भारत सरकार की ओर से अमीरों को कर में भारी छूट प्रदान की जाती है। पिछले कई सालों के दौरान हर वर्ष बजट में एक विवरण शामिल किया जाता है जिसमें यह अनुमान दर्ज़ किया जाता है कि केंद्र सरकार द्वारा मुख्य करों में दी गई छूट के कारण पिछले वित्त वर्ष में राजस्व में कितनी कमी हुई। बजट दस्तावेज़ों से यह जानकारी मिलती है कि अपने प्रथम तीन वर्षों के दौरान मोदी–जेटली सरकार ने अति धनाढ्य वर्ग को १६.५ लाख करोड़ रुपए की कर छूट प्रदान की है। यह कर छूट कॉर्पोरेट आयकर, सीमा एवं आबकारी शुल्कों में दी गई है।

इस वर्ष सरकार ने आबकारी एवं सीमा शुल्क के माध्यम से अति धनाढ्य वर्ग को प्रदान की गई कर छूट का पूर्ण अनुमान नहीं लगाया है। बहुत से अप्रत्यक्ष कर जीएसटी के अंतर्गत लाए गए हैं, और बजट में कहा गया है कि जीएसटी के अंतर्गत छूट के कारण बट्टे खाते में डाले गए राजस्व की गणना अगले वर्ष की जाएगी। जहां तक कॉर्पोरेट कर में  माफी के चलते सरकार को हुए नुकसान का सवाल  है, २०१८–१९ के बजट में यह अनुमान लगाया गया है कि पिछले वर्ष, यानी कि २०१७–१८ में, यह राशि ८५,०२६ करोड़ रुपए थी। २०१६–१७ में यह सब्सिडी अनुमानतः ८३,४९२ करोड़ रुपए थी।

चूंकि २०१७–१८ में कॉर्पोरेट कर माफी उसके पहले के वर्ष की तुलना में (बजट अनुमान) ज़्यादा है, अतः हम अनुमान लगा सकते हैं कि २०१७–१८ में अति धनाढ्य वर्ग को कुल कर माफी कम-से-कम २०१६–१७ जितनी ही, अर्थात ५.५ लाख करोड़ रुपए, दी गई होगी।

कर संग्रह : आम लोगों पर बोझ डालना
सरकार न केवल धनी वर्ग को बहुत अधिक कर छूट प्रदान कर रही है, अधिकांश कर उगाही आम लोगों से करती है। इस तथ्य को समझने के लिए सरकार की कर संरचना को समझना आवश्यक है।
दो प्रकार के कर लगाए जाते हैं, प्रत्यक्ष कर एवं अप्रत्यक्ष कर। प्रत्यक्ष कर आय पर लगाए जाते हैं, जैसे कि वेतन, लाभ, संपत्ति आदि पर, और इनका अधिकांश बोझ धनाढ्य वर्ग पर पड़ता है; जबकि अप्रत्यक्ष कर वस्तुओं और निर्व्यक्तिक सेवाओं पर लगाए जाते हैं और इनका बोझ गरीब और अमीर दोनों पर पड़ता है। कराधान की समतावादी प्रणाली व्यक्तियों और निगमों के ऊपर उनकी कर अदा करने की क्षमता के अनुरूप कर लगाती है। इसका निहितार्थ यह है कि ऐसी व्यवस्था में सरकार अप्रत्यक्ष करों की बजाए प्रत्यक्ष करों के माध्यम से अधिक कर संग्रहण करती है।

दुनिया के अधिकांश पूंजीवादी देशों में, फिर चाहे वे दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील जैसे विकासशील देश हों अथवा विकसित ओईसीडी राष्ट्र हों, प्रत्यक्ष कर राजस्व कुल कर राजस्व का ५५% से ६५% अथवा इससे भी अधिक है। लेकिन ‘समाजवादी’ भारत में कर के रूप में संग्रहित किए गए प्रत्येक १०० रुपए में से मात्र ३० रुपए ही प्रत्यक्ष कर के रूप में संग्रहित किए जाते हैं (बाकी ७० रुपए अप्रत्यक्ष करों के रूप में एकत्रित किए जाते हैं)।

