तमिलनाडु  की राजनीति में येन-केन-प्रकारेण पैर जमाने के लिए आतुर भाजपा की राज्य इकाई ने जब भगवा वस्त्र पहने, मस्तक पर भभूत लपेटे और रुद्राक्ष माला धारण किए हुए महान तमिल दार्शनिक और संत तिरुवल्लुवर की तस्वीर ट्विटर पर पोस्ट की तो राज्य की राजनीति में एक भूचाल सा आ गया.

इससे पहले भी तमिलनाडु राज्य के शिक्षा विभाग ने बारहवीं की पाठ्यपुस्तकों के आवरण पर तमिल अस्मिता के प्रतीक एवं आदर्श, कवि-समाज सुधारक सुब्रह्मण्य भारती को सिर पर भगवा साफा लपेटे दिखाया तो  ब्राह्मणवाद  विरोधी  द्रविड़ राजनीति के गढ़ तमिलनाडु के राजनीतिक व सांस्कृतिक हलकों में इसकी तीखी आलोचना हुई और इसे तमिल अस्मिता पर हमला माना गया. भारती के प्रशंसकों ने आक्रोश ज़ाहिर करते हुए इसे अपने नायक की ‘दोबारा मृत्यु’ बताया.

आलोचकों का कहना है कि यह तिरुवल्लुवर के दर्शन और कृतित्व को अगवा कर  उन्हें  ‘हिन्दू’  घोषित करने का एक षड्यंत्र है. नीति वाक्य एवं उपदेश किसी एक धर्मविशेष की बपौती नहीं होते. तिरुवल्लुवर को किसी एक धर्म विशेष की परिधि में सीमित करना भाजपा/ संघ  के संकुचित नज़रिए को उद्घाटित करता है .

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति  के तहत हिंदी भाषा थोपे जाने की सम्भावित खबरों से आच्छादित माहौल के बीच पाठ्यपुस्तकों के कवर पर भगवा साफे में अवतरित हुई भारती की तस्वीर ने तमिलों के मन में हिन्दुत्ववादियों के सांस्कृतिक हमले की आशंकाओं को प्रबल कर दिया है. जानबूझकर विद्यार्थियों के दिलोदिमाग में एक प्रगतिवादी धर्मनिरपेक्ष  कवि की छवि को बदलने की इस नापाक साजिश पर तीखी प्रतिक्रियाएं आई. केंद्र और विभिन्न राज्यों की भाजपा सरकारों द्वारा जिस तेजी से स्कूलों में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों की विषयवस्तु का भगवाकरण  किया जा रहा है उससे तमिलों की आशंकाओं निर्मूल नहीं कहा जा सकता.

भाजपा की तमिलनाडु इकाई और भाजपा समर्थित राज्य सरकार की इन हरकतों को तमिल जननायकों के भगवाकरण की एक कुटिल चाल बताकर जोरदार शब्दों में भर्त्सना की गई. कहना न होगा कि तमिलनाडु सरकार हर वर्ष 15 जनवरी को तिरुवल्लुवर दिवस के रूप में मनाती है.

1960 में भारत सरकार ने महान दार्शनिक तिरुवल्लुवर पर एक स्मारक डाक टिकट जारी किया था. उसमें भी उन्हें सफेद वस्त्र पहने दिखाया गया है. सुब्रह्मण्य भारती सिर पर हमेशा सफेद साफा पहनते थे.

तमिल परम्परा में साधू-संत केवल श्वेत वस्त्र धारण करते हैं. तमिल संस्कृति में भगवा रंग का कोई स्थान नहीं है. भगवा वस्त्र अपेक्षकृत एक नया चलन है जिसे अब तमिलनाडु के मठों ने अपना लिया है. ब्राह्मणवाद के आलोचकों का कहना है कि ‘योगपट्टई’ जिसे साधू–योगी पहनते थे उसे ब्राह्मणों ने षड्यंत्र के तहत सिकोड़कर जनेऊ बना दिया.

कौन हैं तिरुवल्लुवर?

