आठ अगस्त, 1942 के दिन अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक ने ‘भारत छोड़ो’ के ऐतिहासिक प्रस्ताव को पारित कर दिया। मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में ढाई सौ सदस्यों की इस बैठक की कार्यवाही का नतीजा देखने हजारों लोग जमा थे।
गांधी विद्रोह पर उतारू थे। उन्होंने अपने मशहूर ‘करो या मरो’ वाले भाषण में यह साफ कर दिया कि यह पहले की तरह का जेल भरो आंदोलन नहीं है और इसमें आजादी के अलावा किसी चीज पर समझौता नहीं होगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस देश को आजाद करेगी या खुद फना हो जाएगी। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत अपना सारा साधन स्वतंत्रता की लड़ाई और नाजीवाद, फासीवाद और साम्राज्यवाद का सामना करने में लगा देगा। गांधी ने कहा, ‘‘आजादी की घोषणा होते ही, एक अस्थाई सरकार बनाई जाएगी और भारत संयुक्त राष्ट्र संघ यानि मित्र-राष्ट्रों का सहयोगी  बन जाएगा।’’
उन्होंने यह भी कहा कि भारत बर्मा, मलाया, इंडो-चीन डच-इंडिज, इराक और  ईरान जैसे एशियाई देशों की मुक्ति का प्रतीक और आरंभ बनेगा।
उन्होंने देशवासियों को मंत्र दिया कि वे अपने को आज से आजाद समझंे और मालिक को बता दें कि हम नहीं डरेंगे। आप जिंदा रखना चाहते हैं तो रखें।
उन्होंने कहा कि लोग अपना तरीका खुद ढूंढें।
इतिहासकार ज्ञानेंद्र पांडेय के अनुसार इसका काफी मनोवैज्ञानिक असर हुआ।
भारत छोड़ो के प्रस्ताव में आजाद भारत की लोकतंात्रिक व्यवस्था की तस्वीर भी पेश की गई। इस संघ में चुनिंदा अधिकारों को छोड़ कर सारी शक्तियां राज्यों को सौपने की बात कह गई थी। इसमें हिंदू-मुस्लिम एकता की  अपील की गई थी। गंाधी जी ने अंगे्रजों से कहा, ‘‘ भगवान के भरोसे या वक्त पड़ा तो अराजकता के हाथों देश को सौंप कर ब्रिटिशों को यहां से चला जाना चाहिए।’’
‘भारत छोड़ो’ का ऐलान करते समय गांधी जी के दृढनिश्चय के बारे में मधुलिमये ने अपनी आत्मकथा में लिखा है,‘‘ उनके तेज से, उनके प्रखर निश्चय से हम रोमंाचित हो गए। गांधी जी को लेकर मेरे मन में जो पूर्वाग्रह या आपत्तियां थीं, वे सभी काफूर हो गईं।’’
अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की इस बैठक में भाग लेने वाले कम्युनिस्ट नेताओं ने फासिज्म से लड़ने की दलील दी और भारत छोड़ों के प्रस्ताव का विरोध किया।
लेकिन  ‘करो या मरो’ की घोषणा के आते ही दो महत्वपूर्ण बयान आ गए।  एक सावरकर और दूसरा मोहम्मद अली जिन्ना का। सावरकर ने हिंदू महासभा के कार्यकर्ताओं को आंदोलन से दूर रहने के लिए कहा और जिन्ना ने आंदोलन को मुसलमानों की सुरक्षा के लिए खतरा बताया। उन्होंने आंदोलनकारियों को मुसलमानो ंसे दूर रहने को चेतावनी दी।
