विपक्ष को उसके निकम्मेपन की सजा दी है जनता ने

दिमाग पर बहुत जोर डालने पर भी याद नहीं आता कि पिछले पांच साल के दौरान विपक्ष ने जनता से जुडे किसी भी मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए सडकों पर उतर कर कोई आंदोलन किया हो, पुलिस की लाठियां खाई हो या जेलें भरी हो। विपक्षी नेता इन मुद्दों पर सिर्फ मीडिया में बयान देने की रस्म अदायगी करते रहे। कुल मिलाकर विपक्षी दलों का सडक यानी जनता से नाता पूरी तरह टूट सा गया था और जनता ने भी अपनी ओर से चुनाव के जरिए विपक्षी दलों से अपना नाता तोड लिया।

कमलनाथ के पास बहुमत होना ही उनके टिके रहने की गांरटी नहीं!

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनकी पार्टी के अन्य नेता और मंत्री अपनी सरकार को लेकर चाहे जितना आश्वस्त हों, मगर 23 मई को चुनाव नतीजे अगर एग्जिट पोल्स के अनुमानों के मुताबिक आए तो उनकी सरकार पर मंडरा रहे खतरे के बादल और ज्यादा गहराने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इस सिलसिले में मणिपुर और गोवा की मिसाले याद रखी जाना चाहिए। इन दोनों राज्यों में भाजपा नीत सरकार बनाने के लिए जिस तरह संवैधानिक प्रावधानों और मान्य परंपराओं की अनदेखी देखी हुई, विधायकों की कथित तौर पर खरीद-फरोख्त की गई और राज्यपालों ने जिस तरह की भूमिका निभाई, उस सबको देखते हुए कुछ भी होना मुमकिन है।

कुछ ऐतिहासिक और दिलचस्प चुनावी मुकाबले

वैसे तो हर चुनाव अपने आप में महत्वपूर्ण होता हैं लेकिन उनमें भी कुछ मुकाबले और उनके नतीजे काफी दूरगामी महत्व के होते हैं। कुछ मुकाबले ऐसे भी होते हैं जो भारतीय लोकतंत्र की विशिष्टता को बयान करते हैं। पिछले 16 आम चुनावों के दौरान कई मुकाबले ऐसे हुए हैं, जो न सिर्फ बेहद रोचक रहे बल्कि उनके नतीजों ने देश की राजनीति को गहरे तक प्रभावित किया। ऐसे समय जब हम 17वें आम चुनाव के दौर से गुजर रहे हैं, अतीत में हुए उन चुनावी मुकाबलों पर गौर करना दिलचस्प होगा। आइए नजर डालते हैं कुछ महत्वपूर्ण चुनावी मुकाबलों पर-

एग्जिट पोल्स यानी सटोरियों और टीवी चैनलों का कारोबारी उपक्रम

ऐसा नहीं है कि एग्जिट पोल्स के नतीजे सिर्फ भारत में मुंह की खाते हो, विदेशों में भी ऐसा होता है, जहां पर कि वैज्ञानिक तरीकों से एग्जिट पोल्स किए जाते हैं। दावा तो हमारे यहां भी वैज्ञानिक तरीके से ही एग्जिट पोल्स करने का किया जाता है, लेकिन ऐसा होता नहीं है। हमारे यहां चुनाव को लेकर जिस बडे पैमाने पर सट्टा होता है और टेलीविजन मीडिया का जिस तरह का लालची चरित्र विकसित हो चुका है, उसके चलते एग्जिट पोल्स की पूरी कवायद सट्टा बाजार के नियामकों और टीवी मीडिया इंडस्ट्री के एक संयुक्त कारोबारी उपक्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। कभी-कभी सत्तारुढ दल भी इस उपक्रम में भागीदार बन जाता है। इसलिए एग्जिट पोल्स के अनुमानों को सिर्फ सस्ते मनोरंजन के तौर पर ही लिया जा सकता है।

चुनाव आयोग के पास अधिकार की नहीं, नैतिक बल की कमी!

यह सही है कि आयोग के पास अभी जितने अधिकार हैं, उससे ज्यादा होने चाहिए, लेकिन बात सिर्फ अधिकार से ही नहीं बनती। अधिकार के साथ-साथ चुनाव आयोग के पास ईमानदार इच्छा शक्ति और नैतिक बल का होना भी बेहद जरू री है। अगर ये चीजें नहीं हो तो अधिकार होते हुए भी कोई कुछ नहीं कर सकता और अगर ये दो चीजें हो तो सीमित अधिकारों के तहत भी अपने फर्ज को बेहतर तरीके से अंजाम दिया जा सकता है। अतीत में मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन और जेएम लिंगदोह इस बात को साबित कर गए हैं।

आडवाणी के इस अरण्यरुदन पर कौन कान देगा?

