रवीश कुमार पर एक बहस

गौर से देखें तो प्रतिरोध का एक आंदोलन विकसित हो चुका है जो संगठित भले न हो, असरदार जरूर है। यह अखबारों, टीवी चैनलों, हर जगह सक्रिय है। सिद्धार्थ वरदाराजन, ओम थानवी, विनोद दुआ, निखिल वागले, उर्मिलेश, आरफा खानम, हरतोष सिंह बाल, राजेश प्रियदर्शी तथा जयशंकर गुप्त जैसे लोग लगातार लगे हैं। मुख्यधारा मीडिया से अलग रह कर कुमार प्रशांत जैसे लोग डटकर खड़े हैं। सोशल मीडिया पर तो देश भर में इतने लोग सत्ता-प्रतिष्ठान के भाड़े के सिपाहियों से लड़ रहे हैं कि उनकी गिनती संभव नहीं है। इनमें जाबिर हुसैन, अरूण माहेश्वरी-सरला माहेश्वरी, कैलाश मनहर, नूर मुहम्मद नूर, अनवर शमीम जैसे लोगों ने तो हर उपलब्ध विधा को अपना हथियार बना रखा है। इस आंदोलन में ललित सुरजन, सुनील तांबे जैसे अनुभवी पत्रकार हैं तो गिरीश मालवीय, हेमंत मालवीय, प्रणव प्रियदर्शी, धनंजय कुमार, साध्वी मीनू जैन, हेमंत कुमार झा, संतोष कुमार झा और अनिल जैन जैसे अपेक्षाकृत युवा भी। इनमें बिलक्षण रविदास, अनिल प्रकाश, विश्वंभर चौधरी, सौरभ वाजपेयी, रामशरण, डा योगेंद्र, चारूल जोशी जैसे सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। सामूहिक संघर्ष ही व्यक्तिवाद का विकल्प है।

यादों में कुलदीप नैय्यर!

अपने निधन के 15 दिन पहले उनके हाथों से हमने द्रोहकाल.काम शुरू कराया। यह उनका आखिरी सार्वजनिक कार्यक्रम था। मीडिया के पतन के इस दौर में वह हमारे हाथों में एक छोटा सा हथियार थमा कर गए। उन्हें हमारा नमन!

अब गांधीवादी भी शहरी नक्सल?

सावरकर और आरएसएस का इतिहास बताने तथा कश्मीर में धारा 370 के दो प्रावधानों को खत्म करने का विरोध करने के बाद गांधीवादी कायकर्ता और पत्रकार कुमार प्रशांत दो एफआईआर का सामना कर रहे हैं। उन पर देश के खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाया गया है। इससे यही जाहिर हो रहा है कि शासन तथा विचारधारा की आलोचना करने वाला हर आदमी सत्ताधीशों की नजर में अब शहरी नक्सली है।

गांधी-दर्शन को प्लास्टिक की थैली में कैद करने का अभियान

स्वच्छता को जिस तरह गांधी जी के अभियान को जोड़ा जा रहा है वह एक राजनीतिक साजिश है। गांधी जी सादगी और परस्पर सहयोग वाले जीवन जीने की शैली अपनाने पर जोर देते थे। गांधी जी के विचारों पर अमल करने का मतलब है कि प्लास्टिक संस्कृति और उपभोक्ता संस्कृति पर हमला। क्या मोदी सरकार इसके लिए तैयार है? विकास के नाम पर बेछूट उपभोग और ऐय्याशी को बढावा देने वाली सरकार से ऐसी उम्मीद करना भी निरर्थक है। भाजपा या संघ परिवार वाले सिर्फ कारपोरेट के फायदे के लिए गांधी जी के विचारों पर वार नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं । गांधी जी के विचारों के खिलाफ चल रही लड़ाई का उदाहरण है बढती भीड़- हिंसा के खिलाफ सरकार की खामोशी। यह खामोशी लालकिले से मोदी के संबोधन में भी दिखी।

‘भारत छोड़ो’: समाजवादी आंदोलन का एक चमकता पन्ना

जापान भारत के दरवाजे पर आ चुका था। लोगों को यह विश्वास हो गया था कि अंग्रेज उनकी रक्षा में असमर्थ हैं। बीच में, अमेरिकी दबाव में चर्चिल ने स्टै्रफर्ड क्रिप्स का मिशन को भारत भेजा। उसका कोई नतीजा नहीं निकला। गाँधी जी ने तय किया कि अंग्रेजों को भारत से जाने को कहा जाये। भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा ने लोगों के बीच एक नया उत्साह पैदा कर दिया। लेकिन ‘करो या मरो’ की घोषणा के आते ही दो महत्वपूर्ण बयान आ गए। एक सावरकर और दूसरा मोहम्मद अली जिन्ना का। सावरकर ने हिंदू महासभा के कार्यकर्ताओं को आंदोलन से दूर रहने के लिए कहा और जिन्ना ने आंदोलन को मुसलमानों की सुरक्षा के लिए खतरा बताया। उन्होंने आंदोलनकारियों को मुसलमानो से दूर रहने को कहा।

