बिगड़ती अर्थव्यवस्था में सोना किसी मुल्क की सबसे बड़ी ताकत भी है और कमजोरी भी है। ताकत इस तरह की जब देश का उद्योग व्यापार खुशहाल है। तब गरीबी बेरोजगारी घटती है, और देश का मुद्रा भंडार बढ़ता है। बैंकों का कर्जा वापस आता है। रिजर्व बैंक मजबूत होती है। कमजोरी यह है कि जब उद्योग, व्यापार मंद होता है, तब बेरोजगारी और दिवाला बढ़ता है। बैंकों व निवेशकों का पैसा डूबता है। सरकार कर्जदार बनती है। जनता को उद्योग, व्यापार, शेयर, रियल स्टेट सहित कहीं भी सुरक्षित निवेश की जगह नहीं दिखती है।

हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि आजादी के 72 वर्षों में पहली बार मोदी सरकार ने देश की आर्थिक दशा सुधारने के लिए रिजर्व बैंक से 1.76 लाख करोड़ रुपये ऋण पर लिए हैं। आज अर्थव्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। जनता लगातार सोना खरीदे जा रही है। सोना किसी भी देश की जनता तभी खरीदना शुरू करती है, जब उसका देश की करंसी पर से या कहें देश में निवेश से विश्वास टूटने लगता है।

सन् 2014 मई में नरेन्द्र मोदी सरकार एक नई आशा के साथ सत्ता में आई थी। उसने पहला काम यह किया कि वित्तमंत्री अरुण जेटली को बना दिया। जेटली एक बड़े वकील थे, वे कानून के जानकार थे। उन्होंने मोदी-शाह सहित भाजपा के कई नेताओं को अपनी कानूनी बुद्धिमत्ता से जेल से निकाला या बचाया था। वित्त  प्राप्त करना या उसका इंतजाम करना उनकी निजी या चुनाव जीताने की दलगत योग्यता हो सकती थी, लेकिन वो देश के हितों को सुरक्षित रखते हुए दुनिया से आर्थिक चुनाव जीतने के सर्वथा अयोग्य थे। वे देश की अर्थव्यवस्था की गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर बैठे हुए थे और गाड़ी गलत दिशा में चल रही थी।

दुर्घटना का घटना तय था। 8 नवम्बर 2016 की रात 8 बजे नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा कर दी। यह हमारी बिगड़ती अर्थव्यवस्था को संजीवनी की जगह दिया गया दूषित धीमा जहर था। जिसे संजीवनी बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा था। देश को स्वस्थ और मजबूत बनाने का स्वप्न दिखाया जा रहा था। जहर तो जहर था, उसने धीरे-धीरे सबको अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया। जिसने भी यह बताने की कोशिश की कि यह जहर है, उसे मोदी-मोदी के तेज स्वर में चुप करा दिया गया। बीमार का इलाज तो हुआ ही नहीं ऊपर से एक बहुत बड़े तबके के माथे पर जीएसटी अलग से थोप दी।

आज अर्थव्यवस्था विश्वव्यापी बन चुकी है, दुनिया इंसान की ऊंगलियों पर है, उसकी मुट्ठी में आ जाती है।  हम डॉलर, पौंड से तो मोदी सरकार के आते से ही पीटने लगे थे। इनकी बढ़ती कीमतों ने देश के इंपोर्ट को क्षति पहुंचाना शुरू कर दी। हमारे स्टील, कॉटन आदि अनेकानेक उद्योग चीन, जापान, यूरोप, अमेरिका से सामना नहीं कर पा रहे थे। वे मंदी के शिकार बन बंद होने की ओर बढ़ रहे थे। जनता के पास लोकतंत्र में इलाज की अन्य कोई व्यवस्था नहीं थी। उसे तो लोकतंत्र में चुन गए डॉक्टर से ही इलाज कराना था। डॉक्टर ने गलत इलाज कर दिया।

