भारतीय राजनीति के इतिहास में उच्चस्तरीय ज्ञानवान नेताओं की कमी नहीं रही, जिनके स्पर्श से जनता स्निग्ध और प्रभावित हो जाती थी। परंतु ऐसे नेता उन्हीं नक्षत्रों की तरह थे जिनसे हम प्रकाश तो पाते हैं, शायद ऊर्जा भी पाते हैं, पर जिन पर हमारी आंखें टिक नहीं पातीं, उनसे चौंधिया जाती हैं। लोहिया उन सब से भिन्न थे – गांधीजी से भी भिन्न! क्योंकि यद्यपि भारत का जन संसार गांधीजी का बनाया हुआ था, उनमें एक ऐसी देववृत्ति घर कर गयी थी, उनके चारों ओर एक ऐसा प्रभामंडल छा गया था कि उसे भेद कर उन तक पहुंच पाना कठिन था। गोखले की तो मेधावी सत्ता इतनी प्रखर थी कि जनता उन तक उसी प्रकार नहीं पहुंच पाती थी जैसे वह स्टार मूवमेंट के केंद्र जे. कृष्णमूर्ति तक। अंतर दोनों में अनेक प्रकार के थे पर उन अंतरों को यहां स्पष्ट करना मुझे स्वाभाविक ही अभीष्ट नहीं। जवाहरलाल नेहरू निश्चय ही एक संस्था थे जिन्हें जनमानस से प्रेम था और उसके लिये यथासम्भव जीवनभर परिश्रम भी करते रहे किन्तु उनका ‘हेरोवियन’ (Harrowian) संस्कार उनके आभिजात्य के ऊपर मुल्लमे-सा चढ़ गया था, जिससे उनसे भी जनसामान्य की दूरी प्राकृत हो गयी थी। वे मधुर और जनता में क्रियाशील थे पर लगता था कि सम्भवतः श्रम और चिंतन से अपने को प्रभावित कर वे उस दिशा में अग्रसर होते थे। लोहिया का व्यक्तित्व इन सारे व्यक्तित्वों से परे था, सर्वथा अपना।

लोहिया का व्यक्तित्व ऐसा था जिसे छुआ जा सकता था, जिसे प्यार किया जा सकता था, जिससे संवाद किया जा सकता था यानी कि लोहिया नेता से कहीं बढ़कर हम में से एक थे, स्वयं ‘हम’ थे, हमारे और उनके बीच कोई दुराव न था क्योंकि हम दोनों की विचारसरणी समान थी।

“विचारसरणी समान थी” यह कतई नहीं कि उनके भीतर तर्क-वितर्क नहीं उठते थे। वस्तुतः उनके समय में जितने भी विचारक राजनीति में थे उनमें न केवल उनकी प्रतिभा असाधारण थी बल्कि अनेक दिशाओं में उनकी जानकारी और अध्ययन उनसे कहीं गहरे थे। इसका मतलब केवल यह है कि उन्हें अपना सही बोध कराने का जादू मालूम था। वही मेधावी प्रक्रिया जो मानवीय चिंतन और तर्क प्रवाह को अपने जैसों के बीच सम्बलित करती थी, एक ऐसी लोकभाषा का उपयोग करती थी जिससे वह सारी तर्क प्रक्रिया बगैर भोंडी बने नये तीखेपन के साथ प्रकाश के तीरों की तरह अंधकार को चीर देती थी और पास बैठे हुए व्यक्ति सोचते तो उन्हें लगता कि ‘विचारक’ उस भूमि पर उतर आया है, जिसमें विद्रोही मात्र दार्शनिक नहीं रह जाता!

लोहिया का व्यक्तित्व कठोरता और कोमलता का सम्मिश्रण था। ऊंचा से ऊंचा व्यक्तित्व अपने भार से प्रभावित कर उन्हें छोटा नहीं कर सकता था। हल्का से हल्का व्यक्तित्व अपनी सूक्ष्मता के कारण उनकी दृष्टि से औझल नहीं रह सकता था। भय जैसी कोई चीज कभी उनके त्रास का कारण नहीं बनी। इसीलिये किसी की वैचारिक प्रभुता का आतंक किसी समय उन पर नहीं छाया क्योंकि उनका अपना व्यक्तित्व था और वह व्यक्तित्व जिस निष्ठा से, आस्था से, निधि से, जिस अर्थ से समाज या राष्ट्र की सेवा करना चाहता था उस सम्बंध में न तो किसी प्रकार का धोखा था और न किसी करिश्मे से उनकी आंखों में चकाचोंध उत्तपन्न हुई। अपने विचार थे, अपनी राह थी, अपनी सेवा की प्रवृत्ति थी, उसकी सघनता थी और स्वयं राष्ट्र था।