दार्शनिक कवि और तमिल साहित्य व संस्कृति के गौरव तिरुवल्लुवर ने  धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थों का जैसा मनोवैज्ञानिक एवं व्यावहारिक विश्लेषण आज से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व अपनी रचना  ‘तिरुकुरल’ में किया वह अन्यत्र दुर्लभ है. ‘तिरु’ का अर्थ महान या श्रेष्ठ और ‘कुरल’ अर्थात छोटा या लघु. तमिल व्याकरण में ‘कुरल वेणवा’ नामक एक छंद है जो हिंदी के ‘दोहा’ छंद के समान आकार में लघु होता है .

तृतीय संगम 1500 BC – 300 AD के दौरान जो तमिल साहित्य की रचना हुई उसमें अधिकतम योगदान जैनाचार्यो, विद्वानों का रहा. तिरुवल्लुवर भी इसी कालखंड में हुए. ‘संगम’ एक प्रकार की साहित्य सभाएं थीं जिनका उद्देश्य तमिल साहित्य का सृजन एवं संवर्धन था और इनका आयोजन राजाश्रय में किया जाता था.

मूलत: तमिल भाषा में रचित यह दोहा-काव्य (तिरुकुरल) इतना संप्रदाय निरपेक्ष है कि तमिल जनता इसे अपने-अपने धर्मानुसार अलग–अलग नामों से अत्यंत आदरपूर्वक स्मरण करती है. तमिलनाडु के विभिन्न धर्मावलम्बियों को अपने मूल धर्मग्रंथों के संदेश वाक्य इतने याद नहीं होंगे जितने तिरुकुरल के नीतिपरक पद्य याद हैं. यहाँ तक कि नास्तिक तमिल भी इस ग्रन्थ का आदर करते हैं. अनपढ़ ग्रामीणों के मुख से भी इन पद्यों को सुना जा सकता है.

बीते दो हजार  सालों की अवधि में यह नीतिग्रंथ तमिलनाडु की सीमाओं को लांघकर सम्पूर्ण विश्व में शोध का विषय बन चुका है. दुनियाभर की लगभग 80 भाषाओं में अनूदित होकर होकर लाखों संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं.

सुदूर दक्षिण में वर्तमान तमिलनाडु प्रान्त के वन्य प्रदेशों में विचरण करने वाले एक अनासक्त योगी तिरुवल्लुवर की यह कालजयी रचना वास्तव में जैन ग्रन्थ है. जैन दर्शन के शोधकर्ताओं का मानना है कि संत तिरुवल्लुवर एवं आचार्य कुंद–कुंद स्वामी एक ही व्यक्ति थे. उनका न केवल समय समान है अपितु लेखन की विषयवस्तु में भी अद्भुत समानता है. प्राचीन तमिल उल्लेखों में तिरुकुरल के रचयिता ‘एलाचार्य’  नाम से प्रसिद्ध है. जैन परम्परा में भी कुन्द्कुंद स्वामी का एक नाम ‘एलाचार्य’ भी था

तिरुक्कुरल के मंगलाचरण वाले प्रथम अध्याय के प्रथम पद्य में  रचयिता ने ‘आदि भगवान’ की स्तुति की है. जैनों के प्रथम तीर्थंकर  ऋषभदेव को आदिनाथ नाम से जाना जाता है. चतुर्थ पद में ‘वीतरागता’  का वर्णन है. एकमात्र जैन दर्शन में आराध्य को पूर्णतया वीतरागी माना गया है. आठवें पद्य में उन्होंने भगवान को ‘अष्ट–गुण’ ‘कहा है जो जैन णमोकार महामंत्र में परिगणित सिद्ध परमेष्ठी के आठ मूल गुणों की ओर संकेत करता है. नौवें और दसवें पद्यों में आचार्य एवं उपाध्याय की स्तुति की गई है. पच्चीसवें अध्याय में लोक (ब्रह्माण्ड) को वात– वलय (वायुमंडल) से वेष्टित बताया है जो केवल जैन खगोल विद्या से मेल खाता है. किसी भी अन्य भारतीय धर्म दर्शन में अहिंसा का वैसा सूक्ष्म विवेचन नहीं किया गया है, जैसा जैन दर्शन में किया गया है. इसमें वर्णित अहिंसा आदि धार्मिक व नैतिक सिद्धान्त भी जैन धर्म के अनुरूप हैं.