आज देश में दवा, डॉक्टर और अस्पताल के मकड़जाल में जिस तरह बीमार जनता फँसी हुई है, उससे भी कहीं ज्यादा सरकार, नेता और बिगड़ी अर्थव्यवस्था की चक्की में जनता पीस रही है। देश के बड़े-बड़े उद्योगपति धराशायी हो गए हैं, वे खड़े होने का स्वांग भर रच रहे हैं। अनिल अंबानी कभी के ढह चुके हैं, लेकिन सरकार है कि देश की सुरक्षा के लिए जरूरी रॉफेल जहाज उनसे बनवा रही है। वह कैसे और किस तरह बनवा रही है यह सब जानते हैं। अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का सरकार का यही तरीका अर्थव्यवस्था की दशा बिगाड़ रहा है।

नारायण मूर्ति सहित कई उद्योगपति हिम्मत करके सरकार की नीतियों के विरोध में बोल रहे हैं। अभी हाल ही में एक रिपोर्ट में आया है कि बजाज, एलएण्डटी, महिन्द्रा, मारुति सुजूकी, युनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस, टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, आईडीया, एयरटेल, ऑडी, नेशनल इंश्योरेंस, ओरियंएटल इंश्योरेंस जैसी कम्पनियां भारी आर्थिक मंदी का सामना कर रही हैं। अकेले ऑटोमोबाइल सेक्टर में चार लाख से ज्यादा लोग अपनी नौकरी गंवा चुके हैं। आईटी सेक्टर में करीब 35 से 40 फीसदी नौकरियां इस साल चली जाएंगी। ऑटो सेक्टर में आने वाले समय में 10 लाख नौकरियों में कमी आएगी। ऑटो सेक्टर सिर्फ ऑटो सेक्टर नहीं है इसमें टायर, ट्यूब, नट-बोल्ट से लेकर हजारों तरह के ऑटो  पार्ट्स  और वाहन बनते हैं। आज लाखों कारें शो रूम और कम्पनियों में खड़ी हुई हैं।

स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के चेयरमेन कह रहे हैं कि ‘‘इस मंदी में भगवान का ही सहारा है, मैं हर रोज जागता हूं, आसमान की तरफ देखता हूं, और प्रार्थना करता हूं कि वो वो इस संकट से उभारे।’’ बजाज के राजीव बजाज कह रहे हैं ‘‘ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री कोई चाय की दुकान नहीं है, जिसे रातों रात बंद करके चालू कर सकें।’’ बजाज के चेयरमेन राहुल बजाज ने कहा है कि ‘‘जब बाजार में मांग ही नहीं है, तो विकास क्या आसमान से उतरेगा।’’

सरकार सब कुछ जानकर भी अनजान बन रही है। वो हर वक्त राष्ट्रवाद, कश्मीर और पाकिस्तान का राग अलाप कर देश को मूल मुद्दों से भटका रही है। लेकिन यह कब तक चलेगा? राम मंदिर आंदोलन 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद खत्म हो चुका है। तीन तलाक और धारा 370 की कहानी निपट चुकी है। एक मुद्दा समान नागरिक संहित बचा है। उसे भी यह सरकार जल्द लागू कर दे तो अच्छा है। जनता इसके पक्ष में है। सरकार का और गुणगान हो जाएगा।

इसके बाद देश असल मुद्दों पर आएगा। वैसे यह कहना गलत है कि मुद्दों की बात नहीं हो रही है। बात हो रही है और सब कर रहे हैं, क्योंकि चारों ओर सभी तो आर्थिक मंदी की बात कर रहे हैं। लेकिन मई 2019 विजय के बाद पुन: शुरू हुए मोदी-मोदी के स्वर ने इसे ढंक रखा है। लोकसभा की जीत को चार माह होने को आ रहे हैं। हनीमून पीरियड खत्म होने को है। इसके बाद जनता के दबे प्रश्न सामने आना शुरू हो जाएंगे।

ऐसे में यह सवाल भी उठते हैं कि मोदी नहीं तो विकल्प में कौन होगा? यह तो मई 2019 ने सिद्ध कर दिया है कि जब प्रतिपक्ष गैर जिम्मेदार होता है, तब जनता उससे बेहतर विकल्प चुन लेती है। इसलिए चुनावी हार-जीत के नजरिए से सब मूल्यांकन नहीं हो सकते हैं। आज देश की सबसे बड़ी कमजोरी विकल्पहीनता भी है। जो किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ लक्षण नहीं हैं। वैसे विकल्पहीनता सदैव नहीं रहती है।

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