सन् 1963 में जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया था, उस वक्त डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था रोज सुबह अखबार में एक खुबसूरत चेहरा देखने को मिला करेगा। कालांतर में भारतीय राजनीति के स्वर्णिम एवं काले अध्याय इंदिरा गांधी के नाम लिखाये। उनके बाद से आज तक की राजनीति को देखते हैं तो लगता है उनकी राजनीति के स्वर्णिम रिकॉर्ड को कोई छू न सका है और काले कामों को उनके बाद वालों ने इस कदर गति दी है कि वे काले बादल बनकर भारत के सारे आसमां पर छा गए हैं। आज घटाघोप अंधियारा है और उनसे आए दिन कभी बोफोर्स, कभी राफेल, कभी व्यापमं तो कभी सीबीआई के भ्रष्टाचार और काले कारनामों की बरसात होती रही है। इसलिए कह सकते हैं कि इंदिरा गांधी ने अनेकानेक विरोधाभासों के बाद भी स्वयं को सिद्ध किया है।

राजीव गांधी भी इंदिरा गांधी की तरह वंशवाद की देन थे। लेकिन उन्होंने भारतीय राजनीति में एक विकासशील प्रधानमंत्री के साथ एक आदर्श राजनेता की छाप छोड़ी। सोनिया और राहुल गांधी भी उसी वंश परम्परा के वाहक है। सोनिया गांधी चाहती तो सन् 1991 में प्रधानमंत्री बन सकती थी। लेकिन उन्होंने नरसिंहाराव को प्रधानमंत्री बनाया। उसके बाद जब सन् 1998 में कांग्रेस डूब रही थी तब उसका नेतृत्व ग्रहण कर उसे बचाया। अन्यथा कांग्रेस स्काइलेब की तरह टूटकर अलग-अलग प्रांतों में कई पार्टियों के रूप में बिखर जाती। उन्होंने सन् 2004 में प्रधानमंत्री के पद को त्यागकर मनमोहनसिंह के रूप में एक योग्य प्रधानमंत्री बनाया।

मनमोहनसिंह को देश की जनता ने 2004 से 2009 की सरकार के बाद 2009 में पुन: सरकार बनाने का मौका दिया था। सोनिया, राहुल गांधी सरकार और संगठन को नियंत्रित कर रहे थे। यह सर्वविदित तथ्य है। लेकिन उन्होंने अपने किसी भी कर्म एवं आचरण से कभी कोई गलत संदेश नहीं दिया। 2013 में मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ उठे मुद्दे जिनमें भ्रष्टाचार भी एक प्रमुख मुद्दा था। जिनसे मनमोहन सिंह सरकार को लोकसभा चुनाव 2014 में पराजय झेलना पड़ी थी। उन मुद्दों का क्या हश्र हुआ। वे कहां खो गए कितने सही गलत निकले और आज क्या हो रहा है, यह देश देख रहा है। देश ने बड़ी उम्मीद के साथ जिन नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाया था, उनको और उनके कार्यकाल को भी ध्यान से देख रहा है। इसलिए लोकतंत्र खंडित होने के दौर में भी लोकतंत्र पर यकीन रखिये। लोक और तंत्र को खंडित करने वाले व्यक्ति, विचार और पार्टी को देश की जनता ठुकराती रही है। यह सन् 1975 के आपतकाल के दौर के बाद 1977 के लोकसभा चुनावों ने सिद्ध किया था। यह सन् 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले वर्षों में हुए ग्यारह से अधिक लोकसभा चुनावों ने और अभी-अभी हुए विधान सभा चुनावों ने भी सिद्ध किया है। अब मई 2019 की तैयारी है।

प्रियंका गांधी का आना भारतीय राजनीति की एक असहज लेकिन अब सहज बन चुकी प्रक्रिया का हिस्सा है। गले-गले तक वंशवाद में डूबे दल, नेता और उनके समर्थक जब वंशवाद पर सवाल उठाते हैं, तो उनके विवेक पर तरस आता है। सोनिया गांधी ने जब सन् 2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराया था। तब राहुल-प्रियंका से परामर्श किया था जिसमें दोनों ने उनका साथ दिया था। इस नजारे को पूरे देश ने देखा था। राजनैतिक दलों में एक पार्षद या विधायक का टिकिट कटने पर टिकारार्थी, उसका घर-परिवार और समर्थक ऐसे रुदन क्रदन करने लगते हैं, जैसे उनका जहाँ लूट गया हो। ऐसे दौर में सोनिया गांधी का प्रधानमंत्री पद ठुकराने का दृश्य एक अलौकिक घटना बन गया था। जिसका लाभ उनकी पार्टी को 2009 में भी मिला था और आज भी मिल रहा है। राहुल-प्रियंका ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में कोई महत्वाकांक्षा नहीं दिखाई। आज प्रियंका गांधी 47 वर्ष की हो रही हैं। उनका आगमन भारतीय राजनीति में उनकी चिर प्रतिक्षित इंतजार के बाद आगमन की घटना है। उनसे चमत्कार की उम्मीद की जा रही है। पक्ष-विपक्ष के अपने-अपने तर्क है, जिनका जवाब उनकी दादी इंदिरा गांधी ने जिस तरह अपनी खूबसुरती से नहीं वरन स्वयं को सिद्ध करके दिया था। उसी तर्ज पर प्रियंका को स्वयं को सिद्ध करना होगा।

 

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