्कुल नहीं देती।
बीएसएनएल जैसी संस्थाओं के वजूद का ही कोई औचित्य नहीं, जहां पब्लिक सेक्टर के बैंकों के बने रहने का कोई मतलब नहीं…यानी रेलवे सहित परिवहन के तमाम साधनों का अवश्यम्भावी निजीकरण, यानी शिक्षा और चिकित्सा के तंत्र पर मुनाफा की संस्कृति का एकांत आधिपत्य, यानी…पूरी व्यवस्था को अपने दायरे में समेट कर बाजार का मुक्त अट्टहास।

हर जनादेश स्वागत के लायक नहीं होता!

नरेंद्र मोदी को बधाई दीजिए क्योंकि वे इसके हकदार हैं, लेकिन यह उम्मीद मत पालिये कि इस दूसरे कार्यकाल में उनका हृदय परिवर्त्तन होगा और वे वंचितों की शिक्षा, चिकित्सा के लिये, उनके जीवन के मौलिक संदर्भों के लिये कुछ ठोस और सकारात्मक करेंगे। नहीं, वे ऐसा कर ही नहीं सकते क्योंकि इसके लिये वे हैं ही नहीं। वे उन नवउदारवादी शक्तियों के राजनीतिक ध्वज वाहक हैं जिन्हें दुनिया के अनेक ज़िंदा देशों में अब वैचारिक चुनौतियों का सामना है लेकिन भारत में जिनके लिये मैदान खुला है।

वैचारिक अंधकार के दौर से गुजरता भारत

‘मिलेनियम सोशलिस्ट’…आजकल यूरोप में यह शब्द बहुत चर्चा में है। अमेरिका में इसी से मिलता-जुलता अर्थ रखने वाला शब्द अधिक प्रचलन में है…’मिलेनियम लेफ्ट’। सामान्य तौर पर इसका अर्थ है ऐसे युवा, जिन्होंने नई सहस्राब्दी में होश संभाला और अपनी सरकारों की आर्थिक नीतियों के नतीजों में जिस तरह के समाज का विकास देखा उससे वे असंतुष्ट हैं और चाहते हैं कि हालात बदलें। लेकिन…अफसोस…हमारा देश वैचारिक अंधकार के दौर से गुजर रहा है। कमजोर वर्गों का राजनीतिक विभाजन और ‘मिलेनियम यूथ’ की मति का नव औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा हरण हमारी त्रासदी का रूप ले चुका है।

नरेंद्र मोदी की यह बेचैनी क्या कहती हैं?

जिस शैली की राजनीति नरेंद्र मोदी ने की है और जितनी लोकप्रियता हासिल की है, वह तभी तक है जब तक वे सत्ता में हैं। अगर वे दुबारा सत्ता में आ सके तो ‘मोदी ब्रांड पॉलिटिक्स’ का यह सिलसिला चलता रहेगा, देश का चाहे जो हाल हो। लेकिन तब क्या होगा…जब 23 मई, 2019 को ही सत्ता से उनकी रुखसती का फरमान जारी हो जाए? अगर मोदी चुनाव में पराजित हो सत्ता से बाहर होंगे तो भारतीय राजनीति में उनकी प्रासंगिकता कितनी रह जाएगी? और तो और…भाजपा में ही उनकी प्रासंगिकता कितनी रह जाएगी? यही सवाल मोदी को बेचैन कर रहा है, बल्कि बेहद बेचैन कर रहा है।

यह जश्न मनाने का नहीं, सोचने का वक्त है!

जब 90 प्रतिशत या उसके आसपास अंक लाने पर छात्र उदास हो जाए और अभिभावक चिंतित हो जाएं तो समझना चाहिये कि चीजें गलत दिशा में जा रही हैं। यह दूसरी, तीसरी क्लास की नहीं, 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं का मामला है। 500 में 499, 498, 497…नहीं, यह सही नहीं। कुछ न कुछ तो ऐसा है जिसे लेकर अकादमिक नियंताओं को सोचना होगा।

भारतीय राजनीति के सबसे घटिया दौर पर एक नज़र !

भारतीय राजनीति वैचारिक और व्यावहारिक, दोनों स्तरों पर अपने निकृष्टतम दौर में है। सारे दल, तमाम राजनेता इसके जिम्मेवार हैं। लेकिन, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी सर्वथा अग्राह्य है। क्योंकि, नोटबन्दी की विभीषिका के बाद, कारपोरेट लूट का रिकार्ड तोड़ने के बाद भी मोदी राष्ट्रवाद और धर्म-संस्कृतिवाद की खतरनाक आड़ ले सकते हैं, ले रहे हैं, पुलवामा के शहीदों के नाम पर वोट मांगने की राजनीतिक अनैतिकता का खुलेआम प्रदर्शन कर रहे हैं जबकि अमित शाह बालाकोट में 250 आतंकियों के मारे जाने की नितांत झूठी खबर को चुनावी रैली में राजनीतिक अस्त्र की तरह इस्तेमाल कर चुके हैं।