मप्र : विकास के भाजपाई दावों की पोल खुली

मध्यप्रदेश के विकास के दावे छद्म और झूठे हैं। दिखाने के लिए विकास के नाम पर सड़कें, पुल और पुलिया दिखाई जाती है! जबकि, किसी राज्य का वास्तविक विकास प्रति व्यक्ति आय, गरीबी का अनुपात, ऊर्जा की उपलब्धता, स्वास्थ्य और शिक्षा, कृषि विकास के हालात और राजकोषीय घाटे की स्थिति मानी जाती है। वित्त आयोग की टीम ने मध्यप्रदेश की यात्रा के दौरान ऐसे सारे दावों की भी पोल खोल दी, जिसमें राज्य को बीमारू राज्य से उबरने की बात कही गई थी! आयोग ने भाजपा सरकार के 15 साल के कार्यकाल में हुई उन्नति के दावों को भी खोखला माना

क्या मोदी सुमित्रा महाजन को राज्यपाल का पद देंगे?

लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष और इंदौर की पूर्व सांसद सुमित्रा महाजन राज्यपाल बनने की कोशिश में लगी हैं! एक दिन उनके महाराष्ट्र का राज्यपाल बनने की अफवाह उड़ती रही! केंद्रीय मंत्री से लगाकर भाजपा के कई बड़े नेताओं ने भी उन्हें ट्वीट करके बधाई दे डाली! इस अफवाह ने ये सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या वास्तव में सुमित्रा महाजन राज्यपाल बनेंगी? इस अफवाह को सच करने के लिए वे दिल्ली में लॉबिंग कर रही हैं! असंतुष्टों से मेलजोल का मकसद कहीं पार्टी पर दबाव बनाना तो नहीं?

राजनीति की तासीर बताएगा झाबुआ उपचुनाव!

झाबुआ के विधायक गुमानसिंह डामोर ने लोकसभा का चुनाव जीत लिया! उनके सांसद बन जाने से ये सीट खाली हो गई! अब यहाँ उपचुनाव होंगे! दरअसल, झाबुआ को मध्यप्रदेश की राजनीति की तासीर मापने का थर्मामीटर कभी नहीं माना गया! लेकिन, संयोग है कि ये मौका दूसरी बार झाबुआ को ही मिला! पिछले लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा सांसद दिलीपसिंह भूरिया का निधन हो गया था! इस कारण वहाँ लोकसभा का उपचुनाव हुआ और प्रचंड मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस ने जीत का झंडा गाड़ा था! इस बार यहाँ विधानसभा की सीट भाजपा विधायक गुमानसिंह डामोर के इस्तीफे से खाली हुई! अब यहाँ विधानसभा का उपचुनाव होगा! ये उपचुनाव सामान्य नहीं होगा, बल्कि इससे प्रदेश की राजनीति के मिजाज का अंदाजा होगा! इस उपचुनाव के नतीजे दर्शाएंगे कि मतदाताओं का मूड क्या वास्तव में देश और प्रदेश के राजनीतिक नेतृत्व के लिए अलग-अलग होता है! ऐसे में यदि भाजपा फिर झाबुआ विधानसभा सीट जीतती है, तो इससे कमलनाथ सरकार के अस्थिर होने संकेत माना जाएगा! पर, यदि यहाँ से कांग्रेस जीती है, तो भाजपा प्रदेश सरकार को छेड़ने की गलती शायद न करे! दोनों ही पार्टियों के लिए ये चुनाव जीतना प्रतिष्ठा की बात है! वे नहीं चाहते कि ये मौका उनके हाथ से निकले!

किसे मिलेगी सुमित्रा महाजन की विरासत ?

