कौन जीतेगा झाबुआ की सीट?  

एक बार फिर मध्यप्रदेश का झाबुआ राजनीति के शीर्ष पर है! किसी बड़े राज्य में कभी ऐसे राजनीतिक हालात नहीं बने कि यहाँ होने वाला विधानसभा उपचुनाव दोनों बड़ी पार्टियों के जीवन.मरण का सवाल बन जाए!  कांग्रेस ये उपचुनाव जीतकर अपनी ताकत बढ़ाना चाहती है! जबकि भाजपा अपनी इस सीट को दोबारा जीतकर साबित करना चाहती है कि कांग्रेस की कमलनाथ सरकार से प्रदेश की जनता का मोह भंग हो चुका है। लेकिनए झाबुआ में बागियों का इतिहास काफी लम्बा रहा है! इस बार भी क्या बागी उम्मीदवार अपनी मौजूदगी का असर दिखाएंगे?

क्यों है सिंधिया के नाम का तीव्र विरोध ? 

इन दिनों मध्यप्रदेश की कांग्रेस में घमासान मचा है।  पार्टी के नए मुखिया का नाम तय होना आसान नहीं लग रहा!  सारे नेता विपक्ष को भूलकर घर की जंग व्यस्त हैं! पार्टी प्रदेश अध्यक्ष  के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम सामने आते ही कई नेता कुलबुलाने लगे! उनके नाम पर विरोध का कारण समझ से परे है। किसी भी पद के लिए सिंधिया का नाम आने पर कांग्रेस के नेताओं के पेट में दर्द क्यों होने लगता है?

सत्ता पाने को बेताब भाजपाई !

‘जिस दिन बॉस इशारा करेंगे, कमलनाथ सरकार गिरा देंगे!’ इस तरह के बड़बोले बयानबाज भाजपा नेताओं की अब बोलती बंद है! उन्हें समझ नहीं आ रहा कि उनके दड़बे में सेंध कैसे लग गई! जिन लोगों को भाजपा बहला-फुसलाकर कांग्रेस से अपने खेमे में लाई थी, वे फिर कांग्रेस में क्यों और किस लालच में पहुँच गए? ऐसे बहुत सारे सवाल हैं, जिससे भाजपा के बड़े नेता परेशान है! यही कारण है कि जिन दो भाजपा विधायकों ने प्रतिबद्धता बदली, उन्हें समझाने की कोशिशें हो रही है! पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सारी कमान अपने हाथ में ले ली! पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को ये भी खबर मिली कि पार्टी के कुछ नेताओं के कारण विधायकों में असंतोष है! इस घटना के बाद शिवराजसिंह चौहान और गोपाल भार्गव जैसे बयानवीरों की जुबान पर ताले डालने के अलावा प्रदेश में पार्टी नेतृत्व भी बदला जा सकता है!

आचरण में डगमगा क्यों रही है भाजपा ?

राजनीति में शुचिता, संस्कार और मर्यादा की सबसे ज्यादा बात भाजपा ही ज्यादा करती रही है। ये जानते हुए भी कि ये संभव नहीं है! देशभर में ऐसी कई घटनाएं हुई जिनसे सामने आया कि भाजपा के नेता दूध के धुले नहीं है! आश्चर्य तो इस बात पर कि संघ से भाजपा में आए नेताओं पर सबसे ज्यादा उँगलियाँ उठती है। पार्टी में संगठन मंत्री वह पद है, जिन्हें संघ से पार्टी में लाया जाता है! ताजा मामला उज्जैन का है, जहाँ के भाजपा के संगठन मंत्री प्रदीप जोशी पर एक युवक से समलैंगिक संबंधों का आरोप लगा है। पार्टी ने उन्हें पद से हटा दिया, पर ये समस्या का हल नहीं है! जरुरत है कि इस तरह के अमर्यादित आचरण के कारणों को जानकर उनका स्थाई हल निकालने की!

मप्र : विकास के भाजपाई दावों की पोल खुली

मध्यप्रदेश के विकास के दावे छद्म और झूठे हैं। दिखाने के लिए विकास के नाम पर सड़कें, पुल और पुलिया दिखाई जाती है! जबकि, किसी राज्य का वास्तविक विकास प्रति व्यक्ति आय, गरीबी का अनुपात, ऊर्जा की उपलब्धता, स्वास्थ्य और शिक्षा, कृषि विकास के हालात और राजकोषीय घाटे की स्थिति मानी जाती है। वित्त आयोग की टीम ने मध्यप्रदेश की यात्रा के दौरान ऐसे सारे दावों की भी पोल खोल दी, जिसमें राज्य को बीमारू राज्य से उबरने की बात कही गई थी! आयोग ने भाजपा सरकार के 15 साल के कार्यकाल में हुई उन्नति के दावों को भी खोखला माना

क्या मोदी सुमित्रा महाजन को राज्यपाल का पद देंगे?

लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष और इंदौर की पूर्व सांसद सुमित्रा महाजन राज्यपाल बनने की कोशिश में लगी हैं! एक दिन उनके महाराष्ट्र का राज्यपाल बनने की अफवाह उड़ती रही! केंद्रीय मंत्री से लगाकर भाजपा के कई बड़े नेताओं ने भी उन्हें ट्वीट करके बधाई दे डाली! इस अफवाह ने ये सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या वास्तव में सुमित्रा महाजन राज्यपाल बनेंगी? इस अफवाह को सच करने के लिए वे दिल्ली में लॉबिंग कर रही हैं! असंतुष्टों से मेलजोल का मकसद कहीं पार्टी पर दबाव बनाना तो नहीं?

