‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ यानी भारत की पराजय का उत्सव!

दुनिया में कोई भी देश या समाज कभी भी अपनी किसी पराजय का दिवस नहीं मनाता है बल्कि उस पराजय को भविष्य के लिए सबक के तौर पर अपनी स्मृतियों में रखता है। लेकिन भारत अब दुनिया का ऐसा पहला और एकमात्र देश हो गया है जो हर साल 14 अगस्त को अपनी पराजय का दिवस मनाएगा। गौरतलब है कि 74 वर्ष पहले 14 अगस्त के दिन ही पाकिस्तान नामक देश अस्तित्व में आया था, जो कि भारत के दर्दनाक विभाजन का परिणाम था। सांप्रदायिक नफरत और हिंसा के वातावरण में हुआ यह विभाजन महज एक देश के दो हिस्सों में बंटने वाली घटना ही नहीं थी बल्कि करीब दशक तक चले स्वाधीनता संग्राम के विकसित हुए उदात्त मूल्यों की, उस संग्राम में शहीद हुए क्रांतिकारी योद्धाओं के शानदार सपनों की और असंख्य स्वाधीनता सेनानियों के संघर्ष, त्याग और बलिदानों की ऐतिहासिक पराजय थी। उसी पराजय का परिणाम था- पाकिस्तान का उदय।

संसद वैसे ही चल रही है जैसे सरकार चलाना चाहती है!         

पिछले साल यानी 2020 में संसद मे पेश किया गया कोई भी विधेयक संबंधित मंत्रालय की संसदीय समिति को नहीं भेजा गया था। इस साल भी अभी तक यही स्थिति है। इस बार अनोखी स्थिति यह भी है कि शोर-शराबे के बीच सरकार औसतन सात मिनट के भीतर एक विधेयक पारित करा रही है। विपक्ष पेगासस जासूसी मामले और केंद्रीय कृषि कानूनों पर बहस की मांग कर रहा है, जिससे हंगामे की स्थिति पैदा हो रही है। सरकार इस ‘संसदीय आपदा’ को अपने लिए अवसर मानते हुए बिना बहस कराए धडल्ले से एक के बाद एक विधेयक पारित कराती जा रही है। वास्तव में संसद का, लोकतांत्रिक परंपराओं का जनता का अपमान इस तरह से विधेयक पारित कराने से हो रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री विपक्ष पर तोहमत जड रहे हैं। इससे जाहिर होता है कि सरकार संसद को अपने रसोईघर की तरह इस्तेमाल कर रही है, जहां वही पक रहा है जो सरकार चाहती है।

विकास पुरुष की छवि के सहारे विनाश के एजेंडे पर अमल

अपने जीवन के आठवें दशक में प्रवेश कर रहे नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में यह सातवां साल है। पिछले छह वर्षों के दौरान देश के भीतर बना जातीय और सांप्रदायिक तनाव-टकराव का समूचा परिदृश्य गृहयुद्ध जैसे हालात का आभास दे रहा है, जिसके लिए पूरी तरह उनकी सरकार और पार्टी की विभाजनकारी राजनीति जिम्मेदार है।

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