अरुण जेटली और चिदंबरम की बेमिसाल दोस्ती की दास्तान

अरुण जेटली और चिदंबरम की दोस्ती इतनी गहरी थी कि कई मौकों पर उन्होंने एक दूसरे की मदद करने के लिए दलीय हितों को अनदेखा और दलीय सीमाओं को पार करने में भी संकोच नहीं किया। इस सिलसिले मौजूदा केंद्रीय मंत्री और भाजपा के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी से जुडा मामला उल्लेखनीय और बेहद दिलचस्प है। बात करीब सात साल पुरानी यानी 2012 के आखिरी की है। गडकरी उस भाजपा के अध्यक्ष थे। पार्टी अध्यक्ष के रूप में यह उनका पहला कार्यकाल था, जो समाप्त होने वाला था। संघ का नेतृत्व चाहता था कि गडकरी को अध्यक्ष के रूप में दूसरा कार्यकाल भी मिले यानी 2014 का चुनाव भाजपा उन्हीं के नेतृत्व में लडे। लेकिन एक नाटकीय घटनाक्रम के चलते गडकरी दूसरी बार अध्यक्ष नहीं बन सके थे। उस घटनाक्रम से चिदंबरम भी परोक्ष रूप से जुडे हुए थे।

दो मंदिरों पर सुप्रीम कोर्ट के दो अलग अलग-अलग फैसले

एक ही सुप्रीम कोर्ट लेकिन दो मंदिरों को लेकर दो अलग-अलग फैसले। वजह? एक मंदिर को राजनीतिक सत्ता का उच्चस्तरीय संरक्षण हासिल है लेकिन दूसरे मंदिर के साथ ऐसा नहीं है। एक मंदिर में प्रवेश पाने के लिए लोगों को बाकायदा पैसे चुकाना पडते हैं, जबकि दूसरे मंदिर में प्रवेश के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। यानी एक मंदिर से खाए-अघाए लोगों का धंधा जुडा हुआ है और दूसरे मंदिर से गरीब और वंचित लोगों की आस्था। अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि देश की न्यायपालिका किसके साथ है और वह न्याय करती है या फैसले सुनाती है!

मोदी के नहले पर शर्मिष्ठा मुखर्जी का देहला

• सोनिया के बनने से बगावत रुकी
• मोदी के नहले पर शर्मिष्ठा मुखर्जी का देहला
• भाजपा के हौसलें सातवें आसमान पर
• बेखबर का भी दावा है खबरदार होने का
• मनमोहन सिंह का ही चुनाव क्यों?
• भाजपा को वोट न भी मिले तो क्या!
• चलते-चलते

चीन ने भारत को फिर अपमानित किया!

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने चीन बयान दिया कि भारत और चीन को एक दूसरे की चिंताओं का सम्मान करना चाहिए। चीन ने जयशंकर के बयान पर सकारात्मक प्रतिक्रिया जताने के बजाय उनकी चीन में मौजूदगी के दौरान ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मांग कर डाली कि कश्मीर मसले पर विचार करने के लिए सुरक्षा परिषद की ‘बंद कमरा बैठक’ बुलाई जाए। चीन का यह पैंतरा स्पष्ट रूप से भारत का अपमान है।

सुषमा स्वराज क्या वाकई इतनी महान थीं?

बेशक सुषमा स्वराज को उनके आमतौर पर शालीन और प्रभावी भाषणों, उनकी वाकपटुता, उनके सुरुचिपूर्ण वस्त्र-विन्यास और लंबे राजनीतिक जीवन के लिए याद किया जा सकता है, लेकिन सिर्फ इसी आधार उनकी समूचे राजनीतिक व्यक्तित्व का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। उनसे जुडे कई महत्वपूर्ण तथ्य और वाकये ऐसे हैं, जो उनके बारे में किए जा रहे उनके महिमा-गान और उनको दी गई उपमाओं का बेरहमी से खंडन करते हैं और उन्हें एक औसत नेता साबित करते हैं।