इंदौर लोकसभा क्षेत्र की लगातार 8 बार सांसद रही सुमित्रा महाजन यानी ‘ताई’ की राजनीतिक विरासत को लेकर जंग शुरू हो गई है! भाजपा उम्मीदवार शंकर लालवानी को ‘ताई’ ने तो अपनी विरासत की चाभी नहीं सौंपी, पर जनता उन्हें सही व्यक्ति मानती है या नहीं, ये अभी भविष्य के गर्भ में है! उनके सामने कांग्रेस के पंकज संघवी हैं, जिनकी किस्मत में कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में अभी तक कोई जीत दर्ज नहीं है! इंदौर की भविष्य की राजनीति का सिक्का हवा में उछल चुका है! जब ये सिक्का नीचे गिरेगा तो ऊपर ‘चित’ आता है या ‘पट’ कोई नहीं जानता!

क्या यह लोकतंत्र की भाषा है ?

‘अरे पिट्ठू कलेक्टर सुन ले …’ ये राजनीति की कौनसी भाषा है? लेकिन, ये कहा गया और वो भी उस भाजपा नेता ने जो 13 साल मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं! इस बार के लोकसभा चुनाव को मध्यप्रदेश में नेताओं के बिगड़े बोल कुछ इस अंदाज में सामने आ रहे हैं। ये किसी एक पार्टी के नेताओं की बपौती नहीं रह गई, सभी को बदजुबानी की बीमारी लग गई है! सबसे ज्यादा आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल भोपाल की भाजपा उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ने किया! उनके बिगड़े बोल की देशभर में प्रतिक्रिया हुई! मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव और प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान की जुबान भी बेलगाम हो चली है! कोई बाजू काटकर हाथ में पकड़ाने की धमकी दे रहा है, तो कोई सरकार में आने के बाद सरकारी अधिकारियों को देख लेने के लिए धमका रहा है।

मध्यप्रदेश की आदिवासी सीटों पर भाजपा दाल पतली!

लोकसभा चुनाव में भाजपा आदिवासी क्षेत्रों में अपनी ताकतवर मौजूदगी दर्ज नहीं करा सकी! मध्यप्रदेश की 29 में से 6 आदिवासी सीटों में से कहीं भी भाजपा का पलड़ा भारी नहीं लग रहा! पिछले चुनाव में भाजपा ने सभी 6 सीटें जीत ली थी, पर उपचुनाव में झाबुआ सीट उसके हाथ से निकल गई! लेकिन, इस बार पिछली कहानी दोहराएगी, ऐसे कोई आसार नहीं हैं! किसी भी सीट पर भाजपा का उम्मीदवार दमदार नजर नहीं आ रहा! आज भी कांग्रेस से दूसरे दर्जे के या आयातित नेता ही भाजपा की पहली पसंद बनते हैं। प्रदेश की 47 विधानसभा सीटें भी आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं, लेकिन कोई सर्वमान्य नेता की कमी भाजपा में हमेशा खली है। जबकि, संघ आदिवासी क्षेत्रों में बरसों से काम कर रहा है।आदिवासी विकास और वनवासी कल्याण परिषद, वनबंधु मित्र मंडल जैसे कई आनुषंगिक संगठन भी बने, उन्होंने काम भी किया, पर नेतृत्व नहीं गढ़ सका। प्रदेश के 21 जिलों में आदिवासी इतने बहुमत में है। विधानसभा की तो 35 सीटें ऐसी हैं, जहां आदिवासियों के समर्थन के बिना कोई उम्मीदवार जीत ही नहीं सकता!

इस तरह असम्मान के साथ विदा की गईं सुमित्रा महाजन !

ये आशंका सही साबित हुई कि भारतीय जनता पार्टी ने इस बार इंदौर लोकसभा सीट से सुमित्रा महाजन ‘ताई’ को उम्मीदवार नहीं बनाएगी! पार्टी ने ये फैसला काफी पहले कर लिया था! इस राज को खुलते-खुलते उम्मीदवारों की 16 लिस्ट सामने आ गई! लेकिन, इस पूरे प्रसंग का सबसे दुखद पहलू ये रहा कि भाजपा ने अपनी महिला नेता की सम्मानजनक बिदाई नहीं की! बल्कि, उन्हें इस बात के लिए मजबूर किया गया कि वे खुद आगे बढ़कर चुनाव से इंकार करें, और अंततः ये हुआ भी!

