सरकारी सम्पति बेच कर खर्च चलाने की मजबूरी !

अब यह साफ साफ दिख रहा है कि आने वाले सालो में मोदी सरकार राष्ट्रीय संपत्ति माने जाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियों को बेच कर अपना खर्च चलाने की तैयारी कर रही है।  उसे इस बात से कोई मतलब नही रह गया है कि वह कंपनियां घाटे में है या मुनाफे में। सरकार इस वक्त ताबड़तोड़ ढंग से ट्रांसमिशन लाइनों, टेलिकॉम टावरों, गैस पाइपलाइनों, हवाई अड्डों और भूखंडों सहित सरकारी कंपनियों के कई ऐसेट्स बेचने या लीज पर देने की तैयारी कर रही है।

आरएसएस अब सैनिक स्कूल खोलेगा 

सैनिक  स्कूल के इस मॉडल की शुरुआत हिन्दू महासभा के नेता और आरएसएस  के संस्थापक केबी हेडगेवार के गुरु डॉ बीएस मुंजे ने १९३० के दशक में की थी।  उनका मॉडल इटली के तानाशाह और फासीवाद के जन्मदाता मुसोलिनी से प्रभावित था। उसने  अपने कार्यकर्ताओ को फासीवाद में प्रशिक्षित करने के लिए ऐसे ही संस्थान खोल रखे थे।

उन्नाव रेप : पीड़िता की गुहार किसी ने नहीं सुनी!

उसने हर जगह गुहार लगायी! सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिखी। लेकिन किसी ने नहीं सुनी। कोई उसकी रक्षा को नहीं आया। अब वह अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही है। उसने अपनी चिट्ठी में न्यायपालिका के बिक जाने की बात लिखी, फिर भी किसी को नहीं लगा कि इसकी जांच की जाए। न्यायपालिका को भी अपनी विश्वनीयता बचाने की फिक्र नहीं रही!

अब बिजली गिरेगी बिजली उपभोक्ताओं पर !

हर घर मे बिजली पुहचाने के नाम पर, स्मार्ट मीटर लगाने के नाम पर, बेहतर टैरिफ नीति के नाम पर मोदी सरकार अगले कुछ महीनों में एनटीपीसी पॉवरग्रिड  के जरिए घाटे में चल रही डिस्कॉम यानी बिजली वितरण कंपनियों को टेकओवर कर सकती है। सरकार जो नयी पावर टैरिफ नीति ला रही है,उसे अच्छी तरह से समझना बहुत जरूरी है. इसके तहत बिजली इस्तेमाल को लेकर दिन में तीन तरह के पावर टैरिफ हो सकते हैं। ग्रहकों  को सुबह, दोपहर और शाम के लिए अलग-अलग टैरिफ (स्लैब) के मुताबिक बिजली बिल भरना पड़ सकता है।

राकेश अस्थाना को बचाने में क्यों लगी है सरकार ?

मोदी सरकार ने राकेश अस्थाना के खिलाफ जांच की निगरानी करने वाले अफसर तरुण गौबा का तबादला कर दिया है।  बुधवार को सीबीआई ने इसे लेकर एक आदेश जारी किया।  इस आदेश में कहा गया है कि कैबिनेट की नियुक्ति समिति तरुण गौबा को समय से पहले ही उनके राज्य कैडर में वापस भेजने को मंजूरी देती है। तरुण गौबा गुजरात की फार्मा कंपनी स्टर्लिंग बायोटेक लिमिटेड के निदेशक संदेसरा बंधुओं और राकेश अस्थाना के सबंन्धो की ही तो जांच कर रहे थे जिसमे अभी कुछ दिन पहले ही पता चला है कि स्टर्लिंग बायोटेक ने पीएनबी घोटाले से भी ज्यादा की रकम की चपत लगाई है। 

क्या जीएसटी का घाटा बिगाड़ेगा भारत का बजट?

दरअसल जीएसटी अब सरकार का सबसे बड़ा सिर दर्द साबित हो रहा है।  जीएसटी लागू होने के बाद राज्य का राजस्व घाटा बढ़कर 20 से 32 प्रतिशत पर पहुंच गया है। केंद्र ने इस नई व्यवस्था से राज्यों को होने वाले घाटे की भरपाई की जिम्मेदारी ली है । घाटा लगातार बढ़ता ही जा रहा है। जीएसटी की इस दोषपूर्ण व्यवस्था से केंद्र सरकार का भी खजाना खाली हो चुका है।  प्रश्न उठता है कि क्या मोदी सरकार इस बजट में नए कर लगाने का फैसला कर सकती है?

बीएसएनएल को क्यों डुबो रही है सरकार ?

बीएसएनएल जैसी प्रतिष्ठित सरकारी कंपनी के कर्मचारियों का शायद जून महीने का वेतन न मिल पाए। यदि यह बड़ा लाभ कमाने वाली कम्पनी थी तो पिछले 2 सालों में अचानक ऐसी कौन सी आपात स्थिति आ गयी कि इतनी बड़ी कम्पनी को अपने कर्मचारियों को तनख्वाह देने के लाले पड़ गए हैं? दो साल पहले तक लाभ कमाने वाली कंपनी को सरकार ने बुरी हालत में पहुंचा दिया।
अपने मित्र पूंजीपति की एक कंपनी को फायदा पुहचाने के लिए लाखों कर्मचारियों के परिवारों को दर दर की ठोकर खाने पर मजबूर किया जा रहा है।

योग दिवस मनाएं या दिमागी बुखार से लड़ें ?

देश का प्रधानमंत्री एक क्रिकेट खिलाड़ी के अंगूठे के फ़्रैक्चर पर ट्वीट कर अपनी चिंता जता रहा है , लेकिन अभी तक उन्होंने एक शब्द भी इन बच्चों की अकाल मृत्यु पर नही कहा! यह किस किस्म की संवेदनशीलता है ? चुनावी रैलियों में देश के कोने कोने में जाना वाला प्रधानमंत्री को मुजफ्फरपुर जाने का बिल्कुल भी समय नहीं है।

दाल का आयात और अडानी का कुचक्र !

मोदी सरकार ने 2016 में मोजाम्बिक से एक समझौता किया है। इसमें अगले पांच सालो के लिए मोजाम्बिक से तुअर और अन्य दालों का आयात दोगुना कर दो लाख टन प्रतिवर्ष करने को मंजूरी दी गयी थी। .यानी यहाँ उत्पादन कम हो या ज्यादा हो हमें दाल मोजाम्बिक से ही खरीदनी होगी। अफ्रीका से आयात होने वाली सारी दाल अडानी के ही पोर्ट पर उतरेगी ओर उसके भंडारण की व्यवस्था भी वही होगी। यानी पोर्ट पर कितनी भी दाल जमा हो सकती है। पोर्ट का विशेष दर्जा होने की वजह से चेकिंग होना भी मुश्किल है।

गिरीश कर्नाड: अभिव्यक्ति की सार्थक यात्रा

गिरीश ने कन्नड़ भाषा में अपनी रचनाएं लिखीं। जिस समय उन्होंने कन्नड़ में लिखना शुरू किया, उस समय कन्नड़ लेखकों पर पश्चिमी साहित्यिक पुनर्जागरण का गहरा प्रभाव था। लेखकों के बीच किसी ऐसी चीज़ के बारे में लिखने की होड़ थी जो स्थानीय लोगों के लिए बिल्कुल नयी थी। इसी समय कर्नाड ने ऐतिहासिक तथा पौराणिक पात्रों से तत्कालीन व्यवस्था को दर्शाने का तरीका अपनाया तथा काफ़ी लोकप्रिय हुए।