हमारे बारे में

भारत को आजाद हुए सात दशक हो चुक हैं, लेकिन वह आज फिर से अपनी तकदीर के चौराहे पर खडा है। स्वाधीनता संग्राम के दौरान विकसित हुए जिन राष्ट्रीय मूल्यों के साथ नए भारत का सपना देखा गया था, वह हमसे काफी दूर जा चुका है। सभ्यता-संस्कृति की ऊंचाइयां छूने और आर्थिक प्रगति का जो लक्ष्य हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं और संविधान निर्माताओं ने बनाया था, उसके पास पहुंचने में हम नाकाम रहे। समाज के वंचित वर्ग में निराशा, अल्पसंख्यकों में निराशा तथा युवा वर्ग में बेचैनी है। देश में लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समता के मूल्यों पर लगातार हमले हो रहे हैं। विधायिका, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, सूचना आयोग सतर्कता आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) समेत तमाम संवैधानिक संस्थाओं को योजनाबद्ध तरीके से पंगु बनाया जा रहा है। जीवन के हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार का घटाटोप है। समाज में जातीय-सांप्रदायिक नफरत की फसलें लहलहा रही हैं।
ऐसे दौर में मीडिया का दायित्व बहुत बढ जाता है। लेकिन मुख्यधारा का मीडिया कारपोरेट पूंजी की गिरफ्त में है और सच्चाई के बदले मिथ्या का सहारा लेकर सत्ता का दास बना हुआ है। देश के संविधान में आस्था रखने वाले लोग इस स्थिति को बदलने के लिए तरह-तरह से दखल दे रहे हैं। हमारा यह प्रयास भी इन्ही में से एक है। हमारा संकल्प है- हालात चाहे जैसे हों, हम हिम्मत नहीं हारेंगे।
हम नई शुरुआत एक न्यूज पोर्टल द्रोहकाल से कर रहे हैं। मासिक पत्रिका रविवार डाइजेस्ट के रूप में हमारा एक प्रयास पहले से जारी है। न्यूज पोर्टल के जरिए हम समाचार और विचार, दोनों को बोलचाल की भाषा में आम लोगों तक पहुंचाएंगे। लोकतंत्र, समाजवाद, मानव अधिकार, सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और स्त्री-पुरुष समानता हमारी मूल प्रतिबद्धताएं हैं, जो किसी भी तरह के सरकारी और कारपोरेट दबाव से मुक्त रहेंगी। इन्हीं प्रतिबद्धताओं के आधार पर द्रोहकाल का एजेंडा है- देश की परिस्थितियों में बदलाव।

 

संस्थापक संपादक

 
अनिल सिन्हा पत्रकार और लेखक हैं। द्रोहकाल के संस्थापक संपादकों में से एक अनिल सिन्हा मूलत: मुंगेर (बिहार) के हैं और लंबे समय तक मुंबई और नागपुर में रहने के बाद पिछले बारह वर्षों से दिल्ली में रहकर पत्रकारिता कर रहे हैं। अपनी पत्रकारिता की शुरुआत भागलपुर से करने वाले अनिल ने प्रांरभिक दौर में धर्मयुग और राजस्थान पत्रिका की इतवारी के लिए भी लेख लिखे हैं। तीन दशक से भी ज्यादा के अपने कॅरिअर में अनिल सिन्हा ने नवभारत टाइम्स, जनसत्ता, लोकमत समाचार दैनिक भास्कर के अलावा संडे गार्डियन, डेक्कन हेराल्ड और ईटीवी बिहार में भी काम किया है। लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समतावादी मूल्यों के साथ पत्रकारिता में सक्रिय अनिल मानवाधिकार आंदोलनों से भी गहरे तक जुडे हैं।
 
डॉ. सुभाष खंडेलवाल लेखक और पत्रकार होने के साथ ही राजनीतिक आंदोनकारी भी रहे हैं। द्रोहकाल के संस्थापक संपादकों में से एक सुभाष खंडेलवाल ‘रविवार डाइजेस्ट’ के प्रधान संपादक भी हैं। वे इंदौर (मध्य प्रदेश) में रहते हैं और अपने समय के चर्चित छात्रनेता रहते हुए लंबे समय तक देवी अहिल्या विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद के सदस्य रहे हैं। सुभाष लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी करते हुए आपातकाल के दौरान मीसा के तहत जेल में भी रहे। इसके अलावा भी छात्र राजनीति और समाजवादी आंदोलन में रहते हुए कई बार जेल जा चुके हैं। सुभाष खंडेलवाल राजनीति, समाज और संस्कृति से जुडे सम-सामयिक मुद्दों पर बेबाकी से लिखते हैं और प्रभावी वक्ता भी हैं।
 
अनिल जैन द्रोहकाल के तीसरे संस्थापक संपादक हैं। पिछले तीन दशक से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय अनिल जैन मूलत: इंदौर (मध्य प्रदेश) के रहने वाले हैं। इंदौर में नवभारत से अपनी पत्रकारिता शुरू कर चौथा संसार, शनिवार दर्पण और दैनिक भास्कर में काम करने के बाद अनिल पिछले करीब दो दशक से दिल्ली में रहते हुए दैनिक भास्कर, इंडो-एशियन न्यूज सर्विस, अमर उजाला, नईदुनिया और नेशनल दुनिया अखबार में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। इन दिनों वे रविवार डाइजेस्ट के सलाहकार संपादक हैं। बीबीसी, द वायर आदि पोर्टल तथा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्वतंत्र रूप से लिखते रहे हैं। इसके अलावा वे बतौर गेस्ट फैकल्टी मीडिया अध्यापन भी करते हैं। अनिल तीन पुस्तकों ‘राष्ट्रीयता बनाम हिंदुत्व’, ‘धर्म और धर्मसत्ता’ तथा ‘यादों में प्रभाष’ का सहलेखन और संपादन भी कर चुके हैं।