जीडीपी संवृद्धि दर (विकास दर) के आंकड़ों के संदर्भ में मोदी सरकार वास्तविकता से आंख बचाने के लिए शुतुरमुर्ग की तरह  अपनी गर्दन जमीन में घुसा लेती है ।  वह  दावा कर रही है कि अर्थव्यवस्था बहुत बेहतर स्थिति में है।

“मई २०१४ में हमारी सरकार आने के बाद से अर्थव्यवस्था की हालत बहुत बेहतर हुई है। सरकार के पहले तीन सालों के दौरान भारत ने औसत ७.५% संवृद्धि दर हासिल की। . . . दूसरी तिमाही में ६.३% की जीडीपी संवृद्धि दर अर्थव्यवस्था की बेहतरी का संकेतक है। हमें उम्मीद है कि दूसरी छमाही में हम ७.२% से ७.५% तक की संवृद्धि दर हासिल कर पाएंगे। . . . हम ८% तक की संवृद्धि दर हासिल करने की ओर बढ़ रहे हैं”, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दावा किया था।

सच्चाई यह है कि पहले दो वर्षों के दौरान सरकार ने जीडीपी आकलन की प्रणाली में दो बार संशोधन किए, ताकि संवृद्धि दर को ७% से ऊपर दिखाया जा सके। इसके बावजूद २०१६ के बाद से जीडीपी संवृद्धि दर में पुनः गिरावट आनी शुरू हो गई। लगातार छह तिमाहियों तक इसमें निरंतर गिरावट आई, २०१६ की पहली तिमाही में यह ९.२% थी जो गिरते-गिरते २०१७ की दूसरी तिमाही तक ५.७% तक आ गई। अब सरकार दावा कर रही है कि अर्थव्यवस्था में पुनः सुधार आना शुरू हो गया है, २०१७ की तीसरी तिमाही में इसमें ६.३% की वृद्धि हुई और भविष्य में इसमें और अधिक वृद्धि होने की संभावना है।

वास्तविकता यह है कि संवृद्धि में पुनरुद्धार का यह दावा अधूरे आंकड़ों पर आधारित है। २०१७ की तीसरी तिमाही में ६.३% की वृद्धि दर का सरकारी अनुमान तिमाही आंकड़ों पर आधारित है, और तिमाही आंकड़े मुख्यतः संगठित क्षेत्र द्वारा दी गई सूचनाओं पर आधारित होते हैं। इसमें असंगठित क्षेत्र का डाटा सम्मिलित नहीं होता है, जो देश में रोज़गार का ९३% तथा कुल उत्पादन का ४५% प्रदान करता है।

सरकार द्वारा असंगठित क्षेत्र का डाटा आवधिक सर्वेक्षणों द्वारा एकत्रित किया जाता है। विमुद्रीकरण (नवंबर २०१६ में घोषित) तथा जीएसटी (जुलाई २०१७ में लागू) के कारण असंगठित क्षेत्र बहुत बुरी तरह से प्रभावित हुआ था। लेकिन इन दोनों ही कदमों का असंगठित क्षेत्र पर पड़े प्रभावों का अनुमान लगाने के लिए सरकार ने कोई सर्वेक्षण नहीं करवाया है। जब डाटा ही मौजूद नहीं है, तो सरकार ने तिमाही संवृद्धि दर में असंगठित क्षेत्र के योगदान का आकलन किस आधार पर किया है? सरकार ने यह स्वीकार किया है कि इसने संगठित क्षेत्र की वृद्धि के डाटा के आधार पर यह आकलन किया है।[ii] सामान्य परिस्थितियों में यह तरीका काम कर सकता है। लेकिन विमुद्रीकरण और जीएसटी के कारण असंगठित क्षेत्र सिकुड़ गया था, जब कि संगठित क्षेत्र पर इनका अधिक प्रभाव नहीं पड़ा था, और इसलिए इन परिस्थितियों में यह तरीका सही नहीं है। अतः, वित्त मंत्री द्वारा २०१७ की तीसरी तिमाही के लिए प्रस्तुत की गई आधिकारिक संवृद्धि दर के बारे में केवल यही कहा जा सकता है कि यह दर्शाती है कि दूसरी तिमाही की तुलना में तीसरी तिमाही के दौरान संगठित क्षेत्र की संवृद्धि दर में बढ़ोतरी हुई।

