चौटाला पर यह मेहरबानी क्यों?

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अब तो उनकी मांग है ‘कश्मीर की आजादी’, इससे कम कुछ नहीं!

श्रीनगर के सौरा में तमाम लोगों से बातचीत का लब्बवोलुआब यह है कि इलाके के बाशिंदों का विरोध प्रदर्शन जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के सरकार के फैसले को लेकर है, लेकिन अब उनके लिए अनुच्छेद 370 या विशेष दर्जा ज्यादा महत्व नहीं रखता। अब तो उनकी मांग है ‘कश्मीर की आजादी।’ इससे कम कुछ नहीं। साथ ही अब उन्हें अपने नौजवानों की गिरफ्तारी और फिर उनके उत्पीडन का भी भय है, जिससे बचने के लिए वे विरोध के इस सिलसिले को जारी रखे हुए हैं और किसी भी कीमत पर पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि अगर एक बार कमजोर पड गए तो फिर पता नहीं कितनों को उत्पीडन का शिकार होना पडेगा और यह सिलसिला कब तक जारी रहेगा।

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किले में तब्दील हुई श्रीनगर की एक बस्ती, माहौल है युद्ध का!

श्रीनगर में सौरा एक विशाल और सघन बस्ती है, जिसमें प्रवेश करने के सात रास्ते हैं। बस्ती में गलियां ही गलियां हैं बिलकुल भूलभुलैया की तरह। सौरा के युवकों ने सातों रास्तों को तरह-तरह की जुगाड से इस तरह बंद कर रखा है कि सुरक्षाबलों के लिए बस्ती में प्रवेश करना आसान नहीं है। कहीं पेड काटकर गिरा दिए हैं, तो कहीं रिलायंस समूह की जियो मोबाइल कंपनी द्वारा बिछाई जा रही भूमिगत केबल को उखाडकर उनसे रास्ते को बंद कर दिया गया है कहीं रास्ते को इस तरह खोद दिया गया है कि सुरक्षा बलों के वाहन बस्ती में प्रवेश न कर सके। कुल मिलाकर पूरी बस्ती एक किले में तब्दील कर दी गई है और बस्ती के बाहर भारी मात्रा में सुरक्षाबल तैनात हैं।

कश्मीर में पत्थरबाजी भी जारी है और बेगुनाहों का उत्पीडन भी

श्रीनगर के डाउनटाउन इलाके में वीडियो शूट करना या फिर कैमरे से तस्वीरें लेना भी बेहद जोखिम भरा काम है। ऐसा करने पर सुरक्षा बल के जवान एतराज जताने के साथ ही गिरफ्तारी भी कर सकते है। या फिर ऐसा करने वाला शख्स पहले से ही मीडिया से नाराज जनता के रोष का शिकार बन सकता है। इसी इलाके में सरकार के उस दावे की पोल भी खुल जाती है कि अब कश्मीर में कहीं पत्थरबाजी की घटनाएं नहीं हो रही हैं। स्थानीय पत्रकार बताते हैं कि यहां किसी भी वक्त पत्थरबाजी हो जाती है और इन दिनों भी रात के वक्त तो अक्सर होती ही रहती है। इस इलाके में मीडियाकर्मियों का घूमना या सडक पर किसी बात करना भी बेहद जोखिम भरा है। यह जोखिम दोतरफा है। स्थानीय नौजवान आपको कश्मीर में बाहर से आया पत्रकार या किसी सरकारी एजेंसी का आदमी समझकर आप पर पत्थर चला सकते हैं या फिर सुरक्षा बल के जवान आपको पत्थरबाज समझकर आपको गिरफ्तार कर सकते हैं, आपकी पिटाई कर सकते हैं या आपको पैलेट गन का निशाना बना सकते हैं।

सरकारी दावे के बिल्कुल उलट हैं कश्मीर घाटी के हालात

श्रीनगर तथा घाटी के अन्य इलाकों में सुबह ढाई-तीन घंटे की चहल-पहल के बाद पूरे दिन सन्नाटा पसरा रहता है। कुछ बेहद संवेदनशील इलाकों में तो हर क्षण गुस्साए नौजवानों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव की आशंका बनी रहती है। रात आठ बजते-बजते तो पूरे शहर में अघोषित कर्फ्यू लग जाता है। शहर के हर इलाके में सिर्फ और सिर्फ अर्ध सैनिक बलों के जवान तथा पेट्रोलिंग करते पुलिस तथा सुरक्षा बलों के वाहन ही सडकों पर दिखाई देते हैं। सुबह के वक्त जो उदास और लडखडाती चहल-पहल रहती है उसे ही सरकार की ओर से सामान्य स्थिति के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। ढिंढोरची टीवी चैनल भी मजबूरी की इसी चहल-पहल को या सामान्य दिनों के पुराने वीडियो फुटैज को दिखाकर ही कश्मीर घाटी में सब कुछ सामान्य होने का ढोल पीट रहे हैं।

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श्रीनगर हवाईअड्डा ही नहीं, बल्कि पूरा कश्मीर डिफेंस का है!

कभी धरती की जन्नत कहा जाने वाला कश्मीर फिलहाल धरती पर दोजख बना हुआ है। मौजूदा हालात में किसी आम आदमी का ही नहीं, बल्कि किसी मीडियाकर्मी का भी कश्मीर जाना बेहद जोखिम भरा है। इसकी दो अहम वजह है। एक तो सरकार और मुख्यधार के मीडिया, खासकर सरकार के ढिंढोरची बन चुके टेलीविजन चैनलों के प्रति कश्मीरी नौजवानों का गुस्सा और दूसरी वहां कदम-कदम पर सुरक्षा बलों की तैनाती। इन दोनों वजहों से कश्मीर घाटी के माहौल में गहरा तनाव पसरा हुआ है।

मोदी और इमरान के आज के भाषण पर टिकी हैं कश्मीरियों की निगाहें

वैसे तो संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के हर सालाना अधिवेशन में कश्मीर का मसला गूंजता है। लेकिन इस बार मामला थोडा अलग है। जम्मू-कश्मीर को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत हासिल विशेष राज्य का दर्जा खत्म किए जाने के भारत सरकार के फैसले से इस मसले का अनौपचारिक तौर अंतरराष्ट्रीयकरण हो चुका है। इस समय संयुक्त राष्ट्र महासभा का अधिवेशन जारी है, जिसमें भाग लेने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान न्यूयॉर्क में मौजूद है।

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