भाजपा के संस्थापकों में शुमार लालकृष्ण आडवाणी ने लम्बे समय बाद एक ब्लॉग लिखकर अपनी चुप्पी तोडते हुए कहा है कि उनकी पार्टी ने राजनीतिक रूप से असहमत होने वाले को कभी ‘राष्ट्र विरोधी’ नहीं माना है। देश के जिस राजनीतिक माहौल के मद्देनजर आडवाणी ने यह टिप्पणी की है, वह माहौल कोई आज-कल में नहीं बना है बल्कि पिछले चार-पांच वर्षों से बना हुआ है। सवाल है कि आडवाणी ने अपनी चुप्पी अभी ही क्यों तोडी? सत्ता के शीर्ष पर बैठे अपने पुराने शिष्य से क्या पाने की प्रत्याशा में वे पांच वर्ष तक मूकदर्शक बने रहे? सवाल यह भी है कि क्या आडवाणी का राजनीतिक आचरण वैसा ही उदात्त रहा है, जैसे उदात्त विचार वे अपने ब्लॉग में बयान कर रहे हैं?

एक से अधिक क्षेत्रों से चुनाव लडना क्या नैतिक रूप से सही है?

चर्चा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी इस बार दो जगह से चुनाव लडने जा रहे हैं। भारतीय राजनीति में एक से अधिक क्षेत्रों से चुनाव लडने की परंपरा नई नहीं है। जनधन का दुरुपयोग और मतदाताओं का अपमान करने वाली इस अनैतिक परंपरा की शुरुआत करने का श्रेय दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को जाता है, जिन्होंने अपनी संसदीय राजनीति की शुरुआत एक साथ तीन क्षेत्रों से चुनाव लड कर की थी।

कूटनीतिक मोर्चे पर खुली भारत के ढोल की पोल

इस्लामिक देशों के विदेश मंत्रियों के सम्मेलन में भारत की पहली बार शिरकत को सरकार ने पुलवामा हमले के संदर्भ में कूटनीतिक मोर्चे पर अपनी बडी उपलब्धि बताया। लेकिन वहां विदेश मंत्री सुषमा स्वराज मिले भाषण देने के मौके के अलावा भारत को कुछ हासिल नहीं हुआ। इस्लामी देशों के इस सबसे बडे संगठन भारत की चिंताओं पर जरा भी कान नहीं दिए और वह आधिकारिक तौर पर पूरी तरह पाकिस्तान के साथ खडा रहा।

इस्लामी देशों की महफिल में भारत के लिए मौका है!

कई पाकिस्तानी विश्लेषकों ने यह प्रचार शुरु कर दिया है कि पुलवामा कांड खुद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने करवाया है, क्योंकि इसी बहाने वे 2019 के चुनाव में अपनी सत्ता की नाव को डूबने से बचा सकते हैं। अब आईसीओ के सम्मेलन में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को इस प्रचार का करारा जवाब देना होगा। क्या वे अपने भाषण में पुलवामा के हमले के लिए पाकिस्तान को नाम लेकर जिम्मेदार ठहराएंगी? भारतीय विदेश मंत्री ने अगर वहां पुलवामा कांड के संदर्भ में पाकिस्तान का नाम लेने से परहेज किया तो उनका वहां जाना और भाषण देना वैसा ही जबानी जमा-खर्च हो जाएगा, जैसा सऊदी शाहजादे की भारत-यात्रा के दौरान हुआ और जैसा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा-परिषद द्वारा पारित निंदा प्रस्ताव में हुआ।

लोगों की जानें कब तक पीती रहेगी जहरीली शराब?

जहां शराबबंदी हो, वहां तो अवैध शराब का कारोबार चलना समझ में आता है, लेकिन शराब पर प्रतिबंध न होने के बावजूद ऐसे राज्यों में अवैध शराब के समानांतर तंत्र का अस्तित्व में होना हैरान करता है। आख़िर, देसी शराब बनाने से लेकर ठेकों तक पहुंचाने और वहां 20-25 रुपए से लेकर 40-50 रुपए तक अलग-अलग दामों पर बेचने का काम बडे पैमाने पर होता रहे और पुलिस को और प्रशासनिक अधिकारियों को इसकी भनक भी न हो, ऐसा तो हो नहीं सकता। शराब के नाम पर जो कुछ बनाया और बेचा जा रहा है, उसे जहर के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता। क्योंकि इसे बनाने के लिए इथेनॉल, मिथाइल एल्कोहल समेत ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन और यूरिया, आयोडेक्स जैसी तमाम खतरनाक रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है।