झारखंड के कम्युनिस्ट नेता एके राय नहीं रहे। उम्र और बीमारी ने उन्हें पिछले कई सालों से राजनीति से दूर कर दिया था। वैसे भी, सांप्रदायिकता और कारपोरेट के लिए चल रही राजनीति ने जिन लोगां को असली मायनों में पराजित किया उसमें एके राय भी थे। वे समझौता करने में विश्वास नहीं करते थे और इसके कारण उन्हें अपनी पार्टी सीपीएम से भी अलग होना पड़ा था, जबकि सच्चाई यही है कि वह कभी भी पार्टी के मूल सिद्धांतों से अलग नहीं हुए और उम्र भर गरीब आदिवासी और मजदूरों के लिए लड़ते रहे।
सवाल उठता है कि एके राय जैसे लोगों को क्यों याद करना चाहिए? ऐसे समय में राय जैसे लोगों को याद करना जरूरी है जब भोग और विलास में डूबे नेता मीडिया प्रचार के जरिए जनता के हीरो के रूप में घूम रहे हैं और बड़े-बड़े अमीरों को खुलेआम फायदा पहुंचाने वाले अपने को राष्ट्रभक्त बता रहे हैं। देशभक्ति का असली मतलब क्या होता है और ईमानदारी क्या चीज होती है, इसे समझना हो तो हमें राय जैसे लोगों के जीवन को पढना चाहिए। वे कलकत्ता विश्ववि़द्यालय से केमिकल इंजीनियरिग की पढाई कर बिहार के सिंदरी कारखाने में नौकरी करने आए थे। लेकिन मजदूरों के आंदोलन ने उन्हें अपनी ओर खींच लिया। वह 1961 में सिंदरी आए थे और 1967 में विधान सभा के लिए चुन लिए गए। वह तीन बार विधान सभा और तीन बार लोकसभा के लिए चुने गए। उन्हें सीपीएम ने 1971 में ही पार्टी से निकाल दिया था। लेकिन वह निर्दलीय के रूप में चुनाव जीतते रहे, वह भी धनबाद की सीट से जो अपनी माफिया राजनीति और हिंसा के लिए कुख्यात है। उन्होंने इंजीनियर का अपना कैरियर सत्ता के सुख के लिए नहीं छोड़ा था, बल्कि लोगों के लिए सेवा के लिए छोड़ा था। वह अलग झारखंड राज्य के आंदोलन के जन्मदाताओें में से थे, लेकिन नए राज्य ने सत्ता का जो दरवाजा खोला, उसमें राय ने कभी प्रवेश नहीं किया।
राय उस पीढी से आए थे जिसका बचपन आजादी के आंदोलन के बहादुरी भरे किस्सों को सुन कर बीता था। उसी पीढी ने पचास,साठ और सत्तर के दशक में एक नए भारत का सपना देखा था और इसके लिए अपना सब कुछ छोड़ने को तैयार था। राय ने अपना अच्छा कैरियर ही नहीं छोड़ा, बल्कि अविवाहित भी रहे। इस अविवाहित जीवन की तुलना आप उन लोगां के जीवन से नहीं कर सकते जो सिर्फ कहने को अविवाहित रहते हैं और जिंदगी भर मौज-मस्ती करते हैं। नई पीढी शायद ही विश्वास करेगी कि कई बार विधान सभा और संसद का सदस्य रहने वाले व्यक्ति के पास न कोई बैंक बैलेंस था और न ही कोई अपना मकान। वह 2012 तक अपनी पार्टी के कार्यालय में रहते थे और यह एक खपरैल का मकान था। बिना किसी सुविधा वाले एक छोटे से कमरे में उन्होंने उम्र गुजार दी और जब बीमारी ने लाचार कर दिया तो अपनी पार्टी के ही एक साधारण कार्यकर्ता के यहां जाकर रहने लगे। वह टायर का चप्पल पहनते थे जिसकी कीमत बहुत कम होती है और जिसमें पालिश करने की जरूरत नहीं होती है। यह देश के सबसे गरीब लोग पहनते हैं। वह सांसद और विधायक की पेंशन नहीं लेते थे। संसद में इससे संबंधित बिल का उन्होंने इस आधार पर विरोध किया था कि लोग सांसद सेवा करने के लिए बनते हैं, यह नौकरी नहीं है कि इसके लिए पेंशन ली जाए। उनकी पेंशन की रकम राष्ट्रपति के कोष में जमा होता था। आजकल कोई सन्यासी भी ऐसा सादा जीवन नहीं जीता है। गुरूमीत राम-रहीम सिंह और श्रीश्री रविशंकर से लेकर जग्गी वासुदेव जैसे हाई प्रोफाइल साधु हमारे सामने हैं। राजनीति में ऐसा उदाहरण तो शायद ही मिले। सत्ता की गरमी साधुओं को भी राजनीति मं खींच ले आई है। उनके मुंह से जो शब्द निकलते हैं, उसकी चर्चा ही बेकार है।
राय के जीवन की कहानी भारतीय लोकतंत्र के उस उजले पक्ष की कहानी है जिसे मीडिया और राजीनीतिक दल दबा देना चाहते हैं। वे सीपीएम के कद्दावर नेता थे, लेकिन उन्होंने पार्टी इसलिए छोड़ दी कि उनके विचारों से पार्टी सहमत नहीं थी। सत्ता और पैसे के लिए पार्टी छोड़ने तथा अपने विचारों से विपरीत विचारां की पार्टी में शामिल होने में कोई हिचक नहीं रखने वाले नेताओें के इस दौर में लोगों को राय जैसे लोगों के बारे में जानना चाहिए ताकि वे असली और नकली नेताओें में भेद कर सकें। राय जैसे लोगों को पार्टी से बाहर भेजने वाली सीपीएम को भी आत्ममंथन करना चाहिए कि वामपंथी पार्टियों में विचारों की कैसी कठोरता है जो एक स्वतंत्र ढंग से काम करने वाले आदमी को सह नहीं सकती है?
एके राय संसदीय राजनीति में कबीर की तरह रहे और जिन आदर्शों को लेकर आए थे, उसे उसी रूप में सहेज कर रखा। ‘‘दास कबीरा जतन से ओढिन, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया’’। कोयले की कोठरी में भी उनके चरित्र पर कोई दाग नहीं लगा। उन्हें सलाम!

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