इसका अर्थ यह नहीं है कि लोहिया कोई शुद्ध ग्लैडस्टोन ( विलियम एवर्ट ग्लैडस्टोन इंग्लैंड के उदारवादी प्रधानमंत्री – 29 दिसम्बर 1809 – 19 मई 1898 ) थे। उनमें न केवल ग्लैडस्टोन की कठोर कर्मठता के साथ-साथ डिसरायली (बेंजामिन डिसरायली ब्रिटिश कंजर्वेटिव पार्टी के राजनेता, लेखक और प्रधानमंत्री – 21 दिसम्बर 1804 – 19 अप्रेल 1881) की साहित्यिक क्षमता थी बल्कि सामाजिक मानवीयता भी थी। राधा की वैयक्तिकता और कृष्ण के अनोखे आकर्षण ने भी लोहिया को अनेक बार विभोर किया था। त्वचा के सौंदर्य ने, कायिक लावण्य ने भी उन्हें उस शास्त्र के सम्बंध में चिंतन के लिये वशीभूत किया था जिस पर भारतीय रसशास्त्रियों ने, वियनीज़ एस्थिट्स (विएना/यूरोप के सौंदर्यशास्त्री) ने तर्क-वितर्क किये थे। समाज और राजनीति, साहित्य और सौंदर्य, रस और उसकी निष्पत्ति यह सभी समय-समय पर लोहिया को उद्वेलित करते और वे अपने विचारों को उसी तरह प्रकाशित करते जिस तरह वे मार्क्सवाद और गांधीवाद पर अपने विचार प्रकट करते थे।

उन्हें लगता था कि कभी का अत्यंत प्रगतिशील विचार भी रूढ़िवादी हो सकता था, हो जाता था और इसी दृष्टि से उन्होंने मार्क्स और एंगेल्स के विचारों का जर्मनी और भारत में अध्ययन करते समय अपनी चेतना में निष्कर्ष निकाला। वे कभी उन विचारों से आतंकित अथवा अभिभूत नहीं हुए, इसीलिये सम्भवतः लोहिया पहले भारतीय थे जिन्होंने यूगोस्लाव मिलोवान जिलास ( तत्कालीन युगोस्लाविया वर्तमान सर्बिया के कम्युनिस्ट राजनेता, बाद में लोकतांत्रिक समाजवादी सिद्धान्तकार और लेखक – 12 जून 1911- 20 अप्रेल 1995) के वैचारिक विद्रोह का समर्थन किया। पर जिलास की भी राजनीतिक भाव चेतना को उन्होंने जस का तस समूचा स्वीकार नहीं किया; और न ही उन्होंने लाला हरदयाल आदि प्रवासी भारतीयों की ही विचारधारा सर्वथा अपनायी जो देश के समाज और राजनीति से कट गये थे, अथवा बंगाल की ‘अनुशीलन समिति’ या ‘युगांतर’ को अपना आधार बनाया जिन्होंने सिंगापुर से मैक्सिको तक के देशों में प्रथम महायुद्ध के दौरान सशस्त्र क्रांति के लिये अस्त्र संग्रह किया था।