राजनीति की तासीर बताएगा झाबुआ उपचुनाव!

झाबुआ के विधायक गुमानसिंह डामोर ने लोकसभा का चुनाव जीत लिया! उनके सांसद बन जाने से ये सीट खाली हो गई! अब यहाँ उपचुनाव होंगे! दरअसल, झाबुआ को मध्यप्रदेश की राजनीति की तासीर मापने का थर्मामीटर कभी नहीं माना गया! लेकिन, संयोग है कि ये मौका दूसरी बार झाबुआ को ही मिला! पिछले लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा सांसद दिलीपसिंह भूरिया का निधन हो गया था! इस कारण वहाँ लोकसभा का उपचुनाव हुआ और प्रचंड मोदी लहर के बावजूद कांग्रेस ने जीत का झंडा गाड़ा था! इस बार यहाँ विधानसभा की सीट भाजपा विधायक गुमानसिंह डामोर के इस्तीफे से खाली हुई! अब यहाँ विधानसभा का उपचुनाव होगा! ये उपचुनाव सामान्य नहीं होगा, बल्कि इससे प्रदेश की राजनीति के मिजाज का अंदाजा होगा! इस उपचुनाव के नतीजे दर्शाएंगे कि मतदाताओं का मूड क्या वास्तव में देश और प्रदेश के राजनीतिक नेतृत्व के लिए अलग-अलग होता है! ऐसे में यदि भाजपा फिर झाबुआ विधानसभा सीट जीतती है, तो इससे कमलनाथ सरकार के अस्थिर होने संकेत माना जाएगा! पर, यदि यहाँ से कांग्रेस जीती है, तो भाजपा प्रदेश सरकार को छेड़ने की गलती शायद न करे! दोनों ही पार्टियों के लिए ये चुनाव जीतना प्रतिष्ठा की बात है! वे नहीं चाहते कि ये मौका उनके हाथ से निकले!

किसे मिलेगी सुमित्रा महाजन की विरासत ?

इंदौर लोकसभा क्षेत्र की लगातार 8 बार सांसद रही सुमित्रा महाजन यानी ‘ताई’ की राजनीतिक विरासत को लेकर जंग शुरू हो गई है! भाजपा उम्मीदवार शंकर लालवानी को ‘ताई’ ने तो अपनी विरासत की चाभी नहीं सौंपी, पर जनता उन्हें सही व्यक्ति मानती है या नहीं, ये अभी भविष्य के गर्भ में है! उनके सामने कांग्रेस के पंकज संघवी हैं, जिनकी किस्मत में कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में अभी तक कोई जीत दर्ज नहीं है! इंदौर की भविष्य की राजनीति का सिक्का हवा में उछल चुका है! जब ये सिक्का नीचे गिरेगा तो ऊपर ‘चित’ आता है या ‘पट’ कोई नहीं जानता!

क्या यह लोकतंत्र की भाषा है ?

‘अरे पिट्ठू कलेक्टर सुन ले …’ ये राजनीति की कौनसी भाषा है? लेकिन, ये कहा गया और वो भी उस भाजपा नेता ने जो 13 साल मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं! इस बार के लोकसभा चुनाव को मध्यप्रदेश में नेताओं के बिगड़े बोल कुछ इस अंदाज में सामने आ रहे हैं। ये किसी एक पार्टी के नेताओं की बपौती नहीं रह गई, सभी को बदजुबानी की बीमारी लग गई है! सबसे ज्यादा आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल भोपाल की भाजपा उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ने किया! उनके बिगड़े बोल की देशभर में प्रतिक्रिया हुई! मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव और प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान की जुबान भी बेलगाम हो चली है! कोई बाजू काटकर हाथ में पकड़ाने की धमकी दे रहा है, तो कोई सरकार में आने के बाद सरकारी अधिकारियों को देख लेने के लिए धमका रहा है।

मध्यप्रदेश की आदिवासी सीटों पर भाजपा दाल पतली!

लोकसभा चुनाव में भाजपा आदिवासी क्षेत्रों में अपनी ताकतवर मौजूदगी दर्ज नहीं करा सकी! मध्यप्रदेश की 29 में से 6 आदिवासी सीटों में से कहीं भी भाजपा का पलड़ा भारी नहीं लग रहा! पिछले चुनाव में भाजपा ने सभी 6 सीटें जीत ली थी, पर उपचुनाव में झाबुआ सीट उसके हाथ से निकल गई! लेकिन, इस बार पिछली कहानी दोहराएगी, ऐसे कोई आसार नहीं हैं! किसी भी सीट पर भाजपा का उम्मीदवार दमदार नजर नहीं आ रहा! आज भी कांग्रेस से दूसरे दर्जे के या आयातित नेता ही भाजपा की पहली पसंद बनते हैं। प्रदेश की 47 विधानसभा सीटें भी आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं, लेकिन कोई सर्वमान्य नेता की कमी भाजपा में हमेशा खली है। जबकि, संघ आदिवासी क्षेत्रों में बरसों से काम कर रहा है।आदिवासी विकास और वनवासी कल्याण परिषद, वनबंधु मित्र मंडल जैसे कई आनुषंगिक संगठन भी बने, उन्होंने काम भी किया, पर नेतृत्व नहीं गढ़ सका। प्रदेश के 21 जिलों में आदिवासी इतने बहुमत में है। विधानसभा की तो 35 सीटें ऐसी हैं, जहां आदिवासियों के समर्थन के बिना कोई उम्मीदवार जीत ही नहीं सकता!