भारतीय लोकतंत्र को विपक्ष-मुक्त बनाने की कोशिश 

क्या सरकार की कोशिशों से विपक्ष भारतीय राजनीतिक परिदृश्य से गायब हो जाएगा? क्या चारों ओर सरकार की जय के नारे ही लगेंगे? देश के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो साफ हो जाएगा कि विपक्ष एक नई गोलबंदी के साथ उठ खड़े होने की कोशिश कर रहा है। यह नए चेहरे और नए स्वर के साथ उभर रहा है। संसद का बजट सत्र तो कम से काम यही बता रहा है। सबसे अहम बात है कि सरकार समझ रही है कि जनता को सूचना से वंचित करने और विरोध में आवाज उठाने वालां के खिलाफ पुलिस का इस्तेमाल कर वह असानी से राज करती रहेगी। लेकिन उसे इतिहास के पन्ने उलटना चाहिए। जनता का प़क्ष ही असली विपक्ष है। यह पक्ष कभी भी उभर सकता है।

एके रायः लोकतंत्र के उजले पक्ष के प्रतिनिधि

नई पीढी शायद ही विश्वास करेगी कि कई बार विधान सभा और संसद का सदस्य रहने वाले व्यक्ति के पास न कोई बैंक बैलेंस था और न ही कोई अपना मकान। वह 2012 तक अपनी पार्टी के कार्यालय में रहते थे और यह एक खपरैल का मकान था। बिना किसी सुविधा वाले एक छोटे से कमरे में उन्होंने उम्र गुजार दी और जब बीमारी ने लाचार कर दिया तो अपनी पार्टी के ही एक साधारण कार्यकर्ता के यहां जाकर रहने लगे। वह टायर का चप्पल पहनते थे जिसकी कीमत बहुत कम होती है और जिसमें पालिश करने की जरूरत नहीं होती है। यह देश के सबसे गरीब लोग पहनते हैं।

सत्ता पाने की बेकाबू होती बीमारी !

कर्नाटक या गोवा में जो हो रहा है उसे उस बीमारी का लक्षण मानना चाहिए जो भाजपा के सत्ता में लौटने से उभर कर आ रही है। भाजपा विप़क्ष को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है और सत्ता पाने की इसकी कामना ने इतना अधिक विस्तार ले लिया है कि यह विधानसभाओं से लेकर ग्राम पंचायतों तक में सत्ता में दीखना चाहती है। इसके कार्यकर्ता अब कहीं इंतजार नहीं कर सकते।

गांधी के सपनों पर हमला है यह बजट

इस बजट के जरिए मोदी सरकार-दो ने भारतीय चिंतनधारा और गाँधी के सपनों पर चौतरफा हमला किया है। इसके लिए उसने कई झूठ भी बोले हैं। वित्त मंत्री ने अप्रैल , 2018 से चल रही स्टडी इन इंडिया की स्कीम को अपनी नई योजना बता दी है। उन्होंने यह दावा किया कि भारत दुनिया में छठे नबर की अर्थव्यवस्था बन गई है, लेकिन यह बताना भूल गईं कि 1964 में ही भारत सातवें स्थान पर पहुंच गया था। इसके अलावा बजट में फरवरी, 2019 के आंकड़े ज्यों के त्यों रख दिए हैं और पिछले साल हुयी वास्तविक आमदनी और किये गए खर्च को छिपा लिया। बजट में ऐसे झूठ कभी नहीं बोले गए क्योंकि इस दस्तावेज की पवित्रता मे पहले की सरकारों का विश्वास था। यह सरकार सभी संस्थाओें की पवित्रता को नष्ट करने में लगी है।

बिहार के बच्चों को कौन मार रहा है?

मुजफ्फरपुर में सौ से अधिक बच्चों ने अपनी जान गँवा दी है। मीडिया में अभी भी यह डॉक्टरों की हड़ताल और वर्ल्ड कप की खबरों से पीछे है। मीडिया जितना बता रहा है, उससे ज्यादा छिपा रहा है। जापानी इन्सेफेलाइटिस की बीमारी से जुड़े हर पहलू पर शोध हो चुका है जिसमे लीची खाने से इसका सम्बन्ध भी शामिल है। लेकिन मीडिया और सरकार दोनों लोगों से सच्चाई छिपा रहे हैं। सच्चाई देश की स्वास्थ्य -व्यवस्था ही नहीं, सरकारी क्रूरता की पोल खोल देगी।