ट्रंप पर मुकदमा: भारत की अदालतों के लिए नजीर है!

अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के करीब दो सौ सांसदों की ओर से अदालत में दायर अपील में कहा गया है कि अमेरिकी संविधान राष्ट्रपति को बिना संसद की अनुमति के किसी भी सरकार से कोई भी उपहार स्वीकार करने की इजाजत नहीं देता है, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति रहते हुए संघीय सरकारों और विदेशों से उपहार लेते रहे हैं। अपील में यह भी आरोप लगाया गया है कि ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के बाद भी संवैधानिक प्रावधानों की अनदेखी करते हुए अपने कारोबारी रिश्ते खत्म नहीं किए हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के इन आरोपों पर ही अदालत ने मुकदमा चलाने की मंजूरी दी है। यह फैसला दुनिया भर की तमाम अदालतों, खासकर भारत की तो हर छोटी-बडी अदालत के लिए एक नजीर है, जिनकी भूमिका और विश्वसनीयता पर इन दिनों संदेह और विवादों के बादल मंडरा रहे हैं।

मोदी उस आपातकाल से इस आपातकाल को ढंकने की कोशिश करते हैं!

एक राजनीतिक कार्यकर्ता होते हुए भी आपातकाल से अछूते रहने के बावजूद अगर नरेंद्र मोदी मौके-बेमौके आपातकाल को चीख-चीखकर याद करते हुए कांग्रेस को कोसते हैं तो इसकी वजह उनका अपना यह ‘आपातकालीन’ अपराध बोध ही हो सकता है कि वे आपातकाल के दौर में कोई सक्रिय भूमिका निभाते हुए जेल क्यों नहीं जा सके! आपातकाल के नाम पर उनकी चीख-चिल्लाहट को उनकी प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी नाकामियों को छुपाने की कोशिश के रुप में भी देखा जा सकता है। यह भी कहा जा सकता है कि मोदी कांग्रेस को कोसने के लिए गाहे-बगाहे आपातकाल का जिक्र अपने उन कार्यों पर नैतिकता का पर्दा डालना चाहते हैं, जिनकी तुलना आपातकालीन कारनामों से की जाती है। मसलन संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, सतर्कता आयोग, सूचना आयोग, रिजर्व बैंक जैसी महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्ता का अपहरण।

लोग गरमी से नहीं, व्यवस्था की काहिली से मरते हैं!

व्यवस्था तंत्र के शीर्ष पर बैठे राजनेता एक किक्रेट खिलाडी के अंगूठे की चोट पर तो अफसोस जाहिर करते हैं लेकिन मौसम के सितम से मरने वालों पर संवेदना के दो बोल भी उनके मुंह से नहीं फूटते। देश की संसद में ‘जय श्रीराम’, ‘हर-हर महादेव’, ‘राधे-राधे’, ‘अल्लाह हु अकबर’ के नारों से सांसद एक दूसरे पर फब्तियां कसते हैं, राष्ट्रपति के अभिभाषण में देश की गुलाबी तस्वीर पेश की जाती है, लेकिन इन मौतों का जिक्र कोई नहीं करता। संसद की यह स्थिति उसके आवारा और बदचलन होने की तसदीक करती है। देश का मीडिया खासकर टेलीविजन के चौबीसों घंटे चलने वाले खबरिया चैनलों की बदतमीजी, बदचलनी और बदनीयती की कहानी तो पुरानी है ही।

गरमी के कहर को किसने बनाया जानलेवा?

देश के विभिन्न हिस्सों में बडी संख्या में लोग गरमी की वजह से मौत का शिकार बनते हैं लेकिन उनकी खबर तक नहीं बन पाती। गरीब तबके के पास गरमी से मुकाबला करने के पर्याप्त बुनियादी इंतजाम नहीं होते। करोडों परिवार ऐसे हैं जिनके पास पंखे-कूलर जैसी सुविधा भी नहीं है। पीने का साफ पानी नहीं है। लू लगने पर उन्हें पर्याप्त चिकित्सा सुविधा भी नहीं मिल पाती। ऐसे में गरमी गरीब को निगल जाती है। इस स्थिति की इसकी बड़ी वजह हमारी भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक नेतृत्व की काहिली तो है ही, इसके साथ ही एक अन्य वजह यह भी है कि मौसम से लड़ने वाला हमारा सामाजिक तंत्र भी अब कमजोर हो गया है।

विपक्ष को उसके निकम्मेपन की सजा दी है जनता ने

दिमाग पर बहुत जोर डालने पर भी याद नहीं आता कि पिछले पांच साल के दौरान विपक्ष ने जनता से जुडे किसी भी मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए सडकों पर उतर कर कोई आंदोलन किया हो, पुलिस की लाठियां खाई हो या जेलें भरी हो। विपक्षी नेता इन मुद्दों पर सिर्फ मीडिया में बयान देने की रस्म अदायगी करते रहे। कुल मिलाकर विपक्षी दलों का सडक यानी जनता से नाता पूरी तरह टूट सा गया था और जनता ने भी अपनी ओर से चुनाव के जरिए विपक्षी दलों से अपना नाता तोड लिया।

कमलनाथ के पास बहुमत होना ही उनके टिके रहने की गांरटी नहीं!

