एनकाउंटर का पैटर्न यही है कि सबसे पहले तो एनकाउंटर किया जाता है वास्तविक अपराधियों का। हैदराबाद मामले में हो सकता है वास्तविक अपराधियों की ही हत्या पुलिस ने की हो। मगर बाद में एनकाउंटर होने लगते हैं मासूमों के, निर्दोषों के। फर्ज कीजिए कि किसी ने आपके बच्चे को रेप के झूठे केस में फंसा दिया और एनकाउंटर की मांग उठी तो क्या होगा? क्या हमारी पुलिस मासूमों के एनकाउंटर के लिए बदनाम नहीं है? अगर कानून में खामियां हैं, तो उसमें बदलाव की मांग कीजिए, अपने सांसद से। अगर न्याय प्रक्रिया धीमी है, तो उसमें सुधार की मांग कीजिए। लेकिन एनकाउंटर पर जश्न मनाना तो ठीक नहीं है। एनकाउंटर पर खुश होने वाले लोग वैसे ही हैं, जो बाबरी मस्जिद ढहाने पर खुश थे, नाच रहे थे। बाबरी मस्जिद के ढहने से और क्या क्या ढहा है, यह शायद हमें अगले दस बीस साल और देखना पड़े।