ब्रिटिश हुकूमत चैकन्ना थी और वह पहले से ही नेताओं को जेल में डाल रही थी।  ‘भारत छोड़ो’  का प्रस्ताव पारित होते ही उसने कांग्रेस के पूरे नेतृत्व को जेल में डाल दिया। नौ अगस्त को सुबह चार बजे जब महात्मा गांधी जब प्रार्थना के लिए उठे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। बाकी नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया। दूसरे दिन मुबई में गोवालिया टैंक पर अरूणा आसफ अली ने तिरंगा फहराने का ऐतिहसिक काम किया औ गोवालिया टैंक समेत कई जगहों पर जनता और पुलिस के बीच टक्कर होती रही। पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े तो स्थानीय लोगांे ने भीड़ के लोगों को बचाने के लिए खुल कर सामने आए। नेताओं की गिरफ्तारी की देश भर में तीव्र प्रतिक्रिया हुई।
वैसे तो गांधी जी ने यह कहा था कि इस आंदोलन में कांग्रेस अहिंसा की अपनी 22 वर्षों की संचित शक्ति का इस्तेमाल करेगी। लेकिन उनकी घोषणा में कई ऐसी बातें थीं जो आंदोलन को परंपरागत जेल-यात्रा से अलग दिशा में ले जाने का इजाजत देती थी। अपने को आजाद समझो और उसी के अनुसार काम करो वाला मंत्र इसमें सबसे महत्वपूर्ण था।
सरकार का चैकन्नापन काम नहीं आया। कांग्रेस समाजवादी पार्टी के नेताओं नेे पहले से तय कर रखा था कि उन्हें इस बार जेल नहीं जाना। वैसे महसमिति की बैठक में भाग ले रहे तीन बड़े नेता अशोक मेहता और युसूफ मेहरअली पकड़ लिए गए थे, लेकिन मुंबई में ही मौजूद सुचेता कृपलानी, डा राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन, अरूणा आसफ अली समेत कई नेता भूमिगत हो गए । जयप्रकाश नारायण जेल में ही थे। इन नेताओं ने भूमिगत अंादोलन के संचालन के लिए कांग्रेस महासचिव सुचेता कृपलानी के साथ एक केंद्रीय सचंालन मंडल बनाया जिसके समन्वय का काम पटवर्धन ने संभाला और नीति निंर्धारण का काम लोहिया ने। एसएम जोशी को महाराष्ट्र की भूमिगत गतिविधि का जिम्मा सौंपा गया। भूमिगत गतिविधियों में मधुलिमए, बसावन सिंह, सूरज नारायण सिंह जैसे नेताओं ने अपन-अपने क्षेत्रों मं अहम भूमिका निभाई।
सरकार को मिली रिपोर्टों के मुताबिक समाजवादियों ने बंबई, बिहार, उप्र, बंगाल तथा पंजाब में गुप्त दल बनाए थे जिसका जिम्मा बंबई में अशोक मेहता, बिहार में रामनंदन मिश्र और उप्र में बालकृष्ण केसकर तथा राजाराम शास्त्री को दिया गया था। करांची मंे यह जिम्मा तहलियानी को दिया गया था। केंद्रीय संचालन मंडल ने गांवों तथा शहरों में जनता के विद्रोह के लिए एक निर्देश जारी किया।
डा लोहिया और पटवर्धन के नेतृत्व में अहिंसक आंदोलन का एक नया स्वरूप सामने आया जिसमे किसी की जान लेने की मनाही थी, लेकिन सत्ता के केंद्रों और संचार ठप कर देना था। लोहिया मानते थे कि देश भर में पुलिस थानों का जाल ब्रिटिश सरकार की ताकत है। इसलिए थानों पर कब्जा कर लिया जाए और उनका संबंध शासन के  शहरी केंद्रों से तोड़ दिया जाए तो ब्रिटिश शासन को पंगु किया जा सकता है।
कांग्रेस रेडियो
डा लोहिया  की सलाह पर 20 अगस्त को बंबई में इस रेडियो  की स्थापना हुई। यह ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की भूमिगत गतिविधियों के प्रचार के लिए बना था। इसमें विट्ठल भाई झावेरी, चंद्रकांत झावेरी और उषा मेहता काम करते थे। इसके लिए सामग्री लोहिया और पुरूषोत्तम त्रिकमदास की ओर से आता था। इसमें उषा मेहता की अहम भूमिका थी। यह रेडियो 12 नवंबर, 1942 को पुलिस ने छापा मार कर ट्रंासमिशन की तैयारी करते वक्त उषा मेहता और चंद्रकंात झावेरी  को गिरफ्तार कर लिया।