सरकार इस तथ्य से अवगत है। आर्थिक सर्वेक्षण २०१७–१८ यह स्वीकार करता है कि यूरोप की कर व्यवस्था में लगभग ७०% प्रत्यक्ष कर है। वह इस तथ्य को भी स्वीकार करता है कि अन्य उभरती हुई बाज़ार अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत के कुल कर राजस्व में प्रत्यक्ष कर का अनुपात बहुत कम है (चीन को छोड़कर, जो कि एक अलोकतांत्रिक देश है)।

राज्यों द्वारा अधिकांश कर संग्रहण अप्रत्यक्ष करों के रूप में किया जाता है। प्रत्यक्ष करों का संग्रहण मुख्यतः केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है। मनमोहन सरकार के समय से ही केंद्र के कर राजस्व में प्रत्यक्ष करों के अनुपात में निरंतर गिरावट आती जा रही है। २००९–१० में केंद्र के सकल कर राजस्व में प्रत्यक्ष करों का अंश ६१% था, २०१३–१४ में  में यह घटकर ५६% हो गया। मोदी सरकार के अंतर्गत २०१७–१८  में यह और अधिक गिरकर ५२% हो गया।
आर्थिक सर्वेक्षण २०१७–१८ में यह स्वीकार किया गया है कि जीएसटी लागू होने के पश्चात अप्रत्यक्ष करों पर निर्भरता में और अधिक वृद्धि होगी।

भारत: गैर-टैक्स राजस्व
निजी निगमों और अति धनाढ्य वर्ग को बड़ी मात्रा में सरकारी कोष और संसाधनों देने के कारण सरकार का वास्तविक गैर-कर राजस्व बहुत न्यून है। यदि यह हस्तांतरण न किया जाता तो सरकार अपने गैर-कर राजस्व में बहुत अधिक वृद्धि कर सकती थी अथवा अपने बजट व्यय में बचत कर सकती थी। अमीरों द्वारा लिए गए कर्ज़ को माफ करना, नगण्य रॉयल्टी के बदले देश की खनिज संपदा एवं संसाधनों का नियंत्रण निजी निगमों को सौंपना, बहुत कम कीमत पर सार्वजानिक क्षेत्र के लाभजनक निगमों का स्वामित्व विदेशी एवं भारतीय निजी व्यावसायिक घरानों को प्रदान करना, ‘निजी–सार्वजानिक सहभागिता’ के नाम पर ढांचागत  परियोजनाओं में निवेश में निजी निगमों को प्रत्यक्ष सब्सिडियां प्रदान करना, आदि इस हस्तांतरण के कुछेक माध्यम हैं। इस प्रकार लाखों करोड़ रुपए की सार्वजानिक संपदा को निजी तिजोरियों में उंडेला जा रहा है।

यहां उदाहरणस्वरूप सिर्फ दो आंकड़ों की चर्चा कर लेते हैं:

