नेहरू : जनता का राजकुमार

असल में नेहरू जनता के राजकुमार थे। लोगों के मन में उनकी छवि एक रोमांटिक नायक की थी जो सर्वशक्तिमान अंग्रेजों से मुकाबला कर सकता था। जब मैं बचपन में सुनी हुई कहानियों पर गौर करता हूं तो लोकस्मृति में उनकी नायक वाली यह तस्वीर साफ होकर उभरती है। इसके विपरीत संघ परिवार नेहरू को एक छिछोरा और देशद्रोही बताना चाहता है क्योंकि ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ युद्ध के नायक को लोगों की स्मृतियों से मिटाना उसकी राजनीतिक मजबूरी है। इसका सबसे खराब पहलू यह है कि वह इसके लिए झूठ का सहारा ले रहा है। यह युद्ध अभी जारी रहेगा। इस युद्ध में हम नेहरू के साथ खड़े हैं और इस नायक का वंदन करते हैं।

क्या कभी  मिटेगा बाबरी-ध्वंस का कलंक ?

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट से यह उम्मीद करना गलत था कि वह ऐसा फैसला देता जो सांप्रदायिक राजनीति को रोक लेता।   भारतीय लोकतंत्र पर धब्बे के रूप मौजूद बाबरी मस्जिद को ढहाने और दंगों में सैंकड़ों की जान लेने की घटना के दोषियों को सजा देकर ही देश की न्यायपालिका अपनी निष्पक्षता सिद्ध कर पाएगी। सुप्रीम कोर्ट को राममंदिर निर्माण के लिए बनाए जा रहे ट्रस्ट के गठन और कामकाज की मानिटरिंग करनी चाहिए ताकि इसमें दोषियों को जगह नहीं मिले । उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि मुसलमानों को पांच एकड़ जमीन सही जगह पर मिले।   क्या इससे मिटेगा बाबरी-ध्वंस का कलंक?  नहीं ,इसका एक ही रास्ता है कि लाखों हिन्दु अयोध्या में अपने हाथों से एक सद्भावना-मस्जिद बनायें।  

आबादी: एक राजनीतिक हथियार ?

उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों को यह समझना चाहिए कि बढी आबादी ने उन्हें अपने राजनीतिक अधिकारों से वंचित कर रखा है। संसद की सीटों की संख्या बढने से रोक दी गई है। इसका सीधा असर ज्यादा आबादी वाले  राज्यों के प्रतिनिधित्व  पर पड़ा है।  कम आबादी वाले राज्यों के अनुपात में ज्यादा आबादी वाले राज्यों के प्रतिनिधि कम हैं। यही नहीं, उनकी आबादी का बड़ा हिस्सा दूसरे राज्यांं के विकास तथा सेवा के लिए अपना श्रम दे रहा है। इससे बचने का एक ही उपाय है कि वह अपनी आबादी कम करे।

गुरूदास दासगुप्ताः उसूलों से बंधी जिंदगी

गुरूदास दासगुप्ता उसी कम्युनिस्ट पार्टी से निकले थे जिसे एक समय संसद में विश्वास नहीं था। जब आप गुजरे जमाने के कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट जन-प्रतिनिधियों पर नजर डालेंगे तो भारतीय संसदीय इतिहास के बारे में आपकी समझ बदल जाएगी। उन्होंने अपनी ईमानदारी और संसदीय क्षमता से देश की राजनीति को समृद्ध किया। हीरेन मुखर्जी, मधुलिमये, नाथ पै, सोमनाथ चटर्जी से लेकर गुरूदास दासगुप्ता तक एक लंबी सूची है। उन्होंने संविधान की शपथ ले ली तो इसे निभाया।

जनादेश का सबसे अच्छा सम्मान !

सबसे दिलचस्प घोषणा अमित शाह ने की-लोगों के  जनादेश का सम्मान करते हुए बीजेपी ने दुष्यंत की पार्टी से गठबंधन किया है।  हरियाणा का जनादेश था कि बहुमत नहीं मिले तो विपक्ष की किसी पार्टी को पकड़ लाओ और कुर्सी को हाथ से जाने न दो?  जनादेश को इतना अच्छी तरह कौन समझता है? प्रधानमंत्री मोदी ने कल अपने विजय समारोह में कह ही दिया था कि हरियाणा में अभूतपूर्व विजय  मिली है। 

क्यों न गांधीवादी अर्थव्यवस्था को एक मौका मिले ?