एवरेस्ट पर चढने की होड़ में भी अब पैसे का खेल

1953 मे जब शेरपा तेनजिंग और एडमंड हिलेरी पहली बार दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर सगरमाथा यानी माउंट एवरेस्ट पर पहुंचे थे, तब मानव सभ्यता के लिए यह एक दुर्लभ क्षण था। वे वहां पहुंच गए थे, जहां उनसे पहले कोई मानव नहीं जा सका था। अब तो हर साल एवरेस्ट पर पहुंचने वालों की तादाद बढती जा रही है। इस साल वहां अधिक संख्या में लोगों के पहुंचने की वजह काफी भीड हो गई थी, जिसकी वजह से वहां ट्रैफिक जाम सा माहौल बन गया था। इसके बाद खबर आई कि महज नौ दिनों में एवरेस्ट शिखर पर 16 पर्वतारोहियों की मौत हो गई। एवरेस्ट की चढाई का एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें कई पर्वतारोही रास्ते में पडे एक महिला के शव को लांघते हुए शिखर की ओर बढ रहे हैं। कहा जा सकता है कि हमारी सभ्यता के साथ ही हमारी निर्ममता और संवेदनहीनता भी भी उस एवरेस्ट शिखर पर पहुंच चुकी है।

मॉब लिंचिंग: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश भी सरकारों के ठेंगे पर

देश में उन्मादी भीड की हिंसा यानी मॉब लिंचिंग की बढती घटनाएं जिस तरह तेजी से बढती जा रही हैं, वह बेहद चिंतित करने वाली हैं। सवाल है कि अगर इस तरह के संवेदनशील मामलों में भी सरकारें सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को गंभीरता से नहीं लेंगी तो इस संकट से देश को कैसे निजात मिलेगी? सवाल यह भी है कि सरकारें इन घटनाओं को नजरअंदाज कर क्या देश को गृहयुद्ध में धकेलने का अपराध नहीं कर रही हैं? अभी जो कुछ चल रहा है वह एकतरफा है लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक नहीं बनी रह सकती। जिस दिन पीडित तबकों की ओर पलटवार शुरू हो जाएगा, तब कैसा भ्यावह परिदृश्य बनेगा, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है।

ट्रंप को माथे पर बिठाने से यही हासिल होना था!

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मोदी के हवाले से जो दावा किया है उससे भारतीय कूटनीति का लिजलिजापन ही उजागर हुआ है, जो कि स्पष्ट रूप से कूटनीति और घरेलू राजनीति के घालमेल का नतीजा है। अगर यह मान भी लें कि ट्रंप ने भारतीय प्रधानमंत्री के नाम से गलत बयानी की है तो हमें यह भी मानना होगा कि ऐसी हिमाकत भी वे हमारी कमजोर और दोषपूर्ण कूटनीति के चलते ही कर सके हैं।

अब निशाने पर आ सकता है मध्य प्रदेश

लोकसभा चुनाव में भाजपा को मध्य प्रदेश में मिली ऐतिहासिक सफलता से भाजपा नेताओं के हौंसले सातवें आसमान पर हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके मंत्री अपनी सरकार को लेकर चाहे जितना आश्वस्त हों, मगर कर्नाटक के घटनाक्रम को देखते हुए उनकी सरकार पर मंडरा रहे खतरे के बादल और ज्यादा गहराने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इस सिलसिले में मणिपुर और गोवा की मिसालें भी याद रखी जाना चाहिए। इन दोनों राज्यों में भाजपा का बहुमत या सबसे बडी पार्टी न होते हुए भी उसकी अगुवाई में सरकार बनाने के लिए जिस तरह संवैधानिक प्रावधानों और मान्य परंपराओं की अनदेखी देखी हुई, विधायकों की खरीद-फरोख्त की गई और राज्यपालों ने जिस तरह की भूमिका निभाई, उस सबको देखते हुए कुछ भी होना मुमकिन है।

ट्रंप पर मुकदमा: भारत की अदालतों के लिए नजीर है!

अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के करीब दो सौ सांसदों की ओर से अदालत में दायर अपील में कहा गया है कि अमेरिकी संविधान राष्ट्रपति को बिना संसद की अनुमति के किसी भी सरकार से कोई भी उपहार स्वीकार करने की इजाजत नहीं देता है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति रहते हुए संघीय सरकारों और विदेशों से उपहार लेते रहे हैं। अपील में यह भी आरोप लगाया गया है कि ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद भी संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करते हुए अपने कारोबारी रिश्ते खत्म नहीं किए हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के इन आरोपों पर ही अदालत ने मुकदमा चलाने की मंजूरी दी है। यह फैसला दुनिया भर की तमाम अदालतों, खासकर भारत की तो हर छोटी-बडी अदालत के लिए एक नजीर है, जिनकी भूमिका और विश्वसनीयता पर इन दिनों संदेह और विवादों के बादल मंडरा रहे हैं।