किसे मिलेगी सुमित्रा महाजन की विरासत ?

इंदौर लोकसभा क्षेत्र की लगातार 8 बार सांसद रही सुमित्रा महाजन यानी ‘ताई’ की राजनीतिक विरासत को लेकर जंग शुरू हो गई है! भाजपा उम्मीदवार शंकर लालवानी को ‘ताई’ ने तो अपनी विरासत की चाभी नहीं सौंपी, पर जनता उन्हें सही व्यक्ति मानती है या नहीं, ये अभी भविष्य के गर्भ में है! उनके सामने कांग्रेस के पंकज संघवी हैं, जिनकी किस्मत में कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में अभी तक कोई जीत दर्ज नहीं है! इंदौर की भविष्य की राजनीति का सिक्का हवा में उछल चुका है! जब ये सिक्का नीचे गिरेगा तो ऊपर ‘चित’ आता है या ‘पट’ कोई नहीं जानता!

क्या यह लोकतंत्र की भाषा है ?

‘अरे पिट्ठू कलेक्टर सुन ले …’ ये राजनीति की कौनसी भाषा है? लेकिन, ये कहा गया और वो भी उस भाजपा नेता ने जो 13 साल मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं! इस बार के लोकसभा चुनाव को मध्यप्रदेश में नेताओं के बिगड़े बोल कुछ इस अंदाज में सामने आ रहे हैं। ये किसी एक पार्टी के नेताओं की बपौती नहीं रह गई, सभी को बदजुबानी की बीमारी लग गई है! सबसे ज्यादा आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल भोपाल की भाजपा उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ने किया! उनके बिगड़े बोल की देशभर में प्रतिक्रिया हुई! मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह, नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव और प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान की जुबान भी बेलगाम हो चली है! कोई बाजू काटकर हाथ में पकड़ाने की धमकी दे रहा है, तो कोई सरकार में आने के बाद सरकारी अधिकारियों को देख लेने के लिए धमका रहा है।

मध्यप्रदेश की आदिवासी सीटों पर भाजपा दाल पतली!

लोकसभा चुनाव में भाजपा आदिवासी क्षेत्रों में अपनी ताकतवर मौजूदगी दर्ज नहीं करा सकी! मध्यप्रदेश की 29 में से 6 आदिवासी सीटों में से कहीं भी भाजपा का पलड़ा भारी नहीं लग रहा! पिछले चुनाव में भाजपा ने सभी 6 सीटें जीत ली थी, पर उपचुनाव में झाबुआ सीट उसके हाथ से निकल गई! लेकिन, इस बार पिछली कहानी दोहराएगी, ऐसे कोई आसार नहीं हैं! किसी भी सीट पर भाजपा का उम्मीदवार दमदार नजर नहीं आ रहा! आज भी कांग्रेस से दूसरे दर्जे के या आयातित नेता ही भाजपा की पहली पसंद बनते हैं। प्रदेश की 47 विधानसभा सीटें भी आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं, लेकिन कोई सर्वमान्य नेता की कमी भाजपा में हमेशा खली है। जबकि, संघ आदिवासी क्षेत्रों में बरसों से काम कर रहा है।आदिवासी विकास और वनवासी कल्याण परिषद, वनबंधु मित्र मंडल जैसे कई आनुषंगिक संगठन भी बने, उन्होंने काम भी किया, पर नेतृत्व नहीं गढ़ सका। प्रदेश के 21 जिलों में आदिवासी इतने बहुमत में है। विधानसभा की तो 35 सीटें ऐसी हैं, जहां आदिवासियों के समर्थन के बिना कोई उम्मीदवार जीत ही नहीं सकता!

इस तरह असम्मान के साथ विदा की गईं सुमित्रा महाजन !

