पलामू के जंगलों की विनाश गाथा-2

मंदबुद्धि छोटे भाई के जीवन और भविष्य की दुश्चिंताओं से उभरी निराशा ने लेखक को नकारवाद के गहरे अंधेेरे में धकेल दिया है, और उन्हें इससे बाहर निकालने के लिए वन अधिकारी पिता पलामू के जंगलों में ले जाते हैं। लेकिन शांति तथा आनंद देने वाला यह स्रोत भी शीघ्र ही डूबने वाला है। जीते-जागते जंगल के डूबने तथा अपनी डूबती-सी लग रही जिंदगी की साथ-साथ चल रही पीड़ा की कहानी कहती है ‘जगल गाथा’ की यह किश्त।

पलामू के जंगलों की विनाश गाथा 

करीब सैंतालिस बरस बाद झारखण्ड के पलामू में मंडल डैम का रुका काम शुरू हो गया है और महाविनाश की एक थमी गाथा अगले अध्याय की ओर  बढ़ गयी है-पूर्णविनाश। वरिष्ठ पत्रकर और लेखक गुंजन सिन्हा ने जंगल के इस विनाश में खुद के जीवन की पीड़ा का प्रतिबिम्ब देखा है। जीवन और जंगल के आपस में गुंथे होने का चित्र  उन्होंने पूरी संवेदना से अपनी शीघ्र प्रकाश्य किताब ‘जंगल गाथा’ में उभारा है।  यह हमें महाश्वेता देवी के उपन्यास  ‘अरण्येर अधिकार’ की याद दिलाती है।  पेश है है पुस्तक के अंश की  पहली किश्त।