भाजपा ने क्या ‘ताई’ को बदलने का फैसला कर लिया?

इंदौर की लोकसभा सीट भाजपा से छीनने के लिए कांग्रेस करीब तीन दशक से छटपटा रही है। कांग्रेस की एक पूरी पीढ़ी ‘ताई’ को सांसद की कुर्सी पर बैठे देखते हुए बुढाने लगी! वे अकेली ऐसी महिला सांसद हैं, जो एक ही लोकसभा सीट और एक ही पार्टी से लगातार 8 लोकसभा चुनाव जीती हैं। लेकिन, इस बार माहौल कुछ अलग है! इंदौर जैसे भाजपा के गढ़ में विधानसभा चुनाव में पार्टी की दुर्गति के बाद भाजपा को खतरा नजर आने लगा है। विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे में ‘ताई’ और ‘भाई’ यानी कैलाश विजयवर्गीय में हुई खींचतान का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा है! इंदौर संसदीय क्षेत्र की 8 में से कांग्रेस ने चार सीटें जीतकर पार्टी का सारा गणित बिगाड़ दिया। पार्टी ने इस हार से ये सबक सीखा कि अब ‘ताई’ का जादू ख़त्म हो गया!

पश्चिम मध्यप्रदेश: भाजपा के लिए कठिन है जीत को दोहराना!

मध्यप्रदेश की राजनीति में टोटका है कि जिस पार्टी की स्थिति मालवा-निमाड़ में अच्छी होती है, वही सरकार बनाती है! विधानसभा चुनाव में तो ये कई बार साबित भी हो चुका है! लोकसभा चुनाव में भी यही टोटका काम करता है! आशय यह कि पश्चिम मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल के मतदाता जिस पार्टी को पसंद करते हैं, केंद्र में उसी पार्टी का झंडा लहराता है। अब देखना है कि इस इलाके की 8 सीटें क्या संकेत देती हैं! अभी तो 7 पर भाजपा का कब्ज़ा है, पर ये आंकड़ा दोहराया जा सकेगा, इसमें शक है। क्योंकि, पार्टी का सर्वे चेहरे बदलने की हिदायत दे रहा है! लेकिन, सबसे बड़ा सवाल है कि क्या भाजपा के पास वो 8 जिताऊ चेहरे हैं, जो 2014 की तरह यहाँ की सभी सीटें हथिया सकें?

भाजपा का ये प्रलाप, जनता को नापसंद!

जब से मध्यप्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार बनी है, भाजपा की रातों की नींद हराम है! छोटे कार्यकर्ता से लगाकर डेढ़ दशक तक सरकार चलाकर फुर्सत हुए शिवराजसिंह चौहान तक को हार पच नहीं रही! जिस दिन विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे, उस दिन से अभी तक भाजपा इस हड़बड़ी में है कि कब सरकार गिरे! भाजपा को किस बात की जल्दबाजी है, ये कोई समझ नहीं पा रहा! किनारे पर डूबने का दर्द उसे इतना ज्यादा है कि कमलनाथ सरकार उसकी आँखों में बुरी तरह खटक रही है! जब चौथी बार भाजपा की सरकार नहीं बनी, तो ये बात जमकर प्रचारित की गई कि वो जब चाहे कांग्रेस सरकार गिरा सकती है! लेकिन, ऐसा करना संभव नहीं लगा तो भाजपा ने कमलनाथ सरकार के फैसलों की आलोचना शुरू कर दी! ख़ास बात ये कि इस सारी नौटंकी का नेतृत्व शिवराज सिंह करते दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें पार्टी ने किनारे कर दिया! अब जनता तय करेगी कि लोकसभा चुनाव में किसका पलड़ा भारी रखना है और किसे सबक सिखाना है!