थोड़ी देर के लिये अतीत में जाइये। अपनी आंखें बंद कीजिये और कल्पना कीजिये कि आप किसी कस्बे या छोटे शहर के किसी निजी अंग्रेजी स्कूल में बतौर छात्र छठी या सातवीं क्लास में बैठे हैं…कोई सर या मिस आपको हिस्ट्री पढा रहे हैं।

आपके सामने किताब है जो बेहद कीमती, चमकदार तो है ही, खालिस अंग्रेजी में भी है। उसी किताब से सर जी या मिस जी टूटी फूटी अंग्रेजी में हिन्दी मिला-मिला कर आपको पढा रहे हैं…”द वैदिक कल्चर”…”लाइफ एंड टीचिंग्स ऑफ लार्ड बुद्धा”…”द मौर्यन एंपायर”…या ऐसा ही कोई अध्याय।

अब आप कल्पना करें…कितनी बातें आपकी समझ में आ रही हैं? आपको अपने देश की महान सांस्कृतिक विरासतों के बारे में बताया जा रहा है। लेकिन, उस भाषा में जिसे न आपके पिता जान रहे हैं, न आपके दादा। आपके घर में कोई अच्छी अंग्रेजी नहीं जान रहा। कोई माहौल नहीं। जाहिर है, आपको अंग्रेजी में पढ़ाने वाले अच्छे शिक्षक भी उपलब्ध नहीं हैं।

जरा सोचिये…ऐसे बच्चे, जिनके पारिवारिक-सामाजिक बैकग्राउंड में अंग्रेजी है ही नहीं, कितने मानसिक दबावों को झेलते होंगे।

आपका स्कूल 5 हजार, 6 हजार मासिक वेतन पर टीचर बहाल करता है। इतने वेतन में ऐसा टीचर कैसे मिले जिसकी अंग्रेजी इतनी अच्छी हो कि वह बुद्ध, महावीर, अशोक, चंद्रगुप्त आदि के बारे में सुग्राह्य तरीके से अंग्रेजी में पढ़ा सके?

असल बात तो यह है कि हिन्दी पट्टी में अंग्रेजी आती कितनों को है? जिन्हें आती है वे 6-7 हजार में निजी स्कूल की चाकरी क्यों करें?

सितम यह कि आपको जाना अंग्रेजी स्कूल में ही है, पढ़ना अंग्रेजी में ही है, लिखना अंग्रेजी में ही है। लेकिन, न आपको अंग्रेजी आती है, न आपके बाप-दादा-चाचा को…और तो और…आपको पढ़ाने वाले शिक्षक को भी अंग्रेजी नहीं आती।

बस…लकीर पीटनी है सबको। निजी अंग्रेजी स्कूल का फैशन है। उसमें नहीं पढ़े तो फिर सब बेकार।

अब आप सोचिये…बुद्ध और अशोक के बारे में आपने क्लास रूम में क्या सीखा? वैदिक कल्चर के बारे में क्या जाना?

हां… कुछ फैक्ट्स जरूर रट लिये। परीक्षा ऑब्जेक्टिव टाइप की होगी जिसमें कुछ जरूरी सूचनाएं आपसे मांगी जाएंगी। मसलन…बुद्ध ने कहाँ तपस्या की, पहला उपदेश कहाँ दिया, उनके प्रमुख शिष्य का नाम क्या था…? आप सही जवाब दे देंगे…आपको फुल मार्क्स। रिजल्ट आएगा, आपके रिपोर्ट कार्ड में लिखा रहेगा कि सोशल साइंस में 90 परसेंट या हिस्ट्री में 92 परसेंट। आपके पिता खुश, मम्मी खुश…बेटा नाम करने वाला है।

लेकिन…कल्पना कीजिये…बतौर छात्र आप कितने दबावों से गुजरते हैं इस अंग्रेजी को लेकर। आपको अपने ही पूर्वजों के बारे में, उनकी विरासतों के बारे में, अपनी संस्कृति के बारे में अंग्रेजी में जानना-समझना है और तय है कि आप नहीं समझ पा रहे।

इसी तरह आप क्लास दर क्लास आगे बढ़ते जाते हैं लेकिन आपका इतिहास बोध, संस्कृति बोध उस अनुपात में विकसित नहीं हो पाता।

इस देश के गांवों, कस्बों, छोटे शहरों के 80 प्रतिशत निजी अंग्रेजी स्कूलों की यही हकीकत है, उनमें पढ़ने वाले अधिकतर बच्चों की यही हकीकत है।