कांग्रेस रेडियो कम दिनों तक चला, लेकिन इसने सनसनी फैला दी और सरकार को हर स्तर पर चुनौती देने वाले भूमिगत आंदोलन में एक नया आयाम जोड़ दिया।
आठ अगस्त को आंदोलन की घोषणा और नौ अगस्त को गंाधी जी का करो या मरो का संदेश मिलते ही देश के कोने-कोने मे लोगों ने अपने को आजाद करने की कारंवाई शुरू कर दी। पूरे देश में सरकारी तंत्र पर हमले का सिलसिला शुरू हो गया। रेल की पटरियंा उखाड़ने, डाकखानों और कचहरियों पर कब्जा करने का काम होने लगा।
कम्युनिस्टों के प्रयासों के बावजूद भारत छोड़ो अंादोलन से मजदूर वर्ग अप्रभावित नहीं रह सका। नौ अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो का प्रस्ताव पारित होने के बाद हुई गंाधी जी की गिरफ्तारी के विरोध में देश भर में हड़ताल हुई, जो एक सप्ताह तक चलीं। इसमें दिल्ली, बंबई, लखनऊ, कानपुर,नागपुर, अहमदाबाद, जमशेदपुर, मद्रास, इंदौर, तथा बंगलोर के मजदूरों शामिल थे। टाटा स्टील प्लांट 13 दिनों तक बंद रहा। हड़ताल करने वालों की मंाग थी कि देश में एक राष्ट्रीय सरकार बने। अहमदाबाद में कपड़ा मजदूरों में साढ़े तीन महीने तक हड़ताल रखी। कम्युनिस्टों के प्रभाव वाले इलाकों में भागीदारी कम थी, लेकिन कई जगह कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने भी भारत छोड़ो में हिस्सा लिया।
जब 3 सितबंर,1939 को विश्वयुद्ध छिड़ा  था तो बंबई का मजदूर वर्ग युद्ध विरोधी हड़ताल करने वालों में आगे था और इसने दो अक्टूबर 1939 को हड़ताल किया, इसमें 39000 श्रमिकों ने हिस्सा लिया। सरकारी दमन के बावजूद कई स्थानों पर आर्थिक सवालों पर हड़ताल हुई। इसमें यह जरूर मानना चाहिए कि कंाग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन और कम्युनिस्टों के शामिल होने के बाद जो वामपंथी एकता बनी थी, यह उसका नतीजा था। इस एकता के कारण मजदूर और किसान अंादोलनों में भी एकता आई थी। अप्रैल, 1936 में आल इंडिया किसान कांग्रेस बनी जिसका नाम बाद में बदल कर आल इंडिया किसान सभा रख दिया गया। आल इंडिया कंाग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में (अप्रैल 1936) के अध्यक्ष सहजानंद सरस्वती चुने गए और इसके महासचिव एनजी रंगा बने। इसके पहले सत्र में जवाहर लाल नेहरू राममनोहर लोहिया, सोहन सिंह जोश इंदुलाल याज्ञिक, जयप्रकाश नारायण, मोहन लाल गौतम, कमल सरकार, सुधीन प्रमाणिक और अहमद दीन ने हिस्सा लिया।
कांग्रेस के फैजपुर अधिवेशन के समय समाजवादियों की पहल से मनमाड से फैजपुर तक 20 मील का मार्च निकाला गया था जिसके स्वागत में जवाहर लाल नेहरू एमएन राय, एसए डंागे, एमआर मसानी, युसुफ मेहरअली साथ खड़े थे।
अखिल भारतीय किसान सभा के 1939 के पटना अधिवेशन की अध्यक्षता आचार्य नरेंद्र देव ने की थी और इसे जयप्रकाश नारायण ने संबोधित किया था। इसी तरह आचार्य नरेंद्र देव शिक्षकों के राष्ट्रीय सम्मेलन के अध्यक्ष थे।
भारत छोड़ो की घोषणा के बाद किसान, मजदूर  और युवाओं ने आंदोलन में गति लाई।

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