दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की रैली के बाद सभी विपक्षी नेताओं की एक अहम बैठक वरिष्ठ नेता शरद पवार के निवास पर हुई और उसमें मोटे तौर पर यह फैसला हुआ है कि मोदी और बीजेपी को हराने के लिये सबको साथ में आना होगा। विपक्षी नेताओं में न्यूनतम साझा कार्यक्रम पर भी चर्चा हुई।

भावी रणनीति की दृष्टि से यह बैठक अहम थी। लेकिन इस मीटिंग में भी यह तय नहीं हो पाया कि महागठबन्धन का आकार क्या होगा और वह किस पार्टी या नेता के नेतृत्व में चुनाव समर में उतरेगा। इस बैठक में मायावती, अखिलेश यादव और अजीत सिंह उपस्थित नहीं थे और न उनकी ओर से कोई प्रतिनिधि ही उपस्थित था। इससे यह तो तय हो गया है कि उत्तरप्रदेश में त्रिकोणीय संघर्ष होगा और यदि कांग्रेस सवर्ण वोटों में सेंध नहीं लगा पायी तो उसका फायदा बीजेपी को होगा। इसी तरह यदि कांग्रेस ने दलित और मुस्लिम वोटों में सेंध लगाई तो उसका सीधा नुकसान सपा-बसपा गठबन्धन को होगा।

कांग्रेस के साथ यही समस्या प.बंगाल में भी है। प.बंगाल में यदि उसका समझौता ममता बनर्जी के साथ नहीं हुआ तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलेगा। महागठबन्धन के समक्ष सबसे बड़ी समस्या सीटों का बंटवारा करना है तथा अपनी पार्टी के स्थानीय नेताओं को सन्तुष्ट करना भी है। सभी पार्टियां अपने प्रभाव के राज्यों में अधिक से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ना चाहेंगी। ऐसी स्थिति में पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, बिहार, प.बंगाल, कर्नाटक आदि राज्यों में विपक्षी दलों में सहमति खटाई में भी पड़ सकती है और यदि इन राज्यों में व्यापक सहमति नहीं हुई तो मोदी और बीजेपी को हराना असम्भव हो जाएगा।

दिल्ली,पंजाब और हरियाणा में आम आदमी पार्टी के साथ समझौता कर एक सँयुक्त उम्मीदवार खड़ा करना एक टेढ़ी खीर है। हरियाणा में तीसरी ताकत के रूप में ओमप्रकाश चौटाला का लोकदल भी है, यद्यपि उसमें पारिवारिक फूट के बाद उसकी शक्ति भी बिखर गयी है, लेकिन वह अभी भी जाट वोटों को अपनी ओर खींचने की क्षमता रखता है। अतः यदि लोकदल को महागठबन्धन में शामिल नहीं किया गया तो उसका फायदा बीजेपी को ही मिलेगा।

दिल्ली में यदि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में 3-4 या 2-5 के फार्मूले पर समझौता हो जाता है तो दिल्ली में बीजेपी की संभावनाओं पर ग्रहण लग जायेगा। दिल्ली में यदि समझौता हो गया तो पंजाब और हरियाणा की समस्या भी निपट जाएगी। जहां तक जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु का सवाल है वहां तालमेल और सँयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने में कोई विवाद की स्थिति पैदा नहीं होगी। कांग्रेस जम्मू-कश्मीर की छह सीटों में से फारुख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ 3-3 सीटों पर मिल कर चुनाव लड़ेगी। इसी तरह आंध्र और तेलंगाना में चंद्रबाबू नायडू तथा तमिलनाडु में डीएमके के साथ सीटों के बंटवारे में कोई समस्या नहीं आएगी।

