देश मे बेरोजगारी की स्थिति दिन ब दिन भयानक होती जा रही हैं।  अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) की मौजूदा रिपोर्ट बता रही है कि भारत मे 77 फीसदी लोगो की नॉकरियो पर खतरा मंडरा रहा है।  अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक संगठन (आईएलओ) की ओर से जारी ‘द वर्ल्ड एंप्लॉयमेंट एंड सोशल आउटलुक- ट्रेंड्स 2018’ बताती है कि मोदी सरकार ने बेरोजगारों को रोजगार नहीं दिया है बल्कि भ्रम फैलाया है।

नितिन गडकरी महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण पर बोलते बोलते प्रधानमंत्री मोदी के रोजगार दिए जाने की सच्चाई बोल ही पड़े।  उन्होंने कहा कि “मान लेते हैं कि आरक्षण मिल जाता है, लेकिन नौकरियां हैं ही नहीं।  बैंक क्षेत्र में आईटी की वजह से नौकरियां कम हो रही हैं।  सरकारी भर्तियां बंद हैं।  नौकरियां हैं कहां?” जबकि कुछ दिन पूर्व प्रधानमंत्री मोदी अपने एक इंटरव्यू में बता रहे थे कि देश में नौकरियों की कोई कमी नहीं हैं।

 

 

सरकार के आंकडे ही खोल रहे हैं प्रधानमंत्री के दावे की पोल

 

केंद्र सरकार ने जो पिछला रोजगार सर्वेक्षण किया था उसमें पता चला कि वित्त वर्ष 2016-17 की आखिरी तिमाही के दौरान रोजाना औसतन 250 अस्थायी मजदूरों को अपने काम से हाथ धोना पड़ा। सरकारी आंकड़ों कि निर्माण क्षेत्र जो रोजगार देने में सबसे अधिक प्रभावी भूमिका निभाता आया है, उसमे बीते साल अप्रैल से जून के बीच 87 हजार नौकरियां खत्म हुईं जबकि वर्ष 2016 में इसी अवधि के दौरान यह आंकड़ा 12 हजार था। निर्माण क्षेत्र में ठेके पर काम करने वाले 54 हजार मजदूरों को अपने काम से हाथ धोना पड़ा। 2016-17 के दौरान कुल 2.6 लाख अस्थायी मजदूरों को रोजगार छिन गया गैर-सरकारी संगठन सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनामी (सीएमआईई) ने सरकार से कहा है कि सितंबर-दिसंबर 2016 और जनवरी-अप्रैल 2017 के बीच लगभग 15 लाख नौकरियां कम हुईं। इनमें से ज्यादातर अस्थायी मजदूर थे. लेकिन रोजगार के कम होने का कारण सिर्फ जीएसटी ओर नोटबन्दी जैसे ही गलत निर्णय नही है बल्कि मोदी सरकार का चीन से किये जाने वाले आयात को प्रश्रय देना भी है। कुछ दिनो पहले ही संसद की वाणिज्य संबंधी स्थायी समिति ने एक रिपोर्ट सामने रखी है, जिसमें उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला है कि सस्ते चीनी सामान के आयात से न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था को हर साल लाखों करोड़ रुपये की अपूरणीय क्षति हो रही है बल्कि लाखों नौकरियां भी जा रही हैं। इस रिपोर्ट का नाम ही है ‘चीनी सामान के आयात का भारत के उद्योग जगत पर असर’ शिरोमणि अकाली दल के नरेश गुजराल की अध्यक्षता वाली संसद की वाणिज्य संबंधी स्थायी समिति की यह रिपोर्ट बताती है कि पिछले चार पांच सालों में चीन से सिर्फ सोलर पैनल के आयात से ही देश में दो लाख लोगों का रोजगार खत्म हो गया है। 2011-12 तक भारत जर्मनी, फ्रांस, इटली को सोलर पैनल एक्सपोर्ट करता था। लेकिन चीन की डंपिंग के चलते भारत से सोलर पैनल का एक्सपोर्ट रुक गया है और सबसे खतरनाक बात तो यह है कि चीन से इंपोर्ट होने वाले सोलर पैनल में एंटीमनी जैसे खतरनाक रसायन होते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इस तरह के प्रोडक्ट के आयात की अनुमति भारत सरकार को नहीं देनी चाहिए। सोलर पैनल के अलावा स्टील, कपड़ा, पटाखे, साइकिल, खिलौना और दवाई जैसे उद्योगों को भी चीनी सामानों से नुकसान पहुंच रहा है और चीन से ज्यादा आयात के चलते भारत की घरेलू फैक्ट्री या तो अपने प्रोडक्शन में कटौती कर रही हैं या पूरी तरह बंद हो रही हैं। इस संसदीय समिति ने अपनी जांच में यह भी पाया है कि ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (बीआईएस) जैसी संस्थाएं घटिया चीनी सामान को भी आसानी से सर्टिफिकेट दे रही हैं जबकि हमारे निर्यात को चीन सरकार बहुत देरी से और काफी ज्यादा फीस वसूलने के बाद ही चीनी बाजार में प्रवेश करने देती है।  चीनी आयात का भारतीय उद्योगों पर भी विपरीत असर हुआ है।