विकास-दर, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और समृद्धि के रोज आ रहे नए मंत्रों के बीच गांधी जी के ग्राम स्वराज और संयम वाली पवित्र अर्थव्यवस्था की आवाज कितना असरकारी है,यह कहना मुश्किल है। लेकिन प्रकृति-विनाश के इस भयानक संकट में यह पवित्र अवश्य लगती है क्योंकि यह उन लोगों की बात करती है जो असंगठित हैं और समृद्धि के दायरे से बाहर हैं। विषमता, भुखमरी और पर्यावरण विनाश वाली अर्थव्यवस्था को बदलने का काम वे ही कर सकते हैं।

रवीश कुमार पर एक बहस

गौर से देखें तो प्रतिरोध का एक आंदोलन विकसित हो चुका है जो संगठित भले न हो, असरदार जरूर है। यह अखबारों, टीवी चैनलों, हर जगह सक्रिय है। सिद्धार्थ वरदाराजन, ओम थानवी, विनोद दुआ, निखिल वागले, उर्मिलेश, आरफा खानम, हरतोष सिंह बाल, राजेश प्रियदर्शी तथा जयशंकर गुप्त जैसे लोग लगातार लगे हैं। मुख्यधारा मीडिया से अलग रह कर कुमार प्रशांत जैसे लोग डटकर खड़े हैं। सोशल मीडिया पर तो देश भर में इतने लोग सत्ता-प्रतिष्ठान के भाड़े के सिपाहियों से लड़ रहे हैं कि उनकी गिनती संभव नहीं है। इनमें जाबिर हुसैन, अरूण माहेश्वरी-सरला माहेश्वरी, कैलाश मनहर, नूर मुहम्मद नूर, अनवर शमीम जैसे लोगों ने तो हर उपलब्ध विधा को अपना हथियार बना रखा है। इस आंदोलन में ललित सुरजन, सुनील तांबे जैसे अनुभवी पत्रकार हैं तो गिरीश मालवीय, हेमंत मालवीय, प्रणव प्रियदर्शी, धनंजय कुमार, साध्वी मीनू जैन, हेमंत कुमार झा, संतोष कुमार झा और अनिल जैन जैसे अपेक्षाकृत युवा भी। इनमें बिलक्षण रविदास, अनिल प्रकाश, विश्वंभर चौधरी, सौरभ वाजपेयी, रामशरण, डा योगेंद्र, चारूल जोशी जैसे सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। सामूहिक संघर्ष ही व्यक्तिवाद का विकल्प है।

यादों में कुलदीप नैय्यर!

अपने निधन के 15 दिन पहले उनके हाथों से हमने द्रोहकाल.काम शुरू कराया। यह उनका आखिरी सार्वजनिक कार्यक्रम था। मीडिया के पतन के इस दौर में वह हमारे हाथों में एक छोटा सा हथियार थमा कर गए। उन्हें हमारा नमन!

अब गांधीवादी भी शहरी नक्सल?

सावरकर और आरएसएस का इतिहास बताने तथा कश्मीर में धारा 370 के दो प्रावधानों को खत्म करने का विरोध करने के बाद गांधीवादी कायकर्ता और पत्रकार कुमार प्रशांत दो एफआईआर का सामना कर रहे हैं। उन पर देश के खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाया गया है। इससे यही जाहिर हो रहा है कि शासन तथा विचारधारा की आलोचना करने वाला हर आदमी सत्ताधीशों की नजर में अब शहरी नक्सली है।

गांधी-दर्शन को प्लास्टिक की थैली में कैद करने का अभियान

स्वच्छता को जिस तरह गांधी जी के अभियान को जोड़ा जा रहा है वह एक राजनीतिक साजिश है। गांधी जी सादगी और परस्पर सहयोग वाले जीवन जीने की शैली अपनाने पर जोर देते थे। गांधी जी के विचारों पर अमल करने का मतलब है कि प्लास्टिक संस्कृति और उपभोक्ता संस्कृति पर हमला। क्या मोदी सरकार इसके लिए तैयार है? विकास के नाम पर बेछूट उपभोग और ऐय्याशी को बढावा देने वाली सरकार से ऐसी उम्मीद करना भी निरर्थक है। भाजपा या संघ परिवार वाले सिर्फ कारपोरेट के फायदे के लिए गांधी जी के विचारों पर वार नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं । गांधी जी के विचारों के खिलाफ चल रही लड़ाई का उदाहरण है बढती भीड़- हिंसा के खिलाफ सरकार की खामोशी। यह खामोशी लालकिले से मोदी के संबोधन में भी दिखी।