·    मोदी सरकार के पहले तीन सालों के दौरान सरकारी बैंक बड़े कॉर्पोरेट घरानों का १.८७ लाख करोड़ रुपए का ऋण माफ कर चुके हैं। इसके अलावा बैंक ‘बड़े और ताकतवर’ लोगों का कई लाख करोड़ रुपए का ऋण (वास्तविक संख्या ज्ञात नहीं है) की पुनःसंरचना भी कर चुके हैं—यह घुमाफिराकर कर्ज़ माफी करने का एक तरीका है। इसके बावजूद भी जून २०१७ तक सरकारी बैंकों की कुल NPAs अर्थात न चुकाया जाने वाला ऋण ९.५ लाख करोड़ रुपए हो चुकी थीं। अब आरबीआई ने इस ऋण की पुनःसंरचना की प्रक्रिया भी तेज़ कर दी है।
सरकारी बैंकों के इस नुकसान की भरपाई करने के लिए सरकार इनको सार्वजनिक निधि में से पूंजी प्रदान करती है, इस प्रक्रिया को बैंकों का पुनःपूंजीकरण कहा जाता है। इस वर्ष सरकार ने घोषणा की है कि वह अगले दो वर्षों के दौरान सार्वजनिक बैंकों को २.११ लाख करोड़ रुपए की पूंजी प्रदान करेगी। लेकिन सरकार ने बजट में इस राशि का ज़िक्र नहीं किया है। सरकार का कहना है कि वह १.३५ लाख करोड़ रुपए के पुनःपूंजीकरण बांड ज़ारी करेगी और ५८,००० करोड़ रुपए का इंतज़ाम बैंकों को बाज़ार से करना होगा, बजट संसाधनों में से केवल १८,००० करोड़ रुपए का आवंटन किया जाएगा। बांड ज़ारी करने का अर्थ यह है कि आने वाले वर्षों में सरकार को इन बांड्स पर ब्याज़ अदा करना होगा—अतः सरकार ने यह भार आने वाले वर्षों के लिए टाल दिया है।
ऋण को बट्टे खाते में डालने का सरकार की आय पर एक और परिणाम यह हुआ है कि प्रभावित बैंक या तो सरकार को लाभांश अदा ही नहीं करते हैं या फिर बहुत कम लाभांश अदा करते हैं। इस कारण वित्त वर्ष २०१७–१८ में सरकार के राजस्व में कई हज़ार करोड़ रुपए की कमी आई है।
·    मोदी सरकार द्वारा पेश किए गए पांचों बजटों में सड़कों एवं राजमार्गों के निर्माण हेतु कुल मिलकर २.६८ लाख करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई है। सरकार अब राजमार्गों का निर्माण नहीं करती है। इनका निर्माण निजी निगमों द्वारा किया जाता है जो अपने निवेश के एवज़ यात्रियों से टोल टैक्स वसूल करते हैं। तो फिर सड़कों और राजमार्गों के निर्माण हेतु इतनी बड़ी राशि क्यों आवंटित की गई है? यह सरकार द्वारा निजी निगमों को ‘प्रोत्साहन’ के रूप में दी गई सब्सिडी है—यह ऋण नहीं बल्कि अनुदान है—ताकि वे राजमार्गों के निर्माण में निवेश करने को उत्सुक हों; यह अलग बात है कि इस सब्सिडी—जो कि कुल परियोजना लागत का ४०% तक होती है—के साथ-साथ ये निगम टोल के द्वारा अर्जित आय को भी अपनी जेब में डाल लेते हैं।
कॉर्पोरेट घरानों द्वारा देश की संपदा और संसाधनों की यह अंधी लूट इस हद तक पहुंच चुकी है कि भूतपूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन—जो कि स्वयं नवउदारवाद एवं वैश्वीकरण के धुर समर्थक हैं—तक ने “धनलोलुप राजनेताओं” और “क्रोनी कैपिटलिस्टों” की इस आपसी सांठगांठ की आलोचना की है। इस तथ्य पर प्रकाश डालने के पश्चात कि प्रति ट्रिलियन डॉलर जीडीपी के आधार पर विश्व में भारत में (रूस के पश्चात) अरबपतियों की सबसे बड़ी संख्या है, उन्होंने इंगित किया कि “तीन कारक—ज़मीन, प्राकृतिक संसाधन और सरकारी संविदाएं अथवा लाइसेंस—हमारे अरबपतियों की संपदा का प्रधान स्रोत हैं। और इन तीनों कारकों का स्रोत सरकार में निहित है।”
विश्व बैंक द्वारा थोपी गई नवउदारवादी नीतियों के परिणामस्वरूप देश के अति धनाढ्य वर्ग की संपदा में तीव्र वृद्धि हुई है।  वर्ष २००० में देश के १% अमीरतम लोगों के पास देश की कुल संपदा का ३६.८% था। जब २०१४ में मोदी सत्ता में आए तो इस तबके के पास देश की ४९% संपदा थी। सिर्फ दो ही सालों में, २०१६ तक, यह आंकड़ा बढ़कर ५८.४% तक जा पहुंचा है।

उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि यदि भारत सरकार अमीरों को दी जाने वाली अकूत सब्सिडियों में कटौती करे, तो उसके कुल राजस्व में काफी वृद्धि हो सकती है।

( लेखक समाजवादी विचारक हैं और पुणे की ‘लोकायत’ नामक संस्था के संयोजक और वैचारिक अंग्रेजी साप्ताहिक ‘जनता’ के संपादक।  आईआईटी, बनारस से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में विशिष्टाता के साथ स्नातक की डिग्री लेने के बाद  से वह सामाजिक बदलाव के लिए पूर्णकालिक  रूप से कार्य करत्ते हैं।  )

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