हालांकि सरकार ने असंगठित क्षेत्र पर विमुद्रीकरण और जीएसटी के प्रभावों का अनुमान लगाने के लिए कोई सर्वेक्षण नहीं किया है, लेकिन बहुत से निजी सर्वे इस क्षेत्र में नकारात्मक वृद्धि दर की ओर इशारा करते हैं। इस आकलन और संगठित क्षेत्र की सकारात्मक वृद्धि का समामेलन करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि न केवल २०१७ की तीसरी तिमाही में, बल्कि प्रथम और द्वितीय तिमाहियों में भी, अर्थव्यवस्था की संवृद्धि दर लगभग १%के आस पास है, और ५% से ७% तक की वृद्धि के सरकारी दावे झूठे हैं।

इसके अलावा, चूंकि अनौपचारिक क्षेत्र देश में ९०% से अधिक रोज़गार प्रदान करता है, अतः इसका निहितार्थ यह है कि जहां संगठित क्षेत्र में काम करने वाली एक छोटी जनसंख्या “२०१७ की तीसरी तिमाही में शुरू हुए आर्थिक पुनरुत्थान” से लाभान्वित हुई है, वहीं विमुद्रीकरण और जीएसटी जैसी सरकारी नीतियों के परिणामस्वरूप असंगठित क्षेत्र में हुई नकारात्मक वृद्धि के कारण जनसंख्या के एक बहुत बड़े हिस्से की आय में भयंकर गिरावट आई है।

वैश्विक पूंजी की जीहुज़ूरी

अनौपचारिक क्षेत्र के सिकुड़ने तथा देश में बढ़ती बेरोज़गारी के बावजूद जेटली ने सरकारी व्यय बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को संबल प्रदान करने का कोई प्रयास नहीं किया है। सरकार द्वारा कुल बजटीय व्यय में बहुत कम वृद्धि की गई है। इसमें सिर्फ १०% की वृद्धि की गई है—जबकि नाममात्र जीडीपी में ११.५% वृद्धि का पूर्वानुमान लगाया जा रहा है। अतः जीडीपी के अनुपात में बजटीय परिव्यय २०१७–१८ (संशोधित अनुमान या सं.अ.) में १३.२१% से घटकर २०१८–१९ में १३.०४% रह गया है (तालिका १)। यह एक संकुचनकारी राजकोषीय नीति की ओर इंगित करता है, जबकि विमुद्रीकरण तथा जीएसटी द्वारा उत्पन्न किए गए आर्थिक विघटन से निपटने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन की आवश्यकता थी।

तालिका १बजट परिव्यय२०१४ से २०१८ (करोड़ रुपए)

  २०१४१५ वा. 

()

२०१७१८ सं.अ.*

()

२०१८१९ ब.अ.#

()

(से () की वृद्धि, % (से (की वृद्धिसीएजीआर
बजट परिव्यय (४) १६,६३,६७३ २२,१७,७५० २४,४२,२१३ १०.१२% १०.०७%
जीडीपी (नाममात्र)   १,६७,८४,६७९ १,८७,२२,३०२ ११.५४%  

जीडीपी के % के रूप में बजट परिव्यय

  १३.२१% १३.०४%    

जीएसटी मुआवज़ा उपकर (५)

  ६१,३३१ ९०,०००    

वास्तविक बजट परिव्यय (४–५)

१६,६३,६७३ २१,५६,४१९ २३,५२,२१३ ९.०८% ९.०४%

जीडीपी के % के रूप में वास्तविक बजट परिव्यय

  १२.८५% १२.५६%    

 वा.: वास्तविक (Actual)

* सं.अ.: संशोधित अनुमान (Revised Estimate)

# ब.अ.: बजट अनुमान (Budget Estimate)

 सीएजीआर: चक्रवृद्धि वार्षिक विकास दर (Compound Annual Growth Rate)