महाराष्ट्र में तो कांग्रेस और शरद पंवार की राष्ट्रवादी पार्टी का समझौता हो ही चुका है। अब रह जाते हैं हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, केरल, बिहार, प.बंगाल और ओडिशा। प्रथम छह राज्यों में कांग्रेस के अलावा कोई अन्य राज्य स्तर की प्रभावशाली पार्टी नहीं है। गुजरात में शरद पंवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस और शरद यादव की लोकतांत्रिक जनता दल का आंशिक प्रभाव अवश्य है, लेकिन इन दोनों पार्टियों की यह हैसियत नहीं है कि वह लोकसभा में उम्मीदवारी का दावा प्रस्तुत करें। बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी हमेशा की तरह इन राज्यों में अपने उम्मीदवार उतारेंगी और विपक्षी वोटों में सेंध लगा कर बीजेपी को फायदा पहुँचाएगी। फिर भी इन सभी छह राज्यों में कांग्रेस का सीधा मुकाबला बीजेपी से ही होना है।

केरल में परम्परागत रूप से कांग्रेस नीत सँयुक्त मोर्चे का मुकाबला लेफ्ट फ्रंट से होना है। बीजेपी वहां तीसरी शक्ति के रूप में उभरने का प्रयास कर रही है और वह हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण भी कर रही है। लेकिन भावी लोकसभा चुनाव में वह अपना खाता खोल पाएगी यह अभी भी सन्देहास्पद ही है। अब रह जाते हैं बिहार, ओडिशा, प.बंगाल और कर्नाटक। ओडिशा में नवीन पटनायक ने कांग्रेस और बीजेपी से समान दूरी बना रखी है। वहां यद्यपि त्रिकोणीय मुकाबला होगा लेकिन मुख्य मुकाबला बीजू जनता दल और बीजेपी में ही होगा। ओडिशा में कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है और वह तीसरे स्थान पर खिसक चुकी है।

बिहार और प.बंगाल में कांग्रेस को क्रमशः लालूप्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल और प.बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ना पड़ेगा। क्योंकि इन दोनों राज्यों में बीजेपी के साथ इन्हीं का मुख्य मुकाबला है और कांग्रेस को यहां छोटे पार्टनर के रूप में ही चुनाव लड़ना पड़ेगा। कर्नाटक में यद्दपि कांग्रेस और जनता दल (एस) की मिलीजुली सरकार चल रही है, लेकिन वहां दोनों पार्टियों में बहुत समस्याएं हैं और वहां राज्य सरकार घिसट-घिसट कर ही चल रही है।

कर्नाटक में यदि कांग्रेस और जनता दल (एस) में सीटों का समझौता नहीं हुआ तो दोनों दल नुकसान में रहेंगे और बीजेपी फायदे में रहेगी। इसलिये बिहार, प.बंगाल और कर्नाटक में महागठबंधन तभी सफल हो पायेगा जब इन राज्यों में कांग्रेस सेक्रिफाइस करे और बिहार तथा प.बंगाल में क्रमशः आरजेडी और ममता बनर्जी के नेतृत्व में चुनाव लड़े तथा कर्नाटक में जनता दल (एस) के साथ सम्मानजनक समझौता करे। सबसे अच्छी स्थिति तो यही होगी कि विपक्षी दल अपने पार्टी और निजी हितों से ऊपर उठ कर जीतने वाले उम्मीदवार को ही मैदान में उतारें।

कुल मिलाकर यदि विपक्षी दल मोदी और बीजेपी को हराना चाहते हैं तो उन्हें अपने क्षुद्र स्वार्थों का त्याग करना होगा और जहां जो पार्टी सबसे मजबूत है और जो उम्मीदवार बीजेपी के उम्मीदवार को हराने में सक्षम हो उसी को बाकी सभी दलों को खुले दिल से समर्थन देना होगा। चुनाव में विजयी होने के बाद विजयी सांसद अपने में से प्रधानमंत्री का चयन कर लें और .सामूहिक नेतृत्व के आधार पर सरकार बनायें तभी देश में लोकतन्त्र और संविधान सुरक्षित रह पायेगा।

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