असम  सरकार आबादी को लेकर लगातार तमाशे कर रही है।  एनआरसी का खेल तो अभी बरसों चलने वाला है। इसी बीच  राज्य सरकार ने फैसला कर लिया है कि  दो से अधिक बच्चों वाले माता-पिताओं को 2021 के बाद सरकारी नौकरी नहीं दी जाएगी और 2021  के बाद तीसरा बच्चा पैदा करने वालों पर अनुशासन की कार्रवाई की जाएगी।  सरकार अपनी पीठ खुद थपथपा रही है और अपने काम को ‘‘क्रांतिकारी’’ बता रही है।   असम में आबादी बढने की दर उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों से कम है। जाहिर है  राज्य  का यह फैसला आबादी नियंत्रण से ज्यादा राजनीति से प्रेरित है। आबादी से लोग  पहले से डरे हैं, इस कदम से उन्हें और डराने का काम किया जा रहा है।  भाजपा देश के हर हिस्से में लोगों को डराने का ही एजेंडा चला रही है।
सवाल उठता है कि क्या ऐसे कदमों से आबादी बढने की रफ्तार कम करने में मदद मिलती है? इसका उत्तर नोबेल पुरस्कार  अमर्त्य सेन ने दिया है। आबादी नियंत्रण के कठोर उपायों के बारे में उनका कहना है कि ये उन लोगों के खिलाफ है जो पहले से कठिनाई में हैं। उनकी राय में यह खासकर औरतों के खिलाफ है। उन्होंने बताया कि आबादी नियंत्रण के ऐेसे उपायों से शिशु मृत्यु दर घटने के बदले बढती है और बालिका शिशु मृत्यु दर में ज्यादा बढोतरी होती है। क्या इसका अर्थ यह है कि अबादी नियंत्रण के लिए सरकार कोई नीति नहीं बनाए और न कोई हस्तक्षेप करे ? इसके उलट सरकार को अवश्य हस्तक्षेप करना चाहिए और इसे ठोस ढंग से करना चाहिए। लेकिन उसकी नीति उन सिद्धांतों के आधार पर नहीं होना चाहिए जो अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं और जो बीमारी के बदले बीमार को निशाना बनाते हैं। समस्या आबादी का बढना है, वे लोग नहीं जो आबादी बढाते हैं। आबादी बढाने वाला वर्ग ख्ुद इस समस्या का शिकार है।
सेन की कुछ और प्रस्थापनाओें का हमें ध्यान रखना चाहिए क्योंकि बिना गहरी समझ वाली नीति के आबादी नियंत्रण के प्रभावी कार्यक्रम नहीं बनाए जा सकते। एक तो बड़ी आबादी भुखमरी तथा अकाल नहीं लाती और न ही ये विकास में बाधा पहुंचाती है। सेन ने पर्यावरण-परिवर्तन में भी दुनिया की बढती आबादी के योगदान को नकारा है। उनका कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग तथा ओजोन के स्तर में कमी के लिए बड़ी आबादी वाले देशों के मुकाबले कम अबादी वाले यूरोप तथा अमेरिका के विकसित देश ज्यादा जिम्मेदार हैं।
क्या सेन के विचारों से यह नतीजा निकाला जाए कि घनी आबादी वाले इलाकों में रहने वाले अपनी आबादी पर कोई लगाम न लगाएं और इसे बढने दें? यह नतीजा एकदम गलत होगा। असल में, ये अर्थशास्त्री आबादी बढने के मूल कारणों में जाने तथा उन्हें दूर करने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका कहना है कि आबादी बढने का खामियाजा उन लोेगों को भुगतना होता है जिनकी आबादी बढती है। वह ज्यादा आबादी के कारण नागरिक सुविधाओं में आने वाली कमी जैसी दिक्कतों को वास्तविक समस्या मानते हैं। सबसे ज्यादा शोषण औरतों का होता है जो बच्चा जनने तथ पालने के काम में अपनी जिंदगी गंवा देती हैं।
आबादी बढने का मूल कारण गरीबी, अशिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव है और इसे समझे बिना हम आबादी पर नियंत्रण नहीं पा सकते हैं। इसे समझने के लिए हमें अपने देश के विभिन्न राज्यों में आबादी के आंकड़ों पर गौर करना चाहिए। आबादी के लिहाज से देश दो हिस्सों में बंटा दिखाई देता है। एक ओर, दक्षिण के राज्य हैं जहां आबादी के बढने की दर काफी कम है और दूसरी ओर उत्तर के राज्य हैं जिनकी आबादी बहुत तेजी से बढ रही है। पिछली जनगणना के मुताबिक इसमें उत्तर प्रदेश, बिहार राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में अबादी बढने की दर 20 प्रतिशत से ज्यादा है। बिहार के मामले में यह 25 प्रतिशत है।
अध्ययनों से साफ जाहिर होता है कि दक्षिण के राज्यों में आबादी के काबू में आने की वजह आबादी  नियंत्रण के कठोर उपाय नहीं हैं, बल्कि स्वास्थ्य तथा शिक्षा की व्यवस्था में बेहतरी है। दो आंकड़ों पर नजर डालने से बात स्पष्ट हो जाती है। 1951 की जनगणना के अनुसार, तमिलनाडु की आबादी बिहार से थोड़ी ज्यादा थी। साठ साल बाद यानि 2011 की जनगणना में बिहार की आबादी डेढ गुना ज्यादा है। ऐसा ही मध्य प्रदेश के मामले में है। मध्य प्रदेश की आबादी केरल के मुकाबले 37 प्रतिशत ज्यादा थी, यह 217 प्र्रतिशत ज्यादा हो गई। दक्षिण के राज्यों में यह चमत्कार मानव सूचकांकों के बेहतर होने के कारण हुआ। वहां शिशु मृत्यु दर और प्रसूति मृत्यु दर , कुपोषण पर काबू पाया जा सका है। इन राज्यों ने अपनी गरीबी पर काबू पाया है।
इसका अर्थ यह है कि बढती आबादी को रोकने के लिए उत्तर प्रदेश तथा बिहार जैसे राज्यों को अपनी स्वास्थ्य तथा शिक्षा योजनाओं पर खुले दिल से खर्च करना चाहिए। उन्हें यह समझना चाहिए कि बढी आबादी ने उन्हें अपने राजनीतिक अधिकारों से वंचित कर रखा है। संसद की सीटों की संख्या बढने से रोक दी गई है। इसका सीधा असर ज्यादा आबादी वाले  राज्यों के प्रतिनिधित्व  पर पड़ा है।  कम आबादी वाले राज्यों में जितने लोगों पर एक सांसद है, यहाँ  उससे काफी ज्यादा लोगों के लिए एक सांसद हैं।  यानि काम आबादी वाले राज्यों का बड़ी आबादी वाले  राज्यों से संसद में ज्यादा  प्र्रतिनिधित्व  है। आबादी के अनुपात में ज्यादा आबादी वाले राज्यों के प्रतिनिधि कम हैं। यही नहीं, उनकी आबादी का बड़ा हिस्सा दूसरे राज्यांं के विकास तथा सेवा के लिए अपना श्रम दे रहा है। इससे बचने का एक ही उपाय है कि वह अपनी आबादी कम करे। देश के स्तर पर भी हमें ऐसे ही उपाय करने होंगे। हमारी आबादी 20124 में चीन से ज्यादा हो जाएगी और इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है।

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