ये आशंका सही साबित हुई कि भारतीय जनता पार्टी ने इस बार इंदौर लोकसभा सीट से सुमित्रा महाजन ‘ताई’ को उम्मीदवार नहीं बनाएगी! पार्टी ने ये फैसला काफी पहले कर लिया था! इस राज को खुलते-खुलते उम्मीदवारों की 16 लिस्ट सामने आ गई! लेकिन, इस पूरे प्रसंग का सबसे दुखद पहलू ये रहा कि भाजपा ने अपनी महिला नेता की सम्मानजनक बिदाई नहीं की! बल्कि, उन्हें इस बात के लिए मजबूर किया गया कि वे खुद आगे बढ़कर चुनाव से इंकार करें, और अंततः ये हुआ भी!

भाजपा ने क्या ‘ताई’ को बदलने का फैसला कर लिया?

इंदौर की लोकसभा सीट भाजपा से छीनने के लिए कांग्रेस करीब तीन दशक से छटपटा रही है। कांग्रेस की एक पूरी पीढ़ी ‘ताई’ को सांसद की कुर्सी पर बैठे देखते हुए बुढाने लगी! वे अकेली ऐसी महिला सांसद हैं, जो एक ही लोकसभा सीट और एक ही पार्टी से लगातार 8 लोकसभा चुनाव जीती हैं। लेकिन, इस बार माहौल कुछ अलग है! इंदौर जैसे भाजपा के गढ़ में विधानसभा चुनाव में पार्टी की दुर्गति के बाद भाजपा को खतरा नजर आने लगा है। विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे में ‘ताई’ और ‘भाई’ यानी कैलाश विजयवर्गीय में हुई खींचतान का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा है! इंदौर संसदीय क्षेत्र की 8 में से कांग्रेस ने चार सीटें जीतकर पार्टी का सारा गणित बिगाड़ दिया। पार्टी ने इस हार से ये सबक सीखा कि अब ‘ताई’ का जादू ख़त्म हो गया!

पश्चिम मध्यप्रदेश: भाजपा के लिए कठिन है जीत को दोहराना!

मध्यप्रदेश की राजनीति में टोटका है कि जिस पार्टी की स्थिति मालवा-निमाड़ में अच्छी होती है, वही सरकार बनाती है! विधानसभा चुनाव में तो ये कई बार साबित भी हो चुका है! लोकसभा चुनाव में भी यही टोटका काम करता है! आशय यह कि पश्चिम मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल के मतदाता जिस पार्टी को पसंद करते हैं, केंद्र में उसी पार्टी का झंडा लहराता है। अब देखना है कि इस इलाके की 8 सीटें क्या संकेत देती हैं! अभी तो 7 पर भाजपा का कब्ज़ा है, पर ये आंकड़ा दोहराया जा सकेगा, इसमें शक है। क्योंकि, पार्टी का सर्वे चेहरे बदलने की हिदायत दे रहा है! लेकिन, सबसे बड़ा सवाल है कि क्या भाजपा के पास वो 8 जिताऊ चेहरे हैं, जो 2014 की तरह यहाँ की सभी सीटें हथिया सकें?

भाजपा का ये प्रलाप, जनता को नापसंद!

जब से मध्यप्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार बनी है, भाजपा की रातों की नींद हराम है! छोटे कार्यकर्ता से लगाकर डेढ़ दशक तक सरकार चलाकर फुर्सत हुए शिवराजसिंह चौहान तक को हार पच नहीं रही! जिस दिन विधानसभा चुनाव के नतीजे आए थे, उस दिन से अभी तक भाजपा इस हड़बड़ी में है कि कब सरकार गिरे! भाजपा को किस बात की जल्दबाजी है, ये कोई समझ नहीं पा रहा! किनारे पर डूबने का दर्द उसे इतना ज्यादा है कि कमलनाथ सरकार उसकी आँखों में बुरी तरह खटक रही है! जब चौथी बार भाजपा की सरकार नहीं बनी, तो ये बात जमकर प्रचारित की गई कि वो जब चाहे कांग्रेस सरकार गिरा सकती है! लेकिन, ऐसा करना संभव नहीं लगा तो भाजपा ने कमलनाथ सरकार के फैसलों की आलोचना शुरू कर दी! ख़ास बात ये कि इस सारी नौटंकी का नेतृत्व शिवराज सिंह करते दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें पार्टी ने किनारे कर दिया! अब जनता तय करेगी कि लोकसभा चुनाव में किसका पलड़ा भारी रखना है और किसे सबक सिखाना है!

