इस बहुमत का नकाब उतरना चाहिए !

मोदी ने झूठ से भरे और निचले स्तर के भाषण किए और पैसे तथा नौकरशाही के इस्तेमाल में कोई कसर नहीं छोड़ा। लेकिन वही मोदी लोकप्रिय साबित हुए क्योंकि कारपोरेट पूंजीवाद उनके पीछे खड़ा था। मीडिया, सोशल मीडिया और प्रचार में उन्होंने हजारों करोड़ खर्च किया और झूठ को सच साबित करने मे कामयाब हुए। अब उनकी जीत का औचित्य साबित करने की कोशिश होगी और पराजित विपक्ष भी अपने को लोकतांत्रिक तथा उदार साबित करने के लिए चुनाव अभियान में अपनाई गई अनैतिकता और बेईमानी की चर्चा करना बंद कर देगा। लेकिन इसकी चर्चा करने का असली समय यही है। इस बहुमत का नकाब उतरना चाहिए।

आखिर चुनाव आयोग फेल क्यों हुआ ?

चुनाव आयोग अब लोकतंत्र का रक्षक नहीं रहा। वह एक ऐसी प्रबंधन-संस्था में तब्दील हो चुका है जिसका काम सिर्फ ईवीएम मशीन पहुंचाना, बूथों पर सुरक्षा या पुलिस बल तैनात करना और लोगों को लाइन में लगा कर मतदान कराना है। कारपोरेट की दलाली में नीरा राडिया के सहयोगियों पर नजर डालें तो साफ हो जाएगा कि मोदी सरकार ने उन्हें किनारे करने के बदले ऊंचे-ऊंचे पदों से नवाजा है। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा भी उन्हीं में से एक हैं। कारपोरेट के नुमाइंदों और आरएसएस के काडर की तरह काम करने वाली नौकरशाही से आप संविधान की रक्षा की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? दोनों की दुश्मनी संविधान से है।

साध्वी प्रज्ञाः मोदी का अंतिम अस्त्र

साध्वी का बीच चुनाव में उतरना एक ओर हिंदुत्व  ब्रिगेड के चुनाव हार जाने का भय दिखाता है और दूसरी ओर यह भी दिखाता है कि वह ध्रुवीकरण  की राजनीति को ही अंतिम उपाय मान रहा है। पिछले पांच सालों में, संघ के संगठनों ने गोरक्षा के नाम पर माब लिंचिंग,  राम मंदिर आंदोलन को फिर से ख़ड़ा करने और कुंभ जैसे मेले के राजनीतिक इस्तेमाल के कई प्रयोग किए, लेकिन उन्हें इसमें खास सफलता नहीं मिली। साध्वी उनके जखीरे का पुराना हथियार है। गुजरात में मोदी ने दंगाइयों को राजनीति में जगह दी थी, अब आतंकवादी हमले के आरोपी को उन्होंने मैदान में उतार दिया है।

आज भी युद्धरत हैं डॉ आंबेडकर !

डा बाबा साहेब आंबेडकर भारत की आजादी के आंदोलन के वैसे योद्धा हैं जो अपनी मृत्यु के बाद भी युद्धरत हैं। अपनी प्रासंगिकता के कारण वह दुनिया की उन महान विभूतियोेें के बीच खड़े हैं जिनके लिए इतिहास और वर्तमान का फर्क मिट चुका है। वह आज भी उस आबादी की आवाज बने हुए हैं जिसकी आवाज सैंकड़ों साल तक छिनी रही। जब तक वर्ण और जाति की क्रूर व्यवस्था बनी रहेगी, डा आंबेडकर इससे लड़ने के लिए मौजूद रहेेंगे। आज यह जरूरी है कि आरएसएस और भाजपा जैसी सांप्रदायिक और समानता-विरोधी शक्तियों को पारजित किया जाए और संविधान को बचाया जाए। ऐसे में, बाबा साहेब सबसे बड़े प्रेरणा-स्रोत हैं।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला तो रफाल से काफी आगे जाता है !

देश का मीडिया रफाल सौदे से संबंधित गोपनीय दस्तावेजों के प्रकाशन के प्रेस के अधिकार को सही ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की चर्चा  सीमित रूप में कर रहा है। जस्टिस जोसेफ ने अपने फैसले में प्रेस की आजादी, सामान्य नागरिकोें की अभिव्यक्ति की आजादी और सूचना पाने के अधिकार को लोकतंत्र में  सबसे ऊपर माना है । उन्होंने  न केवल सरकार की ओर से आने वाली हर बाधा को दूर करने का कानूनी रास्ता निकाला  है बल्कि उन गैर-सरकारी बाधाओं को भी दूर करने की जरुरत बताई है जो मीडिया के व्यापारीकरण और राजनीतिकरण से पैदा हुए हैं। उन्होंने संविधान और लोकतंत्र के विरोध में खडे हो गए मीडिया के इस हिस्से, जो वर्तमान में इसकी मुख्यधारा है, की ओर हमारा ध्यान खींचा है।

क्या मोदी विचार के राहुल-अखाड़े में उतरेंगे?

