सत्ता पाने की बेकाबू होती बीमारी !

कर्नाटक या गोवा में जो हो रहा है उसे उस बीमारी का लक्षण मानना चाहिए जो भाजपा के सत्ता में लौटने से उभर कर आ रही है। भाजपा विप़क्ष को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है और सत्ता पाने की इसकी कामना ने इतना अधिक विस्तार ले लिया है कि यह विधानसभाओं से लेकर ग्राम पंचायतों तक में सत्ता में दीखना चाहती है। इसके कार्यकर्ता अब कहीं इंतजार नहीं कर सकते।

गांधी के सपनों पर हमला है यह बजट

इस बजट के जरिए मोदी सरकार-दो ने भारतीय चिंतनधारा और गाँधी के सपनों पर चौतरफा हमला किया है। इसके लिए उसने कई झूठ भी बोले हैं। वित्त मंत्री ने अप्रैल , 2018 से चल रही स्टडी इन इंडिया की स्कीम को अपनी नई योजना बता दी है। उन्होंने यह दावा किया कि भारत दुनिया में छठे नबर की अर्थव्यवस्था बन गई है, लेकिन यह बताना भूल गईं कि 1964 में ही भारत सातवें स्थान पर पहुंच गया था। इसके अलावा बजट में फरवरी, 2019 के आंकड़े ज्यों के त्यों रख दिए हैं और पिछले साल हुयी वास्तविक आमदनी और किये गए खर्च को छिपा लिया। बजट में ऐसे झूठ कभी नहीं बोले गए क्योंकि इस दस्तावेज की पवित्रता मे पहले की सरकारों का विश्वास था। यह सरकार सभी संस्थाओें की पवित्रता को नष्ट करने में लगी है।

बिहार के बच्चों को कौन मार रहा है?

मुजफ्फरपुर में सौ से अधिक बच्चों ने अपनी जान गँवा दी है। मीडिया में अभी भी यह डॉक्टरों की हड़ताल और वर्ल्ड कप की खबरों से पीछे है। मीडिया जितना बता रहा है, उससे ज्यादा छिपा रहा है। जापानी इन्सेफेलाइटिस की बीमारी से जुड़े हर पहलू पर शोध हो चुका है जिसमे लीची खाने से इसका सम्बन्ध भी शामिल है। लेकिन मीडिया और सरकार दोनों लोगों से सच्चाई छिपा रहे हैं। सच्चाई देश की स्वास्थ्य -व्यवस्था ही नहीं, सरकारी क्रूरता की पोल खोल देगी।

क्या हैं मोदी सरकार-2 के शुरूआती संदेश?

मीडिया मोदी सरकार-दो के आगमन को दिखा कर भी दिखा नहीं पाया क्योंकि वह इस घटना के कारण भारतीय राजनीति के बदलते चित्र पर नजर डालने में नाकामयाब रहा। लेकिन इसके शुरूआती संदेश आने वाली राजनीति की दिशा बताते हैं। मोदी-शाह की जोड़ी ने मंत्रियों के चयन से बता दिया है कि भाजपा की नहीं उनकी सरकार है और इसमें उदारता के लिए जगह नहीं होगी।

भाजपा की लड़ाई वंशवाद से नहीं, कांग्रेस की विचारधारा से है!

कांग्रेस का इतिहास ही भाजपा के विजय-अभियान में बाधक है। भाजपा और संघ परिवार इतिहास की इस शक्ति को पहचानता है। जरूरत इस बात की है कि कांग्रेस अपनी शक्ति पहचाने और वैचारिक ढुलमुलपन छोड़ कर एक स्पष्ट राजनीतिक लाइन तय करे। मोदी-शाह की जोड़ी नेहरू और उनकी विरासत पर और भी वार करेगी।  प्रज्ञा ठाकुर के जरिए गांधी पर भी हमला जारी रहने वाला है। कांग्रेस आजादी के आंदोलन की उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व  करती है जिसे नष्ट करना संघ परिवार का लक्ष्य है। संघ परिवार के वैचारिक अभियान में कांग्रेस की विचारधारा ही बाधक है।  इन दोनों विचराधाराओं में संघर्ष ही आगे आने वाली राजनीति  का मुख्य हिस्सा होगा।

इस बहुमत का नकाब उतरना चाहिए !

