गांधीवादी कार्यकर्ता कुमार प्रशांत बच्चों की तरह अपनी ओर ध्यान खींचने के लिए चैनलों पर चीखने-चिल्लाने पत्रकारों में से नहीं हैं। वह उन पत्रकारों में से भी नहीं हैं जो विचारधारा से प्रभावित पत्रकारिता नहीं करने और निष्प़क्ष होने का दावा करते हैं ताकि वक्त के साथ अपना रंग बदल सकें। टाइम्स आफ इंडिया समूह से लंबे समय तक जुड़े रहे प्रशांत जी पत्रकारिता के साथ उन गांधीवादी गतिविधियों से भी जुड़े रहे जिसके लिए प्रतिबद्ध थे। वह उस दौर में गांधीवादी बने रहे जब वामपंथ का जोर था और हिंदुत्ववादी अपने को संगठित करने में लगे थे। उस वैचारिक धु्रवीकरण के बीच मैं ने आरएसएस के लोगों को भी कुमार प्रशांत की तारीफ करते पाया है। वैसे भी, उनकी भाषा और उनके व्यवहार में आकर्षक सौम्यता है। ऐसे पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता के खिलाफ संघ परिवार का मैदान में उतरना कोई मामूली घटना नहीं है।
प्रशांत के खिलाफ उड़ीसा में दो स्थानों पर एफआईआर दर्ज कराई गई है। अलग-अलग दर्ज एफआईआर में उन पर यह आरोप लगाया गया है कि उन्होंने वीर सावरकर का यह कह कर अपमान किया है कि अंदमान जेल से बाहर आने के बाद वह अंग्रेजों के सहयोगी बन गए। कार्यकर्ताओं का कहना है कि सावरकर की महानता इसीसे जाहिर होती है कि उनकी तस्वीर संसद भवन में लगी है। दूसरी आपत्ति उनके इस कथन पर है कि आरएसएस आजादी के आंदोलन में नहीं था। एफआईआर में उन पर देश के खिलाफ साजिश करने का आरोप लगाया गया है। आरएसएस के प्रदेश नेतृत्व भी अपने कार्यकर्ताओं की राय से सहमत हैं।
प्रशांत के खिलाफ एक शिकायत उस कंधमाल जिले में दर्ज कराई गई है जो 1999में मिशनरी कार्यकर्ता ग्राहम स्टेंस और उसके दो छोटे बच्चों को जिंदा  जला देने और 2008 में एक नन के साथ सामूहिक दुष्कर्म तथा नंगा घुमाने की घटनाओं के लिए कुख्यात है। दूसरी शिकायत कटक जिले में दर्ज कराई गई है।
क्या कुमार प्रशांत पर देश के खिलाफ साजिश करने के आरोप में वही परिचित भाषा नहीं दिखाई देती जो संघ परिवार और भाजपा सरकार का विरोध करने वाले बौद्धिकों के बारे में इस्तेमाल की जाती है ? क्या ये वही मुहावरे नहीं है जिनका इस्तेमाल मोदी सरकार से सवाल करने वालों के खिलाफ होता है ं? इसकी शुरूआत कन्हैया कुमार और शाहिला रसीद को टुकड़े-टुकड़े गैंग और देशद्रोही बताने और शहरी नक्सल कह कर सुधा भारद्वाज और अन्य आदिवासियों के लिए काम कर रहे बौद्धिकों को जेल में बंद करने से से हुई है। लग रहा है कि गांधीवादी कुमार प्रशांत भी इसी श्रेणी में डाल दिए गए  हैं। यानि अब इतिहास, समाज और रजनीति के बारें में अलग विचार रखने वालों को पाकिस्तानी, देशद्रोही और शहरी नक्सल करार देने की बीमारी संक्रामक हो चुकी है।
प्रशांत पर संघ परिवार की नाराजगी की कोई एक वजह नहीं है।  गांधी शांति प्रतिष्ठान, जिसके वह अध्यक्ष हैं, हिंदुत्व की राजनीति के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। पिछले दिनों इसकी पत्रिका ‘गांधी मार्ग’ ने गांधी जी की हत्या पर एक विशेषांक निकाला है जिसकी काफी चर्चा हुई है। प्रतिष्ठान ने कश्मीर की स्वायत्तता खत्म करने और धारा 370 के दो प्रावधानों को खत्म करने के मोदी सरकार के फैसले के विरोध में भी एक कड़ा बयान जारी किया है। उड़ीसा के जिस ‘गांधी कथा’ कार्यक्रम को संघ वालों ने निशाना बनाया है उसमें प्रशांत ने कश्मीर पर भारत सरकार के फैसले की जमकर आलोचना की थी।
लेकिन बौद्धिकों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को शहरी नक्सल बताने की बीमारी भारतीय लोकतंत्र के गिरते स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान करेगी, इसमें कोई शक नहीं है। अब इसकी सूची में सिर्फ वे लोग ही शामिल नहीं हैं जो माओवाद पीड़ित इलाकों में आदिवासियों पर हो रहे पुलिस-जुल्म का विरोध करते हैं।  इसमें अब सिर्फ जेएनयू जैसे विश्वविद्यालयों में पढाने और पढने वाले लोग नहीं हैं जो लोकतंत्र और बोलने की आजादी को लेकर अक्सर जंतर-मंतर पर दिखाई देते हैं और साहित्य तथा समाज में बराबरी के मूल्यों को स्थापित करना अपना दायित्व मानते हैं। इसमें अब उन सभी लोगों-गांधीवादियों, समाजवादियों, आंबेडकरवादियों- को भी शामिल किया जा रहा है जो हिंदू राष्ट्र के अभियान के विरोध में हैं, लोकतंत्र और बोलने-सोचने की आजादी के पक्ष में हैं। दलितों के जुझारू नेता जिग्नेश मेवाणी और चंद्रशेखर रावण से लेकर शहर-कस्बों के कालेज-स्कूलों का शिक्षक-छात्र और सड़क पर नारा लगाने वाला हर शख्स शहरी नक्सल है। जल्द ही सरकारी कंपनियों को बेचने का विरोध कर रहे ट्रेड यूनियन नेताओं को भी देशद्रोही बताया जाने वाला है जो अडाणी-अंबानी को देश की संपत्ति सौंपने के विरोध में सड़क पर उतर रहे हैं। शामिल पाएंगे।
प्रशांत के खिलाफ एफआईआर असहिष्णुता की बीमारी से ग्रस्त लोकतंत्र की बढती बीमारी के संकेत हैं।

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