भारतीय रिजर्व बैंक ने कल जो अपनी वार्षिक जनरल रिपोर्ट जनता के सामने पेश की है यदि उस पर भरोसा के तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चार साल के कार्यकाल में देश की बदहाल हुई अर्थव्यवस्था की सच्ची तस्वीर निकल कर सामने आ जाती है। इस रिपोर्ट से यह तो सिद्ध हो ही गया है कि नोटबन्दी पूरी तरह से फ़ेल हो गई है, लेकिन इस तथ्य एक तरफ रख दें, तब भी इस रिपोर्ट से मोदी सरकार के नेतृत्व में देश के बर्बाद होने वाले भविष्य की भयावह तस्वीर उभर रही है।

देश का बिका हुआ और डरा हुआ मीडिया कभी इस तरह के विश्लेषण पेश नहीं करता है, इसलिए यही पर एक नजर डाल लीजिए।

सबसे बड़ा आश्चर्यजनक तथ्य तो यह सामने आया है कि मोदी सरकार के अब तक के चार में से आखिरी तीन सालों में सरकारी बैंकों के एनपीए मे 6.2 लाख करोड़ की वृद्धि हुई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी ) का कुल सकल एनपीए 31 मार्च, 2018 तक बढ़कर 10,35,528 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो 31 मार्च, 2015 को 3,23,464 करोड़ रुपये था।

यानी सारा घाटा मोदी सरकार के समय ही सामने आया है। रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार बैकिग प्रणाली मे मार्च, 2018 के अंत तक कुल एनपीए और पुनर्गठित कर्ज कुल ऋण के 12.1 प्रतिशत पर पहुंच गया है जो बेहद खतरनाक स्तर है। भविष्य को लेकर रिजर्व बैंक का कहना है कि बैंकों को अभी गैर निष्पादित आस्तियों (एनपीए) की समस्या से निजात नहीं मिलने वाली है। केंद्रीय बैंक ने कहा कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों के मद्देनजर चालू वित्त वर्ष मे बैकों का डूबा कर्ज और बढ़ेगा।

रिजर्व बैंक ने सरकार को महंगाई के मोर्चे पर भी चेताते हुए कहा कि आने वाले दिनों में महंगाई की दर और ऊपर जाने की आशंका है और इसके लिए तैयारी और सावधानी दोनों की जरुरत है। रिजर्व बैंक ने महंगाई पर काबू पाने के लिए तत्काल कदम उठाने की सलाह देते हुए कहा कि वर्तमान में देश का व्यापार घाटा पांच साल के उच्चतम स्तर पर पहुंचकर 18 अरब डॉलर हो गया है। इसी तरह बीती जुलाई में थोक महंगाई सूचकांक की दर बढ़कर 5.09% पहुंच गई जबकि साल 2017 की जुलाई में यह दर महज 1.88% पर थी

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और तेल बाजार में मांग व आपूर्ति में हो रहे बदलाव का सबसे अधिक प्रभाव देश के व्यापार घाटे पर होने वाला है। ऐसी आशंका है कि चालू वित्त वर्ष में जीडीपी के 2.8 प्रतिशत पर चालू खाता घाटा पहुंच जाएगा। कल ही रुपया 42 पैसे टूटा है और 70.52 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है,। एक लीटर पेट्रोल की कीमत 85.60 रुपये तक पुंच गई है।

लेकिन इस संदर्भ में एक बात और गौरतलब है कि 2013-14 में तेल की औसत कीमतें 2017-18 की तुलना में दुगुनी से भी अधिक थी, पर तब व्यापार घाटा 13.4 बिलियन डॉलर ही रहा था। लेकिन वर्तमान में आयात में तेज उछाल के कारण इस साल जुलाई में मासिक व्यापार घाटा पांच साल का रिकार्ड तोड़ते हुए 18.02 बिलियन डॉलर तक जा पहुंचा है।

व्यापार घाटे में वृद्धि तेल और सोने-चांदी से इतर वस्तुओं के आयात के बढ़ने से हो रही है। साल 2013-14 में इस श्रेणी में व्यापार घाटा सिर्फ 0.4 बिलियन डॉलर रहा था, जो पिछले वित्त वर्ष में 53.3 फीसदी के स्तर तक पहुंच गया. बीते सालों में हमारे आयात की मात्रा तेजी से बढ़ रही है, पर निर्यात में मामूली इजाफा हो रहा है।

इसीलिए इस बढ़ते व्यापार घाटे के लिए न तो नेहरू जिम्मेदार हैं और न ही देश की बैंकिंग व्यवस्था। बैंकिंग व्यवस्था को डुबो देने का का आरोप भी नेहरू या डॉ. मनमोहन सिंह पर नहीं लगाया जा सकता। कुल मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देने की पूरी जिम्मेदारी मोदी सरकार की है।

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