लोहिया की अपनी दृष्टि थी, भारतीय राजनीतिक समस्याओं के प्रति अपने विचार थे, उनके हल के लिये अपनी योजनाएं थीं और उन योजनाओं का केंद्र था – भारत। और उस भारतीय केंद्र का चूड़ामणि चूंकि गांधीजी थे इसलिये गांधीवाद की ओर भी उनका मन स्वाभाविक रूप से आकृष्ट हुआ। लोहिया गांधीजी से मिले, उनके साथ रहे, उनकी भावसरणी का अध्ययन किया, बहुत कुछ उनसे लिया – बहुत कुछ त्यागा और बहुत कुछ जोड़ भी दिया। ‘रामवादी’ गांधी का सर्वस्व लोहिया को ग्राह्य हो भी कैसे सकता था! गांधी के पूछने पर लोहिया ने स्पष्ट भी कर दिया कि वे अनीश्वरवादी हैं और समाज को क्रिया द्वारा बदलने में विश्वास करते हैं और उस दिशा में वे नहीं समझते कि जन आंदोलन के अतिरिक्त भी कोई कारगर औजार हो सकता है। लोहिया गांधीजी के साथ एक काल तक रहे पर अंत में कांग्रेस की अनेक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह कर उन्हें अलग होना पड़ा। देश के हजार-हजार युवजन जो आंख मूंद कर दूसरों के विचारों पर चला करते थे अब अपने इस नव नेता के सानिध्य में स्वतंत्र रूप से सोचने लगे। अब तक लोहिया स्वयं भी ज्ञान, अनुभव और आयु से पक चले थे जिससे देश की उदयीमान, विचारशील भावसत्ता का नेतृत्व करना उनके लिये सहज हो गया था। विचारों की क्षमता उनकी अपनी थी और विचारों में वे कभी देश-विदेश का अंतर नहीं पैदा करते थे परंतु एक मूलभूत आधार उनके विचारों का निश्चय ही था – देश की राष्ट्रीयता। और उस राष्ट्रीयता को गांधीजी ने कितना पहचाना था, इसका न केवल उन्हें सही अंदाज था बल्कि उसके प्रति आरम्भ से ही एक सीमा तक आग्रह भी हो गया था। लोहिया को आधुनिक यूरोपीय अथवा समाजशास्त्रीय विचारों के संदर्भ में गांधीजी के ज्ञान की सीमा का आभास था कि वह टालस्टाय अथवा रस्किन या थोरो की उदार मानवीयता से आगे नहीं जाती है, फिर भी उसे तर्क मात्र से उड़ा देने के लिये वे तैयार न थे जिस तरह उनके अनेक सहयोगी तैयार थे।

गांधीजी के सानिध्य ने एक और भावना भी लोहिया के भीतर भरी। वह भावना थी सत्य के प्रति आग्रह की और उस आग्रह के लिये बलिदान कर देने का साहस। जीवन को गांधीजी ने केवल साधन माना, साध्य (सत्य) नहीं और उसी साध्य के लिये साधन को उन्होंने मर कर मिटा भी दिया। इसको प्रमाणित करने की लोहिया के सामने कोई आवश्यकता नहीं थी, सब कुछ उन्होंने नंगी आंखों देखा था और उस शहादत पर वे न्योछावर हो गए थे। ऐसा भी नहीं कि उनमें साहस की कमी रही हो। साहस और लोहिया वस्तुतः भिन्न पदार्थ न थे, जिसका उदाहरण खूनी कलकत्ता की एक गली में एक सिरे से दूसरे सिरे तक शांति का नारा बुलंद करते हुए जाना था। उनके प्रारम्भिक साथियों में से सम्पूर्णानंद और अशोक मेहता कट गये, जयप्रकाश विप्रस्थित हो गये, अच्युत पटवर्धन घट गये पर लोहिया अपनी राह पर अटल रहे। ज्ञान और साहस का ही वह अदभुत् प्रमाण था कि जहां एम एन राय अपने ही मुकदमे पर बहस करते हुए टूट गये थे वहीं लोहिया अपने मुकदमे में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को कानूनी तर्क से सम्बोधित और प्रेरित करते हुए न स्वयं दोषमुक्त हुए बल्कि उन्होंने राज्य (उत्तरप्रदेश) के तीन हजार सत्याग्रहियों को भी कारागार से मुक्त करा लिया था।

ऐसा अदभुत् और निराला व्यक्तित्व था डॉ. राममनोहर लोहिया का! उनका व्यक्तित्व कर्म और चिंतन का एक ऐसा इंद्रधनुष था जिसमें कई रंगों का नैसर्गिक संगम हो गया था, और जिसने अपनी छटा से पक्ष-विपक्ष सभी का मन मोह रखा था। लोहिया के रूप में सृष्टि ने भारतीय राजनीति को एक ऐसी अनुपम भेंट दी थी जो किसी एक शताब्दी में सिर्फ एक ही होती है जिसकी तुलना किसी अन्य से नहीं की जा सकती। लोहिया ऐसी ही अतुलनीय शख्सियत के स्वामी थे।

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