मोदी ने झूठ से भरे और निचले स्तर के भाषण किए और पैसे तथा नौकरशाही के इस्तेमाल में कोई कसर नहीं छोड़ा। लेकिन वही मोदी लोकप्रिय साबित हुए क्योंकि कारपोरेट पूंजीवाद उनके पीछे खड़ा था। मीडिया, सोशल मीडिया और प्रचार में उन्होंने हजारों करोड़ खर्च किया और झूठ को सच साबित करने मे कामयाब हुए। अब उनकी जीत का औचित्य साबित करने की कोशिश होगी और पराजित विपक्ष भी अपने को लोकतांत्रिक तथा उदार साबित करने के लिए चुनाव अभियान में अपनाई गई अनैतिकता और बेईमानी की चर्चा करना बंद कर देगा। लेकिन इसकी चर्चा करने का असली समय यही है। इस बहुमत का नकाब उतरना चाहिए।

आखिर चुनाव आयोग फेल क्यों हुआ ?

चुनाव आयोग अब लोकतंत्र का रक्षक नहीं रहा। वह एक ऐसी प्रबंधन-संस्था में तब्दील हो चुका है जिसका काम सिर्फ ईवीएम मशीन पहुंचाना, बूथों पर सुरक्षा या पुलिस बल तैनात करना और लोगों को लाइन में लगा कर मतदान कराना है। कारपोरेट की दलाली में नीरा राडिया के सहयोगियों पर नजर डालें तो साफ हो जाएगा कि मोदी सरकार ने उन्हें किनारे करने के बदले ऊंचे-ऊंचे पदों से नवाजा है। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा भी उन्हीं में से एक हैं। कारपोरेट के नुमाइंदों और आरएसएस के काडर की तरह काम करने वाली नौकरशाही से आप संविधान की रक्षा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? दोनों की दुश्मनी संविधान से है।

साध्वी प्रज्ञाः मोदी का अंतिम अस्त्र

साध्वी का बीच चुनाव में उतरना एक ओर हिंदुत्व  ब्रिगेड के चुनाव हार जाने का भय दिखाता है और दूसरी ओर यह भी दिखाता है कि वह ध्रुवीकरण  की राजनीति को ही अंतिम उपाय मान रहा है। पिछले पांच सालों में, संघ के संगठनों ने गोरक्षा के नाम पर माब लिंचिंग,  राम मंदिर आंदोलन को फिर से ख़ड़ा करने और कुंभ जैसे मेले के राजनीतिक इस्तेमाल के कई प्रयोग किए, लेकिन उन्हें इसमें खास सफलता नहीं मिली। साध्वी उनके जखीरे का पुराना हथियार है। गुजरात में मोदी ने दंगाइयों को राजनीति में जगह दी थी, अब आतंकवादी हमले के आरोपी को उन्होंने मैदान में उतार दिया है।

आज भी युद्धरत हैं डॉ आंबेडकर !

डा बाबा साहेब आंबेडकर भारत की आजादी के आंदोलन के वैसे योद्धा हैं जो अपनी मृत्यु के बाद भी युद्धरत हैं। अपनी प्रासंगिकता के कारण वह दुनिया की उन महान विभूतियोेें के बीच खड़े हैं जिनके लिए इतिहास और वर्तमान का फर्क मिट चुका है। वह आज भी उस आबादी की आवाज बने हुए हैं जिसकी आवाज सैंकड़ों साल तक छिनी रही। जब तक वर्ण और जाति की क्रूर व्यवस्था बनी रहेगी, डा आंबेडकर इससे लड़ने के लिए मौजूद रहेेंगे। आज यह जरूरी है कि आरएसएस और भाजपा जैसी सांप्रदायिक और समानता-विरोधी शक्तियों को पारजित किया जाए और संविधान को बचाया जाए। ऐसे में, बाबा साहेब सबसे बड़े प्रेरणा-स्रोत हैं।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला तो रफाल से काफी आगे जाता है !

देश का मीडिया रफाल सौदे से संबंधित गोपनीय दस्तावेजों के प्रकाशन के प्रेस के अधिकार को सही ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की चर्चा  सीमित रूप में कर रहा है। जस्टिस जोसेफ ने अपने फैसले में प्रेस की आजादी, सामान्य नागरिकोें की अभिव्यक्ति की आजादी और सूचना पाने के अधिकार को लोकतंत्र में  सबसे ऊपर माना है । उन्होंने  न केवल सरकार की ओर से आने वाली हर बाधा को दूर करने का कानूनी रास्ता निकाला  है बल्कि उन गैर-सरकारी बाधाओं को भी दूर करने की जरुरत बताई है जो मीडिया के व्यापारीकरण और राजनीतिकरण से पैदा हुए हैं। उन्होंने संविधान और लोकतंत्र के विरोध में खडे हो गए मीडिया के इस हिस्से, जो वर्तमान में इसकी मुख्यधारा है, की ओर हमारा ध्यान खींचा है।