नतीजा…सिर्फ पढ़ाई के माध्यम के कारण बहुत सारे बच्चे प्रतिभा रहने के बावजूद करियर की दौर में पिछड़ जाते हैं। अधकचरी अंग्रेजी उन्हें किसी लायक नहीं रहने देती। और…अति सामान्य प्रतिभा रहने के बावजूद इलीट क्लास के बहुत सारे बच्चे महज इसलिये करियर की दौड़ में आगे निकल जाते हैं कि उनकी अंग्रेजी का बैकग्राउंड बेहतर है, उनकी अंग्रेजी बेहतर है।

हमारे बच्चे बिना अपराध के लूजर बन जाते हैं। महज इसलिये कि अंग्रेजी का उनका बैकग्राउंड कमजोर है।

निजी अंग्रेजी स्कूलों से निकल कर ऊंची कक्षाओं में जाने वाले बच्चे कालेजों में फिर हिन्दी माध्यम में लौटते हैं। खास कर बिहार-यूपी में। लेकिन, अब स्थिति यह रहती है कि अंग्रेजी पर उनकी पकड़ तो नहीं ही बन पाई, हिन्दी में भी वे चौपट हैं। बचपन से जिस हिन्दी को हिकारत के भाव से देखा, अब उसी हिन्दी माध्यम में पढ़ना-लिखना…बीए लेवल की परीक्षा देना।

न हिन्दी में ठीक से लिख सकते हैं न अंग्रेजी में। भाषा ज्ञान और संप्रेषणीयता के मामले में नितांत अधकचरे बन कर रह गए। संस्कृति बोध और इतिहास बोध के मामले में खालिस चौपट हैं।

जो बच्चे तकनीकी या विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़े वे तो तब भी कुछ ठौर में हैं। भले ही, तकनीकी क्षेत्र में बेरोजगारी चरम पर है लेकिन रोजगार की लाइन में तो हैं। अधकचरा भाषा ज्ञान और चौपट संस्कृति या इतिहास बोध रास्ते का अवरोध तो नहीं बन रहा।

लेकिन, जो आर्ट्स विषयों में आगे बढ़े, उनमें से 80-85 प्रतिशत तो हर मामले में रिजेक्टेड माल बन कर देश, समाज और परिवार के लिये ही नहीं, खुद के लिये भी सवाल बन कर रह गए।

हमने जब मान ही लिया है कि अंग्रेजी में ही मुक्ति है तो हम अपने बच्चों को अंग्रेजी की गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के लिये क्यों नहीं जागरूक हैं? हम उस निजी स्कूल के प्रबंधन से सवाल क्यों नहीं करें कि जिसमें हमारे बच्चे नामांकित हैं? हम क्यों नहीं गौर करें कि हमारे बच्चों को कौन पढा रहा है, उसकी योग्यता क्या है, उसको वेतन कितना मिलता है।

हमारे बच्चे करियर की दौड़ में पिछड़ रहे हैं…प्रतिभा रहने के बावजूद…परिश्रम का माद्दा रहने के बावजूद। सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी के कारण। हम साधारण लोग हैं, गांव-कस्बों में रहते हैं, अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा बच्चों की स्कूल फीस, यूनिफार्म, किताबों पर खर्च करते हैं। लेकिन, हम अभिशप्त हैं कि हमारे बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा नहीं मिल रही, अच्छे शिक्षक नहीं मिल रहे।

जब से अंग्रेजी माध्यम वाले निजी स्कूलों की बाढ़ आई है, संस्कृति और इतिहास बोध से रहित युवाओं की पीढियां तैयार होने लगी हैं।

ऐसे युवाओं के मस्तिष्क में प्रतिगामी सांस्कृतिक मूल्यों का बीजारोपण करना आसान होता है, गलत ऐतिहासिक तथ्यों को दिमाग में बिठाना आसान होता है। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का ज्ञान ऐसे युवाओं पर अधिक प्रभावी होता है।

और…रोजगार के क्षेत्र में ऐसे युवा बाकायदा बेकार साबित होते हैं। याद कीजिये…’एसोचैम’ का वह वक्तव्य, जिसमें कहा गया है कि इस देश के 85 प्रतिशत सामान्य ग्रेजुएट और 75 प्रतिशत तकनीकी ग्रेजुएट रोजगार के लायक नहीं।

हिन्दी के लिये या अपनी मातृभाषा के सम्मान के लिये लड़िये, लेकिन इस अहसास के साथ कि यह लड़ाई हम हार चुके हैं। हमारे बच्चों की राह अंग्रेजी के बिना बहुत कठिन होने वाली है।

तो…जब प्रारंभिक कक्षाओं में भी शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी सिर पर थोप ही दी गई है, अंग्रेजी माध्यम के नाम पर निजी स्कूल मोटी फीस वसूल ही रहे हैं तो हमें यह भी देखना होगा कि हमारे बच्चों को कौन शिक्षक पढ़ा रहा है…”लाइफ एंड टीचिंग्स ऑफ लार्ड बुद्धा…।”

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