किले में तब्दील श्रीनगर के सौरा में प्रवेश करने पर एक तिराहे पर कुछ युवकों का समूह मिला। उनसे बातचीत शुरू की। देखते ही देखते वहां 15-20 लोग और जुट गए। उनमें से किसी के सिर पर पट्टा बंधा हुआ था तो किसी के हाथ पर। किसी पैरों और कमर में पैलेट गन के छर्रे लगने के निशान थे। सभी सुरक्षाबलों के हाथों पिटाई के शिकार थे। उन सभी में ज्यादातर लोग हैंडीक्राफ्ट का काम करने वाले थे, लेकिन सभी काम इन दिनों बंद है। हमने उनकी तस्वीर लेनी चाही लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हुए। उनका कहना था कि उनकी तस्वीर सार्वजनिक होने पर उनकी मुश्किलें बढ जाएंगी।

बस्ती में कई लोगों ने बताया कि उन्हें यहां से बाहर निकले 50 दिन से ज्यादा हो गए। यहां से बाहर निकलने का मतलब है बिना वजह गिरफ्तारी। सीआरपीएफ के जवान लडकों को ही नहीं बल्कि लडकियों को भी नहीं छोड रहे हैं। एक महिला ने बताया कि कुछ दिन पहले किसी काम से बाहर गई एक लडकी को सीआरपीएफ के जवानों ने पकड लिया और उसे पुलिस के हवाले कर दिया।
बस्ती में घूमते हुए मकानों की दीवारों पर कश्मीर की आजादी समर्थक और भारत विरोधी नारे लिखे हुए भी देखे। एक दीवार पर अंग्रेजी में ‘बुरहान टाऊन’ लिखा हुआ भी देखा। तीन साल पहले सुरक्षाबलों के साथ हुई मुठभेड में मारा गया 24 वर्षीय ‘मिलिटेंट’ बुरहान वानी इसी बस्ती का रहने वाला था। बस्ती के अधिकांश नौजवान बुरहान वानी को अब अपना हीरो मानते हैं। वहां लिखे ‘बुरहान टाऊन’ से भी उसकी लोकप्रियता की झलक मिलती है।

बस्ती के नौजवानों ने बताया कि हर समय सुरक्षाबलों का खौफ बना रहता है, लिहाजा उन्हें उन्हें दिन-रात बारी-बारी से जागते हुए रहना पडता है। इसके लिए सातों प्रवेश द्वारों पर नौजवानों की ड्यूटी लगती है। पूरी बस्ती में भी रात भर इधर से उधर नौजवानों की टोलियां घूमती रहती हैं। यह सब कुछ बेहद संगठित तरीके से अंजाम दिया जाता है।

हम जिस दिन सौरा के लोगों के बीच पहुंचे वह तनाव, टकराव और खौफ का 51वां दिन था। लोगों ने बताया कि इस दौरान बस्ती के लोगों के सामने अनाज और खाने पीने के अन्य सामानों तथा दवाई आदि जीवनोपयोगी वस्तुओं का संकट खडा हो गया है। सौरा से सटी एक झील है, जो डल झील से भी बडी है। इस झील में कमल के फूलों से लेकर दूसरी सब्जियां उगाई जाती हैं। झील के आसपास खेत हैं, जिसमें अनाज उगाया जाता है। इसके अलावा कुछ खेती है जिसमे सौरा के लोग अनाज पैदा करते है। इसके अलावा बस्ती के कई घरों में बेहद महंगी पश्मीना शालों के बुनने का काम भी होता है।

बस्ती के ठीक बाहर ही मशहूर शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज अस्पताल है, जिसका प्रचलित नाम है एसकेआईएमएस। इस अस्पताल के निर्माण के लिए शेख अब्दुल्ला ने लोगों से चंदा जुटाया था। बताते हैं कि शेख अब्दुल्ला के आह्वान पर अस्पताल के निर्माण के लिए गांव की कई महिलाओं ने अपने गहने तक दान में दे दिए थे। इसी अस्पताल से होते हुए हम सौरा से बाहर निकले। अस्पताल में मरीजों, उनके परिजनों, डॉक्टरों तथा अस्पताल के अन्य कर्मचारियों की चहल-पहल बनी हुई थी। अस्पताल में किसी मरीज या डॉक्टर से बात करना आसान नहीं था, क्योंकि वहां भी चप्पे-चप्पे पर स्थानीय पुलिस और सीआरपीएफ के जवान तैनात थे, जो हर गतिविधि पर अपनी नजरें गडाए हुए थे।

हमारे साथ मौजूद स्थानीय पत्रकार ने बताया कि सुरक्षाबलों से टकराव के दौरान जिन लोगों को पैलेट गन के छर्रे लग जाते हैं, उनमें से ज्यादातार लोग यहां इस अस्पताल में इलाज के लिए आने में डरते हैं, क्योंकि पुलिस उन्हें पत्थरबाज मानकर गिरफ्तार कर लेती है। ऐसी स्थिति में यहां बस्ती के वही लोग इलाज के लिए आते हैं जो बहुत ज्यादा जख्मी हो जाते हैं। अस्पताल में भर्ती ऐसे जख्मी लोगों से बात करना भी हमारे लिए आसान नहीं था, क्योंकि ऐसे लोगों को अलग वार्ड में रखा जाता है, जहां पुलिस का सख्त पहरा होता है।

बस्ती के तमाम लोगों से बातचीत का लब्बवोलुआब यह है कि इलाके के बाशिंदों का विरोध प्रदर्शन जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के सरकार के फैसले को लेकर है, लेकिन अब उनके लिए अनुच्छेद 370 या विशेष दर्जा ज्यादा महत्व नहीं रखता। अब तो उनकी मांग है ‘कश्मीर की आजादी।’ इससे कम कुछ नहीं। साथ ही अब उन्हें अपने नौजवानों की गिरफ्तारी और फिर उनके उत्पीडन का भी भय है, जिससे बचने के लिए वे विरोध के इस सिलसिले को जारी रखे हुए हैं और किसी भी कीमत पर पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि अगर एक बार कमजोर पड गए तो फिर पता नहीं कितनों को उत्पीडन का शिकार होना पडेगा और यह सिलसिला कब तक जारी रहेगा।

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