 

रेडिमेड और टेक्सटाइल उद्योग तबाही की कगार पर

 

भारतीय वस्त्र उद्योग को भी चीनी सामान बर्बाद कर रहे हैं। अकेले सूरत और भिवंडी में 35 फीसदी हथकरघे बंद हो गए। चीन से कच्चा माल बांग्लादेश जाता है और वहां से वस्त्र के रूप में भारत आता है। यह भी कहा जा रहा है कि भारत चीन से रेडीमेड की ड्यूटी फ्री इंपोर्ट की ओर आगे बढ़ रहा है भारत-चाईना के बीच तीन हजार आइटम्स को लेकर फ्री ट्रेड एग्रीमेंट होने की अटकले लगाई जा रही है जिससे टैक्सटाइल और गारमेंट इंडस्ट्री में असंतोष फैला हुआ है। पहले ही टैक्सटाइल इंडस्ट्री 20 से 25 फीसदी कपैसिटी पर काम कर रही है और यदि यह हो जाता है तो देश का रेडीमेड बिजनेस पूरी तरह से तबाह हो जाएगा भारत को भी अमेरिका और यूरोपीय संघ की तरह डब्यूटीओ के प्रावधानों का सही इस्तेमाल कर घटिया क्वालिटी के चीनी सामान की भारत में डंपिंग रोकनी चाहिए और जैसे चीन सरकार अपने निर्यातकों को 17 फीसदी की निर्यात छूट देती है उसी प्रकार भारत को भी अपने निर्यात को बढाने की ओर ध्यान देना चाहिए जहां 2013-14 में हमारे कुल आयात का 11.6 फीसदी चीन से होता था, 2017-18 में यह बढ़कर 20 फीसदी हो गया है 2016-17 में चीन के साथ व्यापार घाटा 51 अरब डॉलर का था और इस साल यह बढ़कर 63 अरब डॉलर हो गया, पिछले दस सालों के दौरान हमारा चीन को निर्यात महज 2.5 अरब डॉलर का बढ़ा है जबकि आयात में 50 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई है।  भारत अगर इसी तर्ज पर चलता रहा तो वह दिन दूर नही जब देश के हर छोटे बड़े उद्योग धंधों और कारखानों पर अलीगढ़ के नही बल्कि चीन से आयातित ताले लटके हुए मिलेंगे और उस वक्त जो बेरोजगारी का आलम होगा उसकी कल्पना भी नही की जा सकती।

(गिरीश मालवीय आर्थिक मामलों के अध्ययनशील टिप्पणीकार हैं)

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