दूसरी शताब्दी में रचित तमिल जैन ग्रन्थ  ‘शिलप्पदिकरम’ में  ‘तिरुकुरल’ के कई पदों का उद्धरण दिया गया है. एक प्राचीन तमिल जैन शास्त्र ‘नीलाकेशी’ में भी ‘तिरुकुरल’ को जैन ग्रन्थ बताया गया है. सबसे महत्वपूर्ण प्रमाण है आदि शंकराचार्य के शिष्य द्वारा रचित ‘प्रबोध चंद्रोदय’ नामक तमिल नाटक. नाटक में जब एक दिगंबर जैन मुनि का पात्र मंच पर आता है तो वह अहिंसा धर्म की महिमा का बखान करने वाले ‘तिरुकुरल’ के पद्यों का वाचन करता है.

सुब्रह्मण्य भारती कौन है?

सुब्रह्मण्य भारती तमिल साहित्य जगत की महान हस्ती, समाज-सुधारक, कवि, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी थे. उन्हें स्नेह से ‘भारतीयार’  कहा जाता है. तमिल मानस में भारती की एक विशिष्ट छवि उत्कीर्ण है–  सर पर सफेद साफा,  नुकीली मूंछें और भेदती हुई दो आँखें!

यद्यपि उनका लेखन मूलत: रहस्यवादी था मगर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्होंने देशभक्ति के जोशीले तराने लिखे . कांग्रेस  की गर्म दल विचारधारा के समर्थक रहे. 1908 में गिरफ्तारी से बचने के लिए पांडिचेरी (उस समय फ़्रांस के अधीन) चले गए और 1918 तक वहीँ  रहे. वह हमेशा जातिवाद और साम्प्रदायिकता के विरोध में खड़े रहे.  सुब्रह्मण्य ने युवावस्था में ही अपने जातिसूचक ब्राह्मण उपनाम ‘अय्यर’ और जनेऊ दोनों का त्याग कर दिया था. इतना ही नहीं उन्होंने पुरातन पंथ को चुनौती देते हुए दलितों का जनेऊ संस्कार किया और मंदिरों में उनके प्रवेश के लिए निरंतर प्रयास करते रहे. मुसलमानों से एकजुटता का प्रदर्शन करने के लिए मुस्लिम दुकानदारों के यहाँ चाय बेचा करते थे. दक्षिण तमिलनाडु के विभिन्न गिरजाघरों में नियमित प्रार्थना के लिए जाया करते थे. सिक्ख धर्म से प्रभावित होकर दाढ़ी रखने लगे और पगड़ी पहनना शुरू कर दिया. कुल मिलाकर एक ऐसे सर्वसमावेशी समाज के पैरोकार थे जो संघ/भाजपा की विचारधारा से किसी तरह भी मेल नहीं खाता. महिला अधिकारों के पैरोकार थे. दहेज प्रथा और बाल विवाह का पुरजोर विरोध करते रहे. वह हर पीढ़ी के प्रिय कवि रहे.  भारती की कविताओं को तमिल सामजिक परिवेश में अक्सर उद्धृत किया जाता है. 1921 में गरीबी की हालत में उनकी मृत्यु हुई. रोचक बात यह है 2014 के पहले से ही भारत सरकार की तरफ से हिंदी भाषा के लेखकों को हर वर्ष ‘सुब्रह्मण्य भारती पुरस्कार’  प्रदान किया जाता है.

राज्यों की सांस्कृतिक एवं  भाषाई अस्मिता पर लगातार हमले हो रहे हैं. हिंदुत्व की कुल्हाड़ी से देश के संघीय ढाँचे को धराशायी किया जा रहा है. आदिवासी भी अछूते नहीं रहे हैं. बंगाल के सभी जननायकों को राष्ट्रवादी हिन्दू का चोला पहना दिया गया है. सुभाषचंद्र बोस हो या बंकिमचन्द्र चटर्जी,  राममोहन रॉय हो या श्री अरबिंदो सबको भगवा चादर में लपेट दिया गया है.

राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी राजनीति में हिदुत्व की सफलता के लिए आवश्यक है कि हिंदुत्व का एक व्यापक जनाधार हो. जिसका सीधा अभिप्राय है हिंदुत्व को एक जातिविहीन विचारधारा के रूप में प्रचारित करना.

इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए दलित, ओबीसी और आदिवासी इतिहास पुरुषों को हिंदुत्व में समाहित करने के बाद अब धर्मपुरुषों को हथियाने की संगठित कोशिशें शुरू हो गई हैं. जातीय चेतना को हिंदुत्व के झंडे के नीचे लाकर हिंदुस्तान,  हिन्दुवाद और हिंदुत्व को एक में समाहित करने की राजनीति चल रही है. इतिहास, जातीय व धार्मिक पहचान के  प्रतीकों, संस्कृतियों की पुनर्व्याख्या कर उन्हें वृहत्तर हिंदुत्व में समायोजित  करना भाजपा/संघ की रणनीति का एक अहम हिस्सा है. इतना ही नही आदर्श पुरुषों का ‘अपहरण’ करने की आपाधापी में देश के इतिहास से खिलवाड़ किया जा रहा है. लिखित इतिहास की धज्जियाँ उड़ाते हुए हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप को विजेता घोषित कर दिया गया.

इतिहास की जिन विभूतियों ने भारत के ऐतिहासिक परिदृश्य पर अपनी  अमिट छाप छोड़ी है उन्हें आत्मसात कर लेने/अपना लेने से संघ को आम जनमानस में कुछ हद तक स्वीकार्यता मिल जाती है. संघ और भाजपा अपनी असलियत को इस सार्वभौमिक स्वीकार्यता के आवरण से ढंकना चाहते हैं.

पिछले करीब तीन दशकों से और खासकर 2014 में  केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के बाद से भाजपा भारतीय राजनीति के इतिहास पुरुषों,  विशेषकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नेताओं, को ‘अपना बनाने’ के लिए आतुर है, चाहे उन इतिहासपुरुषों की विचारधारा का संघ की विचारधारा से दूर-दूर तक कोई मेल हो या न हो. मजे की बात यह है भाजपा और संघ अपने वैचारिक पूर्वजों का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जोरशोर से आवाहन नहीं करते. भारत रत्न प्रदान करने की बात हो या फिर ‘भव्य मूर्ति’  की स्थापना. संघ के अपने पुरखे पिछली पंक्ति में बैठकर अपनी बारी का बेसब्री से इंतज़ार करते ही रह जाते हैं. महात्मा गाँधी हो या संघ पर प्रतिबन्ध लगाने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल, हिन्दू महासभा के कटु आलोचक नेताजी सुभाषचंद्र बोस हों या आंबेडकर अथवा कम्युनिस्ट भगत सिंह, सबको हिंदुत्व के खांचे में फिट करने की कवायद जारी है. और तो और मर्यादा पुरुषोत्तम शालीन राम को भी उग्र श्रीराम में तब्दील कर दिया गया है.

1960 के दशक के उत्तरार्ध से तमिलनाडु की राजनीति के केंद्र में द्रविड़ अस्मिता का बोलबाला हो गया. यह अपने मूल में ही ब्राह्मणवाद विरोधी विचारधारा है. द्रविड़ों को भारत का मूलनिवासी और आर्यों (ब्राह्मणों) को आक्रान्ता मानते हैं. वैदिक धर्म और संस्कृति के प्रतीकों का विरोध इस विचारधारा का मूल है. हिंदी और संस्कृत को ब्राह्मणों की भाषा मानकर इसका पुरजोर विरोध करते हैं. देखना होगा कि ऐसे ब्राह्मणवाद की रीढ़ पर खड़ी संघी विचारधारा मूलनिवासी द्रविड़ों के इतिहास पुरुषों, प्रतीकों और जननायकों का भगवाकरण करने में कामयाब हो पाती है या नहीं!

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