क्या चुनाव की बहस उस ओर लौट पाएगी जिस ओर कांग्रेस लौटी है। घोषणा-पत्र जाहिर होने के बाद वित्त मंत्री अरूण जेटली के बयान से साफ हो जाता है कि भाजपा हिंदुत्व और नकली राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लड़ेगी जिसमे पाकिस्तान, मुसलमान और सेना प्रमुख हैं। ये तीनों राम मंदिर के मुद्दे के लोक मानस में खारिज होने के बाद प्रमुखता में आए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह चुनाव मजाक और छिछोरेपन से भरे संवादों के सहारे लड़ना चाहते हैं, लेकिन राहुल गांधी उन्हें खींच कर विचार के अखाड़े में लाने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। ‘हम निभाएंगे’ घोषणा-पत्र उनकी इसी कोशिश को दिखाता है।

बीमार विचारों से उपजी मोदी की आक्रामकता

वार मेमोरियल, सर्जिकल स्ट्राइक और मिसाइल प्रक्षेपण को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में पेश करना एक गहरी बीमारी के लक्षण हैं।  भारत के प्रधानमंत्री की ओर से ‘घुस कर मारने’ की भाषा का इस्तेमाल करना भले ही सिनेमा और टेलीविजन के लिए मनोरंजक डायलाग हो, यह भारत जैसे महान देश को एक आत्मविश्वास से हीन देश के रूप में ही पेश करता है। यह आत्महीनता आजादी के आंदोलन से आरएसएस के दूर रहने और  इसके सांप्रदायिक चिंतन के कारण है। देशभक्ति के नाम पर इसे इस आत्महीनता को देश पर थोपने नहीं देना चाहिए।  उन्हें उन विचारों को स्थापित करने का मौका नहीं मिलना चाहिए जिसे भारत ने उस समय नकार दिया जब वह गुलामी की जंजीर में बंधा था।

अकेले नेहरू नहीं निशाने पर!

नेहरू-नेहरू की रट लगाने की बजाए इसे भी देखना चाहिए कि भाजपा और आरएसएस वाले बाकी व्यक्तित्वों पर इसी तरह का हमला कर रहे हैं। इसमें बाबा साहेब आंबेडकर भी शामिल हैं। उनके साथ वे वही कर रहे हैं जो उन्होेंने गांधी और नेहरू के साथ किया है। संघ से जुड़े लोग नहीं मानते कि डा आंबेडकर ने संविधान बनाया। वह संविधान बनाने का श्रेय आईसीएस अधिकारी बीएन राव को देते हैं जो संविधान सभा के सलाहकार थे। असल में, वे आज़ादी के आंदोलन की विचारधारा और बराबरी को सबसे ऊपर रखने वाले बाबा साहेब के संविधान के खिलाफ हैं।

प्रियंका को गंभीरता से लेना पड़ेगा!

भाजपा समर्थकों को इससे धक्का पहुंचेगा, लेकिन उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि आम लोग प्रियंका की तुलना मोदी से करेंगे। कामकाज और राजनीति के मामले में अभी यह तुलना तो हो नहीं पाएगी, लेकिन भाषण आदि के मामले मेे होगी। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि लोगोें के दिमाग में वह देश के नेता के विकल्प के रूप में मौजूद रही हैं। एक और बात यह है कि भाजपा में मोदी अकेले नेता हैं। वही नेता भी हैं और अनुयायी भी। इसलिए हर किसी की तुलना उन्हीं से होगी।

यह चुनाव बरसों याद रहेगा!

इस चुनाव को लोग बरसोें तक भूल नहीं पाएंगे। आखिर महाभारत रोज-रोज थोड़े होता है! इसमें मर्यादाएं टूटेंगी। हवाई अड्डेे, बंदरगाह, रेल, सड़क, जंगल, जमीन और नदी पर कब्जा पा लेने वालोें की थैली से चुनाव लड़ने वाले लोग सत्ता पर काबिज होने के लिए मीडिया से लेकर सभी तंत्रों का इस्तेमाल करेंगे। यह चुनाव लोकतंत्र बनाम तानाशाही, कारपोरेट बनाम लोकशक्ति और सांप्रदायिकता बनाम सेकुलरिज्म के बीच है। इस चुनाव में यह तय हो जाएगा कि भारतवासियों में अपने लोकतंत्र को बचाने की ऊर्जा बची है या नहीं।