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनकी पार्टी के अन्य नेता और मंत्री अपनी सरकार को लेकर चाहे जितना आश्वस्त हों, मगर 23 मई को चुनाव नतीजे अगर एग्जिट पोल्स के अनुमानों के मुताबिक आए तो उनकी सरकार पर मंडरा रहे खतरे के बादल और ज्यादा गहराने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। इस सिलसिले में मणिपुर और गोवा की मिसाले याद रखी जाना चाहिए। इन दोनों राज्यों में भाजपा नीत सरकार बनाने के लिए जिस तरह संवैधानिक प्रावधानों और मान्य परंपराओं की अनदेखी देखी हुई, विधायकों की कथित तौर पर खरीद-फरोख्त की गई और राज्यपालों ने जिस तरह की भूमिका निभाई, उस सबको देखते हुए कुछ भी होना मुमकिन है।

कुछ ऐतिहासिक और दिलचस्प चुनावी मुकाबले

वैसे तो हर चुनाव अपने आप में महत्वपूर्ण होता हैं लेकिन उनमें भी कुछ मुकाबले और उनके नतीजे काफी दूरगामी महत्व के होते हैं। कुछ मुकाबले ऐसे भी होते हैं जो भारतीय लोकतंत्र की विशिष्टता को बयान करते हैं। पिछले 16 आम चुनावों के दौरान कई मुकाबले ऐसे हुए हैं, जो न सिर्फ बेहद रोचक रहे बल्कि उनके नतीजों ने देश की राजनीति को गहरे तक प्रभावित किया। ऐसे समय जब हम 17वें आम चुनाव के दौर से गुजर रहे हैं, अतीत में हुए उन चुनावी मुकाबलों पर गौर करना दिलचस्प होगा। आइए नजर डालते हैं कुछ महत्वपूर्ण चुनावी मुकाबलों पर-

एग्जिट पोल्स यानी सटोरियों और टीवी चैनलों का कारोबारी उपक्रम

ऐसा नहीं है कि एग्जिट पोल्स के नतीजे सिर्फ भारत में मुंह की खाते हो, विदेशों में भी ऐसा होता है, जहां पर कि वैज्ञानिक तरीकों से एग्जिट पोल्स किए जाते हैं। दावा तो हमारे यहां भी वैज्ञानिक तरीके से ही एग्जिट पोल्स करने का किया जाता है, लेकिन ऐसा होता नहीं है। हमारे यहां चुनाव को लेकर जिस बडे पैमाने पर सट्टा होता है और टेलीविजन मीडिया का जिस तरह का लालची चरित्र विकसित हो चुका है, उसके चलते एग्जिट पोल्स की पूरी कवायद सट्टा बाजार के नियामकों और टीवी मीडिया इंडस्ट्री के एक संयुक्त कारोबारी उपक्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। कभी-कभी सत्तारुढ दल भी इस उपक्रम में भागीदार बन जाता है। इसलिए एग्जिट पोल्स के अनुमानों को सिर्फ सस्ते मनोरंजन के तौर पर ही लिया जा सकता है।

चुनाव आयोग के पास अधिकार की नहीं, नैतिक बल की कमी!

यह सही है कि आयोग के पास अभी जितने अधिकार हैं, उससे ज्यादा होने चाहिए, लेकिन बात सिर्फ अधिकार से ही नहीं बनती। अधिकार के साथ-साथ चुनाव आयोग के पास ईमानदार इच्छा शक्ति और नैतिक बल का होना भी बेहद जरू री है। अगर ये चीजें नहीं हो तो अधिकार होते हुए भी कोई कुछ नहीं कर सकता और अगर ये दो चीजें हो तो सीमित अधिकारों के तहत भी अपने फर्ज को बेहतर तरीके से अंजाम दिया जा सकता है। अतीत में मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन और जेएम लिंगदोह इस बात को साबित कर गए हैं।

आडवाणी के इस अरण्यरुदन पर कौन कान देगा?

भाजपा के संस्थापकों में शुमार लालकृष्ण आडवाणी ने लम्बे समय बाद एक ब्लॉग लिखकर अपनी चुप्पी तोडते हुए कहा है कि उनकी पार्टी ने राजनीतिक रूप से असहमत होने वाले को कभी ‘राष्ट्र विरोधी’ नहीं माना है। देश के जिस राजनीतिक माहौल के मद्देनजर आडवाणी ने यह टिप्पणी की है, वह माहौल कोई आज-कल में नहीं बना है बल्कि पिछले चार-पांच वर्षों से बना हुआ है। सवाल है कि आडवाणी ने अपनी चुप्पी अभी ही क्यों तोडी? सत्ता के शीर्ष पर बैठे अपने पुराने शिष्य से क्या पाने की प्रत्याशा में वे पांच वर्ष तक मूकदर्शक बने रहे? सवाल यह भी है कि क्या आडवाणी का राजनीतिक आचरण वैसा ही उदात्त रहा है, जैसे उदात्त विचार वे अपने ब्लॉग में बयान कर रहे हैं?