वास्तविक बजट परिव्यय तो ऊपर दिए गए आंकड़ों से भी कम है। ऐसा इसलिए क्योंकि जेटली ने ‘जीएसटी मुआवज़ा उपकर के रूप में एकत्रित राशि’ को भी अपने बजट परिव्यय में शामिल किया है। जीएसटी लागू किए जाने के कारण राज्यों को जो राजस्व हानि हुई है, उसकी क्षतिपूर्ति हेतु यह राशि राज्यों को हस्तांतरित की जानी है। ‘राज्यों को हस्तांतरित कर राजस्व’ की ही तरह इसे भी सकल कर राजस्व में से घटाया जाना चाहिए। लेकिन सरकार ने इसे ‘केंद्र के शुद्ध कर राजस्व’ तथा बजट परिव्यय में शामिल करके बजट परिव्यय में कृत्रिम बढ़ोतरी दर्शाने का प्रयास किया है। इसे घटाने के पश्चात, २०१८–१९ का वास्तविक बजट परिव्यय जीडीपी का मात्र १२.५६% रह जाता है, जबकि संप्रग (UPA) सरकार के अंतिम वर्ष (२०१३–१४) में यह १३.८८% था।

एक अन्य महत्त्वपूर्ण आंकड़ा है: कुल सरकारी व्यय तथा जीडीपी के प्रतिशत के रूप में सरकारी पूंजीगत व्यय। पूंजीगत व्यय सरकारी खर्च का वह अंश होता है जो दीर्घकालिक उत्पादक परिसंपत्तियों के निर्माण हेतु खर्च किया जाता है, जैसे कि रेलवे लाइन, बिजली घर, फैक्ट्रियां, स्कूल एवं अस्पताल। नवउदारवादी सुधारों की शुरुआत के बाद से इस व्यय में निरंतर कमी आती जा रही है। वैश्वीकरण के पहले की तुलना में अब यह एक-तिहाई से भी कम रह गया है (तालिका २)।

तालिका २केंद्र सरकार का पूंजीगत व्यय (%)

  १९८५९० १९९१९७ २०१५१८
कुल व्यय का % ३०.१० २२.७० १३.००
जीडीपी का % ६.१० ४.०० १.७०

यह गिरावट विश्व बैंक तथा आईएमएफ द्वारा थोपी गई नवउदारवादी नीतियों के कारण आई है। दिल्ली में बैठा उनका आदमी अरविंद सुब्रमण्यन—जिसे सीधे वॉशिंगटन से उठाकर सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के रूप में दिल्ली में नियुक्त करवाया गया है—ने इस वर्ष के आर्थिक सर्वेक्षण में स्पष्ट कहा है कि “भारत को दो मुख्य टिकाऊ इंजनों—निजी निवेश तथा निर्यात—की शक्ति के आधार पर तीव्र आर्थिक वृद्धि के लिए वातावरण के निर्माण का निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।” यानी वे यह कहना चाहते हैं कि आर्थिक वृद्धि को सरकारी निवेश में वृद्धि के माध्यम से प्राप्त नहीं किया जा सकता। विदेशी पूंजी यह चाहती है कि भारत सरकार का पूंजीगत व्यय,अर्थात अर्थव्यवस्था के उत्पादक क्षेत्रों में सरकारी व्यय, कम से कमतर होता चला जाए, ताकि निजी पूंजी, विशेषतः बहुराष्ट्रीय पूंजी, इन क्षेत्रों पर अपना एकाधिकार स्थापित कर सके। पिछली सभी सरकारों ने इसी नीति को लागू किया था, वर्तमान भाजपा सरकार इस नीति को और तेज़ी से आगे बढ़ा रही है।

                २०१८ बजट भाषण, वित्त मंत्री अरुण जेटली, Union Budgethttp://indiabudget.nic.in पर उपलब्ध.

Arun Kumar, “India’s Troubling and Official Growth Numbers Are Only the Tip of the Iceberg”, October 3, 2017, https://thewire.in.

बजट संबंधी सभी आंकड़े Union Budget, http://indiabudget.nic.in पर उपलब्ध बजट दस्तावेज़ों से लिए गए हैं.

२०१५–१८ के लिए: संघीय बजट के आंकड़े; पूर्ववर्ती वर्षों के लिए: P.R. Panchmukhi, “Social Impact of Economic Reforms in India”, Economic and Political Weekly, Mumbai, March 4, 2000, p. 839, www.epw.in.

Economic Survey 2017–18, Volume 1, p. 1, op. cit.

        ( लेखक समाजवादी विचारक हैं और पुणे की ‘लोकायत’ नामक संस्था के संयोजक और वैचारिक अंग्रेजी साप्ताहिक ‘जनता’ के संपादक।  आईआईटी, बनारस से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग  में विशिष्टाता के साथ स्नातक की डिग्री लेने के बाद  से वह सामाजिक बदलाव के लिए पूर्णकालिक कार्य करत्ते हैं। 

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