भाजपा के लिए मध्यप्रदेश की आधी सीटें जीतना भी मुश्किल!

विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने लोकसभा चुनाव का लक्ष्य तय किया था। इसमें कांग्रेस के कब्जे वाली छिंदवाड़ा, गुना और झाबुआ सीटों को छीनने की योजना बनाई थी! लेकिन, लगता है अब भाजपा को अपना लक्ष्य बदलना पड़ेगा! उसे कांग्रेस से सिर्फ तीन सीट ही नहीं छीनना है, अपनी भी 12 सीटें बचाने जुगत लगाना पड़ेगी! क्योंकि, कांग्रेस को मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव में जो सफलता मिली है, उससे भाजपा की 12 लोकसभा सीटें खतरे में पड़ गईं! इनमें से 8 पर तो कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले ज्यादा वोट मिले ही हैं! 4 लोकसभा सीटों पर लाखों वोटों का अंतर घटकर हज़ारों में सिमट गया! प्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं, इनमें से सिर्फ 3 कांग्रेस के पास हैं और 26 पर भाजपा का कब्ज़ा है। भाजपा की खतरे वाली सीटों में भाजपा के दिग्गज नेता नरेंद्र तोमर, फग्गनसिंह कुलस्ते, अनूप मिश्रा और नंदकुमार सिंह चौहान की सीटें भी है!

कमलनाथ सरकार के फैसले और रिवर्स गियर!

कांग्रेस की कमलनाथ सरकार को मध्यप्रदेश में सरकार चलाते महीनाभर हो गया! इतने दिनों में सरकार ने कई फैसले किए और उन्हें लागू भी किया! लेकिन, देखा गया कि फैसले कम किए, वापस कुछ ज्यादा ही लिए! सरकार का ये महीनेभर का कार्यकाल कई मामलों में यादगार रहा। विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद उम्मीद की गई थी, कि मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद कमलनाथ भाजपा की 15 साल चली सरकार के फैसलों को कसौटी पर कसेंगे! अच्छे फैसले लागू होंगे और मनमाने फैसलों को बंद किया जाएगा या बदला जाएगा। लेकिन, देखा गया कि सरकार ने फैसले कम लिए, अपने ही फैसलों पर यू-टर्न ज्यादा लिया। इस कारण प्रदेश सरकार को कई बार नीचा भी देखना पड़ा!

पार्टी के गुस्से के शिकार शिवराज!

शिवराजसिंह चौहान इन दिनों जो भी कदम उठाते हैं, वो उल्टा पड़ जाता है। विधानसभा चुनाव में हार के बाद जो हालात बने हैं, वो शिवराजसिंह के लिए रास नहीं आ रहे! भाजपा की हार और मध्यप्रदेश में चौथी बार सरकार न बना पाने के मलाल के बाद सबसे बड़ा सवाल भी यही था कि अब मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री किस भूमिका में नजर आएंगे? पार्टी ने उनकी भूमिका तय कर दी, उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। सुनने में उपाध्यक्ष पद बड़ा और प्रतिष्ठित लगता है और है भी! लेकिन, शिवराज सिंह के कद के अनुरूप नहीं! 13 साल मुख्यमंत्री रहने के बाद पिछले एक महीने में उनके साथ पार्टी ने जो कुछ किया वो ये समझने के लिए काफी है कि वे पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की आँख की किरकिरी बन गए हैं। अब ये सुना जा रहा है कि उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़वाने की तैयारी है! लेकिन, उन्हें विदिशा से खड़ा नहीं किया जाने वाले है! उन्हें छिंदवाड़ा जैसी चुनौती वाली सीट से उतारा जा सकता है। सारे घटनाक्रम को देखकर क्या ये समझा जाए कि उन्हें प्रदेश की राजनीति से बाहर किया जा रहा है!