बहुत पुराना है कांग्रेस और शिवसेना के दोस्ताना रिश्तों का इतिहास

यह सही है कि भाजपा और शिवसेना का साथ तीन दशक से भी ज्यादा पुराना है। 1980 और 1990 के दशक में जब कोई भी पार्टी भाजपा से हाथ मिलाने में हिचकिचाती थी, तब शिवसेना ही वह पार्टी थी जिसने भाजपा के साथ महाराष्ट्र में गठबंधन कर उसका ‘अछूतोद्धार’ किया था। लेकिन इसके बावजूद अगर अब शिवसेना और कांग्रेस साथ आती हैं तो इसमें हैरानी या ताज्जुब जैसी कोई बात नहीं होगी, क्योंकि महाराष्ट्र की राजनीति में कांग्रेस और शिवसेना के सहयोगपूर्ण रिश्तों का इतिहास इससे भी पुराना है। पिछले तीन दशक की ही बात करें तो ऐसे कई मौके आए हैं जब शिवसेना ने भाजपा के साथ रहते हुए भी उसकी राजनीतिक लाईन से हटकर फैसले लिए और कांग्रेस का समर्थन किया।

कर्नाटक में उपचुनाव के लिए भाजपा को टीपू का आसरा!

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जहां-जहां प्रचार किया मोदी ने…!

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फडनवीस को अपने भविष्य के लिए खतरा मानते हैं अमित शाह!

महाराष्ट्र में जाहिरा तौर पर तो टकराव भाजपा और शिवसेना के बीच है लेकिन इस टकराव का एक सिरा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की महत्वाकांक्षा से भी जुडा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि देवेंद्र फडनवीस ही दोबारा मुख्यमंत्री बने। संघ नेतृत्व की स्वाभाविक पसंद भी फडनवीस ही हैं। लेकिन अमित शाह ऐसा कतई नहीं चाहते। वे अपने भविष्य की राजनीति के लिए फडनवीस को संभावित खतरे के रूप में देखते हैं। इसीलिए वे परोक्ष रूप से शिवसेना की जिद्द को हवा दे रहे हैं। दरअसल अमित शाह अपने भरोसेमंद चंद्रकांत पाटिल को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं। अगर शिवसेना ने अपनी जिद छोड भी दी तो वह इस शर्त पर भाजपा का मुख्यमंत्री स्वीकार करेगी कि फडनवीस की जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाया जाए। ऐसी स्थिति में अमित शाह के लिए पाटिल को मुख्यमंत्री बनवा पाना आसान हो जाएगा।

कश्मीर अंदरुनी मसला है तो फिर वहां यूरोपीय सांसदों का क्या काम?

तीन महीने पहले कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने पर जब पाकिस्तान ने हायतौबा मचाते हुए मामले को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया था तो भारत सरकार की ओर से कहा गया कि कश्मीर हमारा अंदरुनी मामला है और इसमें किसी भी बाहरी शक्ति का दखल मंजूर नहीं किया जाएगा। लेकिन यूरोपीय सांसदों को कश्मीर दौरा का करा करके क्या भारत ने अपनी ओर से भी औपचारिक तौर पर इस घरेलू और पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण नहीं कर दिया? सवाल यह भी है कि यह कैसा राष्ट्रवाद है, जिसमें भारत सरकार को कश्मीर जैसे अत्यंत संवेदनशील और निहायत घरेलू मसले पर एक एनजीओ और उससे जुडी एक बिजनेस ब्रोकर के जरिए अपनी स्थिति दुनिया के सामने स्पष्ट करना पड रही है? जिस कश्मीर में भारतीय सांसदों को जाने से सरकार रोक देती है, उसी कश्मीर में विदेशी सांसदों को पूरे सम्मान के साथ दौरा कराती है। क्या यह देश की संसद का अपमान और उसके सदस्यों के विशेषाधिकार का हनन नहीं है? आखिर इन यूरोपीय सांसदों के कश्मीर दौरे के जरिए भारत सरकार क्या पैगाम देना चाहती है?

उपचुनाव के नतीजों ने भी भाजपा को मायूस ही किया

आमतौर पर उपचुनाव स्थानीय मुद्दों पर ही लडे जाते हैं। लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा की तर्ज पर 17 राज्यों की 51 विधानसभा और दो लोकसभा सीटों के लिए उपचुनावों को भी भाजपा ने कश्मीर, धारा 370, सर्जिकल स्ट्राइक, तीन तलाक, एनआरसी, हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान आदि मुद्दों के सहारे जीतने की कोशिश की, लेकिन नतीजे उसकी अपेक्षा के अनुरूप नहीं आए। इन उपचुनावों में ज्यादातर सीटों पर भाजपा और उसके सहयोगी दलों को न सिर्फ हार का सामना करना पडा हैं बल्कि ऐसी कई सीटें गंवानी भी पडी है, जो पहले उनके ही पास थीं।

एक्जिट पोल से टीवी चैनलों की फिर भद्द पिटी

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यह जीत भी मोदी के लिए किसी झटके से कम नहीं

महाराष्ट्र और हरियाणा में चाकचौबंद सत्तारूढ भाजपा के मुकाबले विपक्ष जिस लुंजपुंज स्थिति में था, उसके बावजूद भाजपा की ताकत पहले से घटी है तो इसकी एकमात्र वजह यही है कि जनता ने कश्मीर, धारा 370, पाकिस्तान, सर्जिकल स्ट्राइक, जैसे मुद्दों के मुकाबले अपने रोजमर्रा के जीवन से जुडे मुद्दों को ही ज्यादा तरजीह दी और उसने भाजपा को संदेश दिया कि राष्ट्रवाद और अन्य भावनात्मक मुद्दे एक हद तक ही कारगर हो सकते हैं।

हरियाणा फतह करने के लिए भाजपा को हवाई मुद्दों का सहारा

हरियाणा में राज्य सरकार के खिलाफ लोगों में व्याप्त असंतोष का अंदाजा खुफिया रिपोर्टों के आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री तथा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी अच्छी तरह है। इसीलिए उन्होंने अपने चुनाव प्रचार का फोकस पूरी तरह अनुच्छेद 370, तीन तलाक, सर्जिकल स्ट्राइक, सेना के सम्मान और पाकिस्तान पर केंद्रित रखकर लोगों के असंतोष को थामने की कोशिश की है। उन्होंने अपने किसी भी भाषण देश की अर्थव्यवस्था या हरियाणा के किसी भी स्थानीय मुद्दे को नहीं छुआ।

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