स्वदेशी मात्र इतना नहीं है कि हम देशी कंपनियों के सेलफोन,कंप्यूटर और कार  ना खरीदकर देशी कंपनियों की यही वस्तुए खरीदें या कोलगेट, हिंदुस्तान लीवर, प्रॉक्टर एंड गैंबल और आई टी सी के उत्पाद ना खरीदकर पतंजलि, डाबर और हिमालय के उत्पाद खरीद कर यह समझे कि स्वदेशी के प्रति अपना दायित्व पूरा हो गया। यह स्वदेशी की अपूर्ण बल्कि भ्रांत धारणा है।
  स्वदेशी का यह मतलब है कि हम पतंजलि और डाबर की दवाएं खरीदने के बजाय खादी और ग्रामोद्योग आयोग की आयुर्वेदिक दवाएं जैसे चवनप्राश ,आंवला चूर्ण और अगरबत्ती आदि खरीदें और यदि संभव हो तो स्थानीय व्यापारी से ही खरीदें ।रेडीमेड और ब्रांडेड कपड़े न  खरीद कर  स्थानीय स्तर पर कपड़े खरीद कर स्थानीय दर्जी से  सिलवाएं और गांधी जी का  स्वदेशी दर्शन तो यहां तक कहता है कि किसी स्थान पर एक ही वस्तु के दो व्यापारी हों तो छोटे